Wednesday, August 9, 2017

‘हम आदिवासियों के साथ हैं'-संयुक्त राष्ट्र संघ! ‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं'-भारत सरकार!! 'आदिवासी नहीं, मूलनिवासी दिवस'-आर्यवंशी शूद्र!!!

*‘हम आदिवासियों के साथ हैं'-संयुक्त राष्ट्र संघ*
*‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं'-भारत सरकार!! *
*'आदिवासी नहीं, मूलनिवासी दिवस'-आर्यवंशी शूद्र!*


*डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’*
9 अगस्त को विश्‍व आदिवासी दिवस है। कितने आदिवासी जानते हैं कि यह दिन कब से और क्यों मनाया जाता है? विश्‍व आदिवासी दिवस के प्रति सरकार और खुद आदिवासियों के क्या दायित्व है? आदिवासियों के निर्वाचित जन प्रतिनिधि और आदिवासी कोटे में नियुक्त लोक सेवक विश्‍व आदिवासी दिवस के मकसद को पूरा करने के लिये अपने आदिवासियों के प्रति कितने संवेदनशील, समर्पित और निष्ठावान हैं?




*विश्‍व आदिवासी दिवस का संक्षिप्त इतिहास:*

द वर्डस इंडीजिनियश The world's Indigenous अर्थात् विश्व के इंडीजिनियश पीपुल अर्थात् विश्‍व के आदिवासियों के हकों और मानव अधिकारों को विश्‍वभर में क्रियान्वित करने और उनके संरक्षण के लिए अब से 35 वर्ष पूर्व अर्थात् वर्ष-1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) द्वारा एक UNWGEP नामक कार्यदल उप आयोग का गठन किया गया। जिसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को सम्पन्न हुई थी।

उक्त कार्यदल ने आदिवासियों की समस्याओं के निराकरण हेतु विश्‍व के तमाम देशों के ध्यानाकर्षण के लिए सबसे पहले विश्‍व पृथ्वी दिवस 3 जून 1992 के अवसर पर होने वाले सम्मेलन के एजेंडे में 'रिओ-डी-जनेरो (ब्राजील) सम्मेलन में विश्‍व के आदिवासियों की स्थिति की समीक्षा और चर्चा का एक प्रस्ताव पारित किया गया। ऐसा विश्‍व में पहली बार हुआ जब कि आदिवासियों के हालातों के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर प्रस्ताव पारित किया गया।

संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अपने गठन के 50वें वर्ष में यह महसूस किया कि 21वीं सदी में भी विश्‍व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासी लोग अपनी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, बेरोजगारी एवं बन्धुआ तथा बाल मजदूरी जैसी समस्याओं से ग्रसित हैं। अतः 1993 में UNWGEP कार्यदल के 11वें अधिवेशन में आदिवासी अधिकार घोषणा प्रारूप को मान्यता मिलने पर 1993 को पहली बार विश्‍व आदिवासी वर्ष एवं आगे हमेशा के लिये 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया गया।

आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास आदि के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 में जेनेवा शहर में विश्‍व के आदिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्‍व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया।

9 अगस्त, 1994 को विश्‍वभर के आदिवासियों की संस्कृति, भाषा, मूलभूत हक को सभी ने एक मत से स्वीकार किया और आदिवासियों के सभी हक बरकरार हैं, इस बात की पुष्टि कर दी गई। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने यह कहकर आदिवासियों को वचन दिया कि-‘हम आपके साथ है|’

संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) की जनरल असेम्बली (महासभा) ने व्यापक चर्चा के बाद 21 दिसम्बर, 1993 से 20 दिसम्बर, 2004 तक आदिवासी दशक और 9 अगस्त को International Day of the world's Indigenous people (विश्‍व आदिवासी दिवस) मनाने का फैसला लेकर विश्‍व के सभी सदस्य देशों को विश्‍व आदिवासी दिवस मनाने के निर्देश दिये।

इसके बाद विश्‍व के सभी देशों में इस दिवस को मनाया जाने लगा, पर अफसोस भारत की आर्यों के वर्चस्व वाली मनुवादी सरकारों ने आदिवासियों के साथ निर्ममतापूर्वक धोखा किया। आदिवासियों को न तो इस बारे में कुछ बताया गया और ना ही भारत में आधिकारिक रूप से विश्‍व आदिवासी दिवस मनाया गया। आदिवासियों के हालातों में कोई सुधार नहीं होने पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 16.12.2005 से 15.12.2014 को दूसरी बार फिर से आदिवासी दशक घोषित किया गया।

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर यह लिखते हुए गहरा दुख और अफसोस होता है कि *विधायिका में आदिवासियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और लोक सेवाओं में चयनित प्रशासनिक प्रतिनिधियों के होते हुए भारत की सभी सरकारें आदिवासियों के प्रति संयुक्त राष्ट्र संघ के स्पष्ट प्रस्ताव के बावजूद भी आज तक हृदयहीन, धोखेबाज और निष्ठुर बनी रही हैं। आखिर ऐसा क्यों? प्रत्येक आदिवासी को इस सवाल का जवाब जानना होगा।* लेकिन यह जानकर पाठकों को घोर आश्चर्य होगा कि 23 साल पहले जब प्रथम आदिवासी दिवस सम्मेलन 1994 में जेनेवा में यूएनओ द्वारा आयोजित हुआ। जिसमें विश्‍व के सभी सदस्य देशों से प्रतिनिधि बुलाये गये थे। भारत सरकार की तरफ से तत्कालीन केन्द्रीय राज्य मंत्री के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने जिनेवा सम्मेलन में भाग लिया था।

इस सम्मेलन में भारत सरकार के प्रतिनिधि द्वारा सँयुक्त राष्ट्र संघ को अवगत कराया था कि *‘संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिभाषित आदिवासी लोग भारत में हैं ही नहीं।’* बल्कि इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र संघ को यह बताया गया कि *‘भारत के सभी लोग भारत के आदिवासी हैं और भारत की जन जातियां किसी प्रकार के सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक पक्षपात या भेदभाव की शिकार नहीं हो रहे हैं।'* सोचिये इससे बड़ा सरकारी झूठ और षड़यंत्र क्या हो सकता है? लेकिन दु:खद आदिवासी प्रतिनिधि मौन हैं?

भारत की जो सरकारें संसार के सबसे बड़े मंच पर इतना बड़ा झूठ बोल सकती हैं। उनकी ओर से अपने हकों की मांग करने वाले आदिवासियों को नक्सलवादी घोषित करना कौनसी बड़ी बात है? ऐसी सरकारें आदिवासियों को समाप्त करने के लिये कुछ भी कर सकती हैं। *'भारत में आदिवासी हैं ही नहीं और भारत के सभी लोग आदिवासी हैं।'* यह झूठ क्यों बोला गया? इसके पीछे सरकार की गहरी साजिश है! जिसका उत्तर जानने के लिये प्रत्येक आदिवासी को भारत की व्यवस्था पर काबिज बकवास वर्ग के षड़यंत्रों को तो समझना ही होगा।

इसके साथ-साथ दो बातें वर्तमान में विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। *भारत के आदिवासी को नेस्तनाबूद करने के लिये वर्तमान में आर्यों के चारों वर्ण सक्रिय हैं! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की श्रेृष्ठता कायम रखने के लिये संचालित आरएसएस भारत का इतिहास नये सिरे से लिखवाकर यह सिद्ध करने में लगा हुआ है कि आर्य यूरेशिया से भारत आने से पहले भारत के निवासी थे। आर्य भारत से यूरेशिया गये ​थे। वहीं दूसरी ओर आर्य ब्राह्मणों द्वारा उपनयन अर्थात जनेऊ संस्कार बंद करके आर्यों का चौथा शूद्र वर्ण घोषित (लेकिन सम्पूर्ण अनुसूचित जातियां शूद्र नहीं) लोगों के वर्तमान वंशज प्रायोजित डीएनए रिपोर्ट की मनमानी तथा भ्रामक व्याख्या करके आर्यवंशी शूद्रों को मूलनिवासी शब्द की आड़ में भारत के मूल मालिक सिद्ध करने में लगा हुआ है। इस प्रकार आर्यों के चारों वर्ण आदिवासी अस्तित्व को नेस्तनाबूद करके अपने आप को भारत के मूलनिवासी घोषित करने के षड़यंत्र में अन्दरखाने संलिप्त और सहभागी लगते हैं। लेकिन दु:खद आश्चर्य आर्यों के चारों वर्णों में से किसी में इतना साहस नहीं कि वे 'विश्व आदिवासी दिवस' के दिन अपने आप को भारत के आदिवासी कह सकें!* (नोट: 04 अगस्त, 2015 को—— *संयुक्त राष्ट्र संघ ने कहा-‘हम आदिवासियों के साथ हैं|’ भारत सरकार ने कहा-‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं|’* ———शीर्षक से लिखा आलेख आंशिक संपादन के साथ पुन: प्रस्तुत है।)

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/09.08.2017

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