Friday, July 28, 2017

दीपा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद के मौन के मायने?

दीपा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद के मौन के मायने?
मोस्ट वॉइस: अंक-2 28 जुलाई, 2017
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

दीपा ईवी बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया प्रकरण में ओबीसी के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रेल, 2017 जो निर्णय सुनाया है, उसका तत्परता से क्रियान्वयन शुरू हो चुका है। जिसके तहत केन्द्र और सभी राज्य सरकारों द्वारा प्रशासनिक आदेश/सर्क्यूलर जारी किये जा चुके हैं/जा रहे हैं।
इस प्रकरण में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस पर लम्बी-चौड़ी चर्चा, बहस और विवेचना की गुंजाइश हो। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में आदेश दिये हैं कि आरक्षित वर्ग के आवेदक/प्रत्याशी द्वारा यदि शुल्क छूट के अलावा किसी भी प्रकार की छूट प्राप्त की गयी है तो वह अनारक्षित बौद्धिक कोटे की मेरिट में नहीं गिना जायेगा, बेशक वह मेरिट में टॉपर ही क्यों न रहा हो? इसका सीधा और साफ अभिप्राय यही है कि यदि आरक्षित वर्ग के आवेदक अनारक्षित मेरिट में प्रवेश, नियुक्ति/चयन चाहते हैं तो उनके पास दो विकल्प हैं:-

पहला: किसी भी चयन के लिये बेशक साथ में जाति प्रमाण पत्र संलग्न करें। लेकिन चयन के प्रारंभिक चरण से ही अनारक्षित आवेदकों के समान पात्रता अर्जित करके आवेदन करें। यद्यपि बहुत ही कम संख्या में ऐसे आवेदक होंगे जो अर्हता और पात्रता में किसी भी प्रकार की छूट प्राप्त किये बिना पहले चरण से आवेदन करने के लिये पात्र हों और यदि पहले चरण तक पात्र हों भी तो चयन के अन्तिम चरण तक किसी भी प्रकार की छूट हासिल करने के लिये विवश नहीं हों। यदि लिखित प्रतियोगिताओं में बिना छूट के अनारक्षित बौद्धिक कोटे में मेरिट हासिल कर भी ली तो अन्त में साक्षात्कार में इतने कम अंक दिये जाते हैं कि उनका अनारक्षित बौद्धिक कोटे से बाहर होना तय है।

दूसरा: उन्हें अनारक्षित आवेदक के रूप में आवेदन करना होगा।

उक्त दोनों स्थितियों में मूल अंतर यह है कि पहली में आवेदक के पास दोनों विकल्प उपलब्ध हैं। जबकि दूसरे विकल्प में आरक्षित वर्ग के आवेदकों को केवल बौद्धिक कोटे में ही मेरिट अर्जित करके चयनित होने का एक मात्र विकल्प है। सामान्यतया आरक्षित वर्ग के आवेदकों से ऐसा रिस्क लेने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

निश्चय ही यह निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु प्रतिपादित उस पवित्र सिद्धान्त के विपरीत है, जिसमें सरकार से साफ शब्दों में यह अपेक्षा की गयी है कि समानता का तात्पर्य आंख बंद करके लोगों के बीच एक जैसा व्यवहार करना कतई भी समानता नहीं है, बल्कि समानता का तात्पर्य जन्मजातीय विभेद का दंश झेलने वाले एक जैसी सामाजिक एवं शैक्षणिक परिस्थितियों और पृष्ठभूमि की जातियों में जन्मने वाले लोगों के बीच एक जैसा व्यवहार करना है। इसी के मूल सिद्धान्त के तहत संविधान में वर्गीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है।

प्रतियोगिताओं में वंचित वर्गों को निर्धारित अर्हताओं में छूट प्रदान करना भी इसी सिद्धान्त में शामिल है। जबकि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस सिद्धान्त का खुला उल्लंघन करने के साथ-साथ, सुप्रीम कोर्ट के अनेक पूर्ववर्ती निर्णयों के भी विपरीत है। जिनमें यह कहा गया है कि-'आरक्षण का बिलकुल भी यह अर्थ नहीं है कि आरक्षित वर्गों को निर्धारित आरक्षण प्रतिशत से अधिक प्रवेश/नियुक्तियां नहीं दी जावें, बल्कि निर्धारित आरक्षण प्रतिशत तो आरक्षित वर्गों का न्यूनतम प्रतिनिधित्व है।'

यहां यह उल्लेखनीय है कि आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों की संकीर्ण व्याख्या के जरिये, आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने का यह सिलसिला 1950 से दोराईराजन के प्रकरण से जारी है। मेरा मानना है कि अब आरक्षण व्यवस्था के प्रावधानों को कमजोर करने के लिये सुप्रीम कोर्ट के पास अधिक कुछ शेष बचा नहीं है। फिर भी आने वाले समय में आरक्षण के सिद्धान्तों की और अधिक संकीर्ण व्याख्या करने वाले निर्णय आ सकते हैं।

उपरोक्त निर्णय के अलावा नीट मामला सबके सामने है। इसके साथ ही साथ यह भी तय हो चुका है कि जिस किसी ने सरकारी सेवा में प्रवेश के लिये कभी भी एक बार यदि आरक्षण का लाभ ले लिया तो ऐसे लोक सेवक को भविष्य में अनारक्षित कोटे का लाभ नहीं मिलेगा। मतलब साफ है कि बैक लोग खाली रहेगा तथा उच्च और नीतिनियन्ता प्रशासनिक पदों पर आरक्षित वर्ग के लोगों को नहीं पहुंचने देने की सम्पूर्ण तैयारी की जा चुकी है। इसीलिये मैंने संविधान की व्याख्या के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश गुलामी की गाथा लिखने वाले श्लोक सिद्ध होंगे। शीर्षक से प्रकाशित लेख में वंचित मोस्ट वर्ग को आगाह किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी अनेक बार संविधान की संकीर्ण व्याख्या करने वाले निर्णय सुनाये थे, जिन्हें तत्कालीन संसद द्वारा संविधान संशोधन के जरिये निष्प्रभावी कर दिया गया था। लेकिन वर्तमान में सभी सांसद, अर्थात संसद मौन है। कारण बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिये। हम सभी जानते हैं कि देश के लोगों ने केन्द्र और अनेक राज्यों में ऐसी विचारधारा की सरकार को बहुमत प्रदान किया है, जो पण्डित दीनदयान उपाध्याय के मानव एकात्ववाद के सिद्धान्त को लागू करने को प्रतिबद्ध है। जो नहीं जानते, उन्हें एक पंक्ति में जान लेना चाहिये कि पण्डित दीनदयान उपाध्याय का एकात्म मानववाद और कुछ नहीं, सीधे शब्दों में मनुवाद ही है। जिसका पूर्व में एम के गांधी ने भी खुलकर समर्थन किया है।

वर्तमान में भाजपा के माध्यम से जिस किसी भी वर्ग के जो भी सांसद और विधायक या अन्य जनप्रतिनिधि हैं या अन्य जो चाहे किसी भी दल में हों या निर्दलीय हो, यदि वे संघ के प्रति निष्ठावान हैं तो उनका सीधा लक्ष्य एकात्म मानववाद के मार्फत भारत में मनुवादी व्यवस्था को लागू करना है। अत: वर्तमान में कार्यपालिका, व्यवस्थापालिका और न्यायपालिका तीनों के मार्फत पण्डित दीनदयान उपाध्याय के एकात्म मानववाद को लागू किया जा रहा है। जिसको प्रेसपालिका अर्थात मीडिया का भी खुलकर समर्थन मिल रहा है।

दीपा प्रकरण में परोक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 50.50 फीसदी बौद्धिक कोटे को आरक्षित वर्ग के टॉपर्स से मुक्त रखते हुए, अनारक्षित वर्ग के लिये आरक्षित करने के समान है। जिसका स्थायी, संवैधानिक और न्यायसंगत समाधान यही है कि जाति आधारित जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक किये जावें। आरक्षित वंचित वर्ग की जातियों की वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का न्यूनतम कोटा निर्धारित किया जावे। यह सब करने का संवैधानिक अधिकार संसद के पास है, लेकिन संसद मौन है।

आरक्षित वंचित मोस्ट वर्ग के जो भी लोग, संगठन या राजनैतिक दल वंचित वर्ग के प्रतिनिधि या हितैषी होने की बात करते या कहते हैं, उनका लक्ष्य वंचित वर्ग को गुमराह करके येन-केन-प्रकारेण, कैसे भी सत्ता प्राप्ति रसमलाई का रसास्वादन करना रहा है। अत: उनसे किसी प्रकार की उम्मीद करना वंचित वर्ग को खुद को धोखा देने के समान है।

अत: अन्तिम बात वंचित मोस्ट वर्ग को संयुक्त विचार और संयुक्त नेतृत्व के सिद्धान्त को स्वीकार करना होगा। संयुक्त नेतृत्व में देशव्यापी आन्दोलन चलाना होगा। जिसके बारे में 'बकवास वर्ग के अत्याचारों के विरुद्ध मोस्ट वंचित वर्ग की रणनीति?' शीर्षक से पूर्व प्रकाशित लेख में प्रकाश डाला जा चुका है।

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डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, Mobile & Whatsapp No.: 9875066111, 28.07.2017

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