Tuesday, July 25, 2017

वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा

वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा
मोस्ट वॉइस : अंकः 1, 25 जुलाई, 2017
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
मैंने अनुभव से सीखा है कि जब आप नेतृत्व कर रहे होते हैं तो आप पर असंख्य लोगों की नजरें होती हैं, जिनमें अनेक निर्मल-हृदयी होते हैं। जिन्हें सिर्फ आपकी अच्छाई और सच्चाई ही दिखती है। ऐसे लोग आपको प्रोत्साहित करते हैं। कुछ तटस्थ और निष्पक्ष लोग होते हैं जो सब कुछ सच-सच कहते, लिखते और बोलते हैं। उनको इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इससे नेतृत्व को, पढ़ने-सुनने वालों या नेतृत्व के अनुयाईयों या समाज को कैसा लगेगा या क्या प्रभाव होने वाले हैं।
जबकि समाज में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो सिर्फ नेतृत्व की कमियों, कमजोरियों और जुबान फिसलने को मुद्दा बनाने का इन्तजार करते रहते हैं, ताकि नेतृत्व को दुनिया के सामने कमजोर, मूर्ख और नालायक सिद्ध किया जा सके! जिसके पीछे अनेक बार उनका कोई मकसद नहीं होता। मनोवैज्ञानिक कहते हैं, ऐसा करने में इन लोगों को मजा आता है। उनको आनंद की अनुभूति होती है, क्योंकि उनको इस बात से सन्तुष्टि मिलती है कि उन्होंने कितने बड़े व्यक्ति को निशाना बनाया। कुछ मामलों में ऐसी आलोचना करने के पीछे, आलोचना करने वालों की सस्ती प्रसिद्धि पाने की रुग्ण मनोविकृति भी होती है।
इन सब से अलग एक और भी प्रकार के लोग होते हैं, जो मीठी- मीठी बातें करते हैं। नेतृत्व के प्रति वफादारी दिखाने के लिए कसमें खाते हैं, हर कदम पर साथ निभाने की बातें करते हैं, लेकिन वक्त जरूरत पड़ने पर वे कभी भी सामने नहीं आते। जब भी उनके सहयोग की जरूरत होती है, उनके पास बहुत अच्छे बहाने और अजीब से तर्क होते हैं। ऐसे लोग अकसर अपने ही नेतृत्व की कमजोरियों को नोट करते रहते हैं या नेतृत्व की भलमनसाहत को ही कमजोरी मानकर भितरघात के लिए अवसर की तलाश और इंतजार में रहते हैं।
इस प्रकार के लोग दूसरों के मार्फत अपने आप का गुणगान करवाते हैं। वास्तव में ऐसे लोग अब्बल दर्जे के मूर्ख और कुख्यात धूर्त होते हैं, जो अनुभवी लोगों को खुद से कमजोर मानकर अपना और अपने ही संगठन का अत्यधिक नुकसान कर देते हैं। अनेक भले और अच्छे लोग भी इन धूर्तों के कुचक्र में फंसकर अपना सार्वजनिक जीवन बर्बाद कर चुके होते हैं, जबकि अनेक बार आश्चर्यजनक रूप से ऐसे धूर्त लोग खुद की नजरों में और अनेक भोले लोगों की नजरों में खुद को बचा लेने में कामयाब हो जाते हैं!
इस प्रकार सार्वजनिक जीवन में काम करते वक्त अनेक प्रकार के लोगों के बीच रहकर रास्ता तय करना होता। नेतृत्व की हर पल परीक्षा होती रहती है। ऐसे समय में यह निर्णय करना भी नेतृत्व की सफलता या असफलता हेतु निर्णायक साबित होता है कि किसको कब और क्या जवाब देना है और किसकी बात की अनसुनी करनी है।
ऐसे समय में सहयोगी नेतृत्व, मित्रों और शुभचिंतकों की भी परीक्षा हो ही जाती है। इस माने में नेतृत्व के लिए ऐसा चुनौतीपूर्ण समय अपने लोगों की परीक्षा करने का सुअवसर भी होता है और साथ ही नये शुभचिंतकों के लिए भी ऐसे वक्त ही दरवाजे खुलते हैं। अनेक आस्तीन के सांप भी ऐसे समय में डसने के लिए बिलों से बाहर निकल आते हैं तो वहीं इन साँपों के फनों को कुचलने वाले नये साहसी और सच्चे मित्र तथा शुभ चिंतक भी नेतृत्व के साथ आ खड़े होते हैं।
ऐसे समय में यह भी ज्ञात हो जाता है कि नेतृत्व के पास कैसे और कितने सच्चे और कच्चे दोस्त तथा दुश्मन हैं? कितने सच्चे हितचिंतक और कितने शुभचिंतक हैं? कितने दगाबाज और कितने गद्दार हैं? कितनों का आपके पक्ष या विपक्ष में हृदय परिवर्तन होता है?
इन सब हालातों में आज के असहज और अन्यायपूर्ण चुनौतियों से भरे समाज में किसी भी नेतृत्व को सच्चाई की लड़ाई जीतने या अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल सच्ची बात कहने, सच बोलने या सच का साथ देने से ही काम नहीं चलता है, बल्कि सच्ची लड़ाई को जीतने के लिए कम से कम दो प्रकार के दोस्तों की अत्यधिक जरूरत होती हैः-
1. पहले कृष्ण जैसे सच्चे-सद्भावी मित्र और सारथी साथ होने चाहिए, जो बेशक सामने आकर आपके लिए युद्ध न भी लड़ सकें, लेकिन हर कदम पर आपके सच्चे और विश्वसनीय मार्गदर्शक अवश्य बने रहें।
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2. दूसरे कर्ण जैसे वीर और निस्वार्थी दोस्त भी जरूर साथ होने चाहिए, जो दुनिया की नजर में तुम्हारे गलत होने की परवाह नहीं करते हुए सिर्फ और सिर्फ अपनी दोस्ती और दोस्ती के फर्ज को निभाने के लिए आगे आकर लड़ें और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहें।
अंत में एक बात और यह कि कठिन समय में सच्चे मित्र सही और सुगम रास्ता खोजते हैं। हर पल आपका मार्गदर्शन करते हैं, जबकि झूठे और मक्कार लोग आपको भटकाते हैं। बहाने बनाते हैं और आपको गलत सिद्ध करने के लिए किसी भी हद को पार कर जाते हैं।
मगर यही तो जीवन है। मुश्किलों को चुनौती मानकर स्वीकार करने में ही तो हमारी खुद की और हमारे अपनों की सच्ची परीक्षा होती है।
शुक्रिया उन धूर्त, मूर्ख और नकाबपोशों का जिनकी रुग्ण मानसिकता के कारण मैंने अपने जीवन में बहुत-कुछ पाया है। क्योंकि ऐसे लोगों के कारण गद्दारों की नकाब उतर गयी और सच्चे वफादारों को अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करने का समय से पूर्व अवसर मिल गया।
यदि सामाजिक जीवन में काम करने वाले हम सभी लोग उपरोक्त वर्णित हालातों और घटनाओं का अवलोकन करते हुए आगे बढें तो यह तय है कि असफलता भी वरदान सिद्ध हो सकती है।
भारत की कुल आबादी में 90 फीसदी होकर भी वंचित-मोस्ट वर्ग अपने हकों से वंचित है। अतः मोस्ट आन्दोलन के सहभागियों, नेतृत्वकर्ताओं और समर्थकों को पूर्वाग्रही और संकीर्ण सोच को त्यागकर सामूहिक, उदार और सूझबूझ से परिपूर्ण संयुक्त विचारधारा को अपनाने की जरूरत है। मेरी राय में वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा।
नोटः उक्त लेख 03 फरवरी, 2015 को ‘शुक्रिया उन धूर्त, मूर्ख और नकाबपोशों का जिनकी समय से पूर्व नकाब उतर गयी!’’ शीर्षक से प्रकाशित मेरे खुद के एक आलेख को आंशिक रूप से संपादित करके प्रस्तुत किया गया है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, मो. वाअ: 9875066111, 25.07.2017

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