Friday, November 17, 2017

विमर्श: क्या हमारे कार्य करने के तरीकों में खोट या अव्यावहारिकता है?

विमर्श: क्या हमारे कार्य करने के तरीकों में खोट या अव्यावहारिकता है?

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

आजादी के बाद से वंचित समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव, अत्याचार और नाइंसाफी से मुक्ति हेतु अनेकानेक महान समाज सुधारकों ने अनेक अभियान चलाये और व्यथित, पीड़ित, उत्पीड़ित, वंचित लोगों को एकजुट करने के अनेक प्रयास किये। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर मूलभूत समस्याओं के स्थायी समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे। भेदभाव, अत्याचार और नाइंसाफी जस की तस जारी हैं, बल्कि नयी-नयी समस्याएं लगातार बढती जा रही हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश की सरकारों और शासकों के लिये यह स्थिति अपने आप में गहन चिन्ता का विषय होना चाहिये। विशेषकर तब जबकि वंचित समुदायों के वोट से बड़ी आसानी से सरकारें बन और बिगड़ सकती हैं। मगर व्यवहार में ऐसा हो नहीं रहा है।

2014 से 2016 में दुर्घटनाग्रस्त होने तक हक रक्षक दल (HRD) के राष्ट्रीय प्रमुख की हैसियत से मैंने भी अनेक राज्यों में अनेक दर्जन कार्यशालाओं, सभाओं और विविध सामाजिक आयोजनों को मुख्य वक्ता के रूप में प्रबुद्ध लोगों को सम्बोधित किया। लोगों की तालियां भी खूब मिली। देशभर में अनेकानेक विद्वान और अनेक संगठन लगातार अपने-अपने तरीके से प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद वंचित समुदायों की मूलभूत समस्याएं जस की तस कायम हैं, बल्कि वर्तमान में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं।

उपरोक्त पृष्ठभूमि में विद्वजनों के विमर्श हेतु कुछ सवाल प्रस्तुत हैं:-
1. क्या हमारे सुधार के प्रयास नाकाफी हैं?
2. क्या हमारे कार्य करने के तरीकों में खोट या अव्यावहारिकता है?
3. यदि हां तो क्या सुधार अपेक्षित हैं?

'हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन-9875066111, 17.11.2017, जयपुर, राजस्थान।

Thursday, November 16, 2017

यदि वंचितों के भगवान ही तारणहार हैं तो आर्य भगवानों के विरोध का औचित्य?

यदि वंचितों के भगवान ही तारणहार हैं तो आर्य भगवानों के विरोध का औचित्य?

लेख​क: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
15 नवम्बर को वीर बिरसा मुण्डा की जयन्ती पर, बिरसाभक्तों ने बिरसा को भगवान बिरसा सम्बोधित किया। अकसर देखा जाता है कि बिरसा, भीम और बुद्ध के अंधभक्त इन तीनों ही महापुरुषों को भगवान मानकर गुणगान, वंदना और पूजा अर्चना तक करते रहते हैं।












इन हालातें में कुछ सवाल खड़े होना लाजिमी है। जैसे कि—
  • 1. क्या वंचित लोग अपने महापुरुषों को भगवान बनाकर/मानकर, वंचकों से अपने हक हासिल कर पायेंगे?
  • 2. यदि भगवान ही वंचकों के तारणहार हैं तो वंचितों के बुजुर्गों द्वारा पूजे और माने जाते रहे भगवानों का विरोध कितना उचित है?
  • 3. यदि भगवानों की पूजा-अर्चना करके ही मंजिल हासिल हो सकती है तो फिर भगवानों के विरुद्ध आम-भोले लोगों को भटकाना कितना सही है?
  • 4. जो लोग अपने महापुरुषों को भगवान का दर्जा देते हैं। उन लोगों को इस बात का क्या हक है कि वे दूसरे समाजों द्वारा मान्य भगवानों को गाली-गलोंच करें?
  • 5. सामाजिक न्याय, हक-हकूक और भागीदारी के मिशन को किसी धर्म के विरोध या किसी धर्म के प्रचार से जोड़ना कितना सही है?
  • 6. महापुरुषों के अनुकरण हेतु उनकी पूजा-अर्चना ही एक मात्र मार्ग है या महापुरुषों के विचारों पर मंथन और विमर्श करने की भी जरूरत है?
  • 7. क्या पूजा-अर्चना और गुणगान करने से महापुरुषों के अधूरे काम पूरे हो जायेंगे?
उक्त सवालों और ऐसे ही अन्य सवालों पर अपूर्वाग्रही बुद्धिजीवियों से परिणामदायी विमर्श की अपेक्षा है।

'हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन-9875066111, 16.11.2017, Jaipur, Rajasthan

Saturday, November 11, 2017

वंचित वर्गों की बीमारी-ब्राह्मणवाद। जिसे जिन्दा रखने वाला संगठन-आरएसएस। इसका एक मात्र इलाज और टीकाकरण-संविधान का ज्ञान।

वंचित वर्गों की बीमारी-ब्राह्मणवाद। जिसे जिन्दा रखने वाला संगठन-आरएसएस। इसका एक मात्र इलाज और टीकाकरण-संविधान का ज्ञान।

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
आरएसएस किस प्रकार से लोगों के मन में धार्मिक नफरत पैदा रकता है। इसका एक उदाहरण प्रस्तुत है। राजस्थान पुलिस में सिपाही के पद पर सेवारत एक आदिवासी का अनुभव, जो उन्होंने मुझे बताया। सुरक्षा की दृष्टि से उनका नाम, पता गुप्त रखा गया है।



''जरूरत के मुताबिक पुलिस जाप्ता/पुलिस सिपाहियों की तैनाती विभिन्न जगहों पर की जाती रहती है। बीच-बीच में, मैं आरएसएस-भाजपा से जुड़े एक आदिवासी राजनेता की सुरक्षा में भी तैनात रहा हूं। इसी बीच केवल 15 दिन के लिये मैं आरएसएस की शाखा में चला गया। संयोग से इसके बाद मेरी ड्यूटी अजमेर दरगाह में लगा दी गयी। मेरी ड्यूटी अंदर दरगाह में थी, लेकिन आरएसएस की शाखा में जाने के कारण मुसलमानों के प्रति मेरे मन में इतनी घृणा पैदा हो गयी कि दरगाह में अन्दर घुसने का मन तक नहीं करता था। आखिर मैंने तय किया कि भविष्य में कभी भी आरएसएस की शाखा में नहीं जाऊंगा।''

यहां समझने वाली बात यह है कि आरएसएस लोगों के अवचेतन मन को अपने वश में करके, उन्हें कथित रूप से धार्मिक गुलाम बनाने और जन्मजातीय उच्चता के अहंकार से पूरित ब्राह्मणवादी व्यवस्था अंधभक्त समर्थक तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था संरक्षक राष्ट्रवादी बना रहा है। जिसके दो मूल मकसद है-हिन्दुओं को ब्राह्मणी व्यवस्था के अनुसार जातियों में विभाजित करके ब्राह्मण श्रेष्ठता को कायम रखना और जातियों में विभाजित हिन्दुओं को एकजुट करने के लिये मुसलमानों का भय पैदा करके, मुसलमानों के प्रति नफरत पैदा करना। यही आरएसएस का असली सांस्कृतिक और धार्मिक राष्ट्रवाद है। जिसकी खिलाफत करना आरएसएस की दृष्टि में देशद्रोह, अमानवीयता और अधार्मिकता है। जिस दिन देश के वंचित वर्ग को यह बात समझ में आ जायेगी, भारत आरएसएस तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था की मानसिक गुलामी से एक झटके में पूरी तरह से मुक्त हो जायेगा। लेकिन इस गुलामी से मुक्ति के लिये ब्राह्मणों को, हिन्दू धर्म को या हिन्दू धर्म के प्रतीकों का गाली देना मूर्खतापूर्ण, आत्मघाती तथा आपराधिक कृत्य है। जिससे हमें हर कीमत पर बचना होगा। हमें अपने मन में ब्राह्मण सहित किसी के भी प्रति दुर्भाव या नफरत की भावना नहीं रखनी है। क्योंकि आज ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में ऐसी विपन्नता विद्यमान है, कि उनको दो जून की रोटी तक नसीब नहीं है। मगर दु:खद पहलु यह है कि विपन्नता का कोढ झेल रहे ये लोग भी ब्राह्मणी व्यवस्था मानसिक गुलाम है।

अवचेतन मन में स्थापित इस मानसिक गुलामी से मुक्ति का एक ही मंत्र है-'भारत का संविधान' जो भारत के सभी लोगों को एक समान मानने तथा समान रूप से इंसाफ प्रदान करने की गारण्टी देता है। यह व्यवस्था आरएसएस को कदापि मंजूर नहीं है। क्योंकि सभी भारतीयों को समान मानते ही ब्राह्मण की जन्मजातीय श्रृेष्ठता और कुलीनता समाप्त हो जाती है। इसी जन्मजातीय श्रृेष्ठता और कुलीनता पर ब्राह्मणी धर्म के विभेदकारी धार्मिक कानून और उनका कथित धर्म टिका हुआ है। इस प्रकार हर आम-ओ-खास को यह तथ्य समझ में आ जाना जरूरी है कि भारत के वंचित वर्गों की असली बीमारी है-ब्राह्मणवाद। जिसे जिन्दा रखने और फैलाने वाला संगठन है-आरएसएस। इस छूत की बीमारी का एक मात्र पक्का इलाज और टीकाकरण है-संविधान का ज्ञान। साथ ही साथ आरएसएस की गुलामी के गीत गाने वाले वंचित वर्ग के प्रतिनिधियों का सार्वजनिक बहिष्कार।

अत: हमें सबसे पहले आरएसएस के इस दुष्चक्र को समझना और नेस्तनाबूद करना होगा। इससे मुक्ति के लिये संविधान तथा संवैधानिक मूल अधिकारों को ठीक से समझना तथा सभी को ठीक से समझाना होगा। मेरा मत है कि जिस दिन हम संविधान के अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 13 के प्रावधानों के विपरीत संचालित कथित धार्मिक एवं परम्परागत मनमाने कानूनों तथा जन्मजातीय विभेद की प्रवर्तक ब्राह्मणवादी असंवैधानिक धार्मिक व्यवस्था को अच्छे से समझ जायेंगे। इसके बाद आरएसएस का कथित धार्मिक और राष्ट्रवादी मायाजाल स्वत: ही नंगा हो जायेगा। हमारा अवचेतन मन स्वत: ही ब्राह्मणवादी गुलामी से मुक्त हो जायेंगे। इस सबके लिये सबसे पहली जरूरत है-वंचित वर्ग की संयुक्त संवैधानिक विचारधारा और समग्रता का संरक्षक संयुक्त नेतृत्व। जो संविधान के मुताबिक काम करे। इस विषय पर वंचित वर्ग के प्रबुद्ध लोगों को सकारात्मक रूप से तथा सतत रूप से सम्पूर्ण देश में एकजुट होकर काम करने की जरूरत है। साथ ही साथ इस बात को भी अच्छे से समझना और याद रखना होगा कि हम किसी के भी दुश्मन नहीं हैं। हम किसी के भी खिलाफ नहीं हैं। क्योंकि-'हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन-9875066111, 11.11.2017, Jaipur, Rajasthan

Monday, October 23, 2017

बाल विवाह रोकने हैं तो काजी और पुरोहित को पाबन्द किया जाये!

बाल विवाह रोकने हैं तो काजी और पुरोहित को पाबन्द किया जाये!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
बिहार के मुख्यमंत्री ने आदेश दिया है कि बिहार में अगर शादी करनी है तो आपको पहले शपथ पत्र में लिखकर देना होगा कि यह विवाह बाल विवाह नहीं है और इसमें दहेज का कोई लेन-देन नहीं है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत यह शपथ पत्र देना जरूरी होगा। हालांकि शपथ पत्र भरवाने का जिम्मा मैरेज हॉल के प्रबंधकों का होगा। बिना शपथ पत्र भरे मैरिज हॉल की बुकिंग नहीं हो सकती है। उल्लेखनीय है कि बिहार में आज भी 40 प्रतिशत बाल विवाह होते हैं और दहेज हत्या में बिहार का देश में दूसरा स्थान है।

मुख्यमंत्री की पहल नि:संदेह प्रशंसनीय होकर भी नाकाफी है। विचारणीय सवाल यह है कि बाल विवाह करने वाले लोग क्या मैरिज हॉल बुक करने में सक्षम होते हैं? यदि वाकई बिहार के मुख्यमंत्री सहित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी बाल विवाहों को रोकने के लिये संजीदा हैं तो ऐसे फौरी तथा दिखावटी प्रयास करने के बजाय ऐसे व्यावहारिक कानूनी प्रावधान बनाकर लागू करें, जिनसे वाकई वाल विवाह रुक सकें। सरकार को सबसे पहले बाल विवाह के सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों को समझना होगा और उन कारणों का निवारण का वास्तविक निवारण जरूरी है। जिससे कोई भी माता-पिता बाल विवाह करे ही नहीं।


सभी राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को मेरा एक सुझाव: बिहार के मुख्यमंत्री बाल विवाह के बारे में जो शपथ-पत्र भरवाने की जिम्मेदारी मैरेज हॉल के प्रबंधकों पर डाल रहे हैं, यदि ऐसा ही शपथ-पत्र भरकर उसकी तस्दीक करके विधिवत विवाह सम्पन्न करवाने की जिम्मेदारी विवाह सम्पन्न करवाने वाले पुराहितों और काजियों पर डाली जाये तो अधिक सकारात्मक परिणाम सामने आयेंगे। अत: बाल विवाह रोकने हैं तो काजी और पुरोहित को पाबन्द किया जाये और उल्लंघन करने पर हो कठोर सजा का प्रावधान। अन्यथा चोंचलेबाजी बंद हो।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS)-9875066111, 23.10.2017, Jaipur, Rajasthan.

Sunday, October 22, 2017

जेहनी जहरखुरानी


बस या रेल-यात्रा के दौरान जब कोई अनजान व्यक्ति लुभावनी और मीठी-मीठी बातें करके आत्मीयता दर्शाये और खाने-पीने में बेहोशी या नशे का पदार्थ मिलाकर आपका सब कुछ लूट ले तो इसे 'जहरखुरानी' कहा जाता है। जिसके लिये दोषी व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस द्वारा दण्डात्मक कार्यवाही की जाती है।

इसके विपरीत जब कोई चतुर-चालाक व्यक्ति, राजनेता, ढोंगी संत, कथित समाज उद्धारक और, या इनके अंधभक्त झूठे-सच्चे और मनगढंथ किस्से-कहानियों, लच्छेदार भाषण, लुभावने नारे तथा सम्मोहक जुमलों के जरिये आम सभाओं या कैडर-कैम्पस में भोले-भाले लोगों को कुछ समय के लिये या जीवनभर के लिये दिमांगी तौर पर सम्मोहित या गुमराह करके उनका मत और समर्थन हासिल कर लें तो इसे मैं डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 'जेहनी जहरखुरानी' या दिमांगी बेहोशी का अपराध मानता हूं।

यह जहरखुरानी से भी अधिक गम्भीर अपराध है। मगर इसके लिये कानून में कोई सजा मुकर्रर नहीं है। अत: सबसे पहले इस जेहनी जहरखुरानी से बचें-बचायें। द्वितीय यदि सच बोलने की हिम्मत हो तो और जेहनी जहरखुरानी के अपराधियों को सजा दिलवाने के लिये दण्डात्मक कानूनी प्रावधान बनाने की मांग करें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS)-9875066111, 22.10.2017, Jaipur, Rajasthan

Monday, September 25, 2017

भारतीय संविधान किसने बनाया-सर्वे के नतीजे

भारतीय संविधान किसने बनाया-सर्वे के नतीजे

भारत एक लोकतांत्रित गणतंत्र है। इस वजह से सरकार और प्रशासन के संचालन में भारत के संविधान का सर्वाधिक महत्व है। सरकार और प्रशासन के सफल संचालन के लिये देश के लोगों को संविधान का ज्ञान होने की उम्मीद की जाती है। इसके बावजूद भारत में आम नागरिकों और उच्च पदस्थ अधिकारियों तक में संविधान का ज्ञान हासिल करने के प्रति कोई विशेष रुझान नहीं देखा जाता है। सोशल मीडिया पर देशभर के लोग सक्रिय हैं। जो संविधान सहित विभिन्न विषयों पर आये दिन अपनी राय प्रकट करते रहते हैं। ऐसे ही सक्रिय लोगों में से मुझ से वाट्सएप पर देश के 22 प्रदेशों और 4 केन्द्र शासित प्रदेशों के 4213 लोग सीधे जुड़े हुए हैं। ब्रॉड कास्टिंग के जरिये इनके मध्य एक सर्वे आयोजित किया गया। सर्वे का विषय था: *सवाल: भारतीय संविधान किसने बनाया?* हमारी ओर से निम्न 8 विकल्प दिये गये। सर्वे में 4213 में से करीब 68.81% (2899) लोगों ने भाग लिया। जिसे अच्छी भागीदारी माना जा सकता है। जिसके परिणाम इस प्रकार रहे:-

1. डॉ. बीआर अम्बेडकर द्वारा। 1134 (39.12%)
2. भारत के लोगों द्वारा। 45 (1.55 %)
3. संविधान सभा द्वारा। 968 (33.39%)
4. बहुसंख्यक भारतीयों द्वारा। 99 (3.41%)
5. तत्कालीन ताकतवर लोगों द्वारा। 365 (12.59%)
6. ब्रिटिशभक्त राजनेताओं द्वारा। 201 (6.93%)
7. उक्त सभी के द्वारा। 27 (0.93%)
8. अन्य:...... 60 (2.06%)

सर्वे में भाग लेने वालों की सामाजिक हिस्सेदारी आंकड़ों में निम्न प्रकार समझी जा सकती है:
मायनोरिटी के करीब 4.21% (122)
ओबीसी के करीब 14% (403)
अजा वर्ग के करीब 39.15% (1135)
अजजा वर्ग के करीब 36.63% (1062)
अनारक्षित वर्ग के करीब 6.11% (177)

सर्वे में भाग लेने वालों की कुछ रोचक और महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

1. अनारक्षित वर्ग राजकुमार भार्गव चूरू, राजस्थान लिखते हैं कि ''सर जहाँ तक मैंने राजनीति मे पढा था कि सविधान के निर्माता डॉ. बी आर अम्बेडकर को बताया गया था जीसको बनाने मे 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा था। और एक जगह पढा जिसमें बताया गया कि संविधान का निर्माण एक संबिधान सभा ने किया है। संविधान सभा में 299 लोग थे। इन सब लोगों ने मिलकर संबिधान बनाया था। संबिधान सभा के कानूनी सलाहकार B. N. Rao थे। Rao ने ही संबिधान का पहला प्रारूप बनाया था। इस प्रारूप की जांच के लिए एक प्रारूप समिति बनाई गई थी। इस समिति में 8 लोग थे। जिसमें सिर्फ 1 सदस्य आंबेडकर था। जिसे प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया और इसी को संबिधान निर्माता कहते हैं। आंबेडकर को संबिधान सभा में बंगाल से चुना गया था। संबिधान सभा के अध्य्क्ष राजेंद्र प्रसाद थे। लेकिन जनरल केटेगरी का होने के कारण इनका नाम नहीं लिया जाता है। संबिधान सभा के बहस में नेहरू जी और पटेल जी का अहम योगदान था। लेकिन इन दोनों का नाम भी हटा दिया गया। डॉ. राधाकृष्णन सभा के प्रथम प्रवक्ता थे। लेकिन जनरल होने के कारण इनका नाम भी हटा दिया गया।''
2. अजजा वर्ग के कृष्णा मीणा, चाकसू जयपुर राजस्थान लिखते हैं कि ''जहाँ तक मैने पढा है तो यह ब्रिटिश राज में तैयार किया गया अधिनियम था जो उन्होने अपने फायदे के लिए बनाया था पर जब भारत आजाद हुआ तो भारतीय नेताओ ने उसमें कुछ परिवर्तन करके उसे अपना लिया जिसमें हम देख सकते हैं कि आज भी आम आदमी से ज्यादा पैसे वालो का बोलबाला है।''
3. अजजा वर्ग वीसाराम मीणा जालोर, राजस्थान लिखते हैं कि ''मेरे हिसाब से तो सारे तत्व शामिल होंगे. मेरे जहन मे एक प्रशन लगातार आ रहा है कि क्या अंबेडकर नहीं होते तो भारत का संविधान बनता और बनता कैसा बनता. दुनिया भर मे संविधान बने हुए और सारे देशो के संविधान उनके लोगो के कल्याण हेतु बनाए गए है. आपके भारत के संविधान यानि अंबेडकर संविधान कमजोर वर्ग या आपके अनुसार मोस्ट वर्ग को ताकत मिली है या उल्टा जातिवाद का जहर बढता जा रहा है? आपके अनुसार अंबेडकर के संविधान ने मोस्ट वर्ग को ताकत दी है या जातिवाद का जहर बढाया है?''
4. अजजा वर्ग की अनिता सोलंकी, सेंधवा, मध्य प्रदेश लिखती हैं कि ''डॉ बी आर अम्बेडकर द्वारा लेकिन उनके साथ मेंएक नाम हम भूल जाते है जो सिर्फ आदिवासी नाम देकर गये जयपालसिंग मुंडा जिन्होंने आदिवासीयो के लिए संविधानिक लडाई लडे.''
5. अजा वर्ग के कल्पेश आर सोलंकी भरूंच गुजरात लिखते हैं कि ''हम तो समाज में आम्बेडकर वाद लाना चाहते है इस लिये में तो बाबा साहब ही कहुगा''
6. अजा वर्ग की राजेश शाक्य कोटा राजस्थान लिखती हैं कि ''यह सवाल क्यो? डा. भीम राव अम्बेडकर जी ने ही लिखा है.''
7. मॉयनोरिटी वर्ग के सरदार गुरमीत सिंह अम्बाला हरियाणा लिखते हैं कि ''भारतीय संविधान का मूल पाठ अंग्रेजों दुवारा ही निर्मित है, जिसमे कुछ भारतीय सन्दर्भ में पैबन्द लगाए गए है, देश की सबसे बड़ी ताकत न्याय प्रणाली है,जो आई पी सी से चलती है जो अंग्रेजो ने भारतीयों को गुलामी में जकड़ने के लिए 1861 में बनाई थी जो आजाद भारत मे ज्यों की त्यों लागू है,ये ही आई पी सी पाकिस्तान में भी लागू है,किसी कनसीपरेन्सी के तहत ही यह चलन में है।''
8. अजा वर्ग के उत्तम कुमार गौतम, लखनऊ, उत्तर प्रदेश लिखते हैं कि ''संविधान सभा में कुल 7 सदस्य थे, सभी निकम्मे, मूर्ख, बीमार और विदेश घूमने वाले थे. 7तो सदसयो ने कुछ नहीं किया. अकेले बाबा साहब ने संविधान सारा बनाया. संविधान बनाने पर सवाल उठाने वाले बाबा साहब के और बाबा साहब के संविधान के दुश्मन हैं. संविधान बुद्धमय भारत बनाने का सूत्र है. भारत एक दिन बुद्धिस्तान बनेगा.''
9. ओबीसी के प्रेम प्रकाश भाटी, धार मध्य प्रदेश से लिखते है कि ''संविधान तो संविधान सभा ने बनाया था. वोट के लिये अम्बेड़कर को निर्माता बना दिया. सूचना अधिकार कानून के तहत पूछा जा सकता है कि संविधान निर्माता कौन है। संविधान को बनाने में संविधान सभा के सदसय रहे देश के विद्वानों का योगदान है। अकेल अम्बेड़कर को श्रेय देना संविधानसभा का अपमान है।''
10. अनारक्षित वर्ग के अरुण मिश्रा पटना, बिहार से लिखते हैं कि ''संविधान अंग्रेजी अधिनियमों की नकल के साथ दूसरे देशों के संविधानों की नकल है। खुद अम्बेडकर ने भारत के संविधान को दुनिया का सबसे घटिया संविधान बताया है। यही वजह है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। दलित, आदिवासी अभी भी सत्ता से कोसों दूर हैं। कुछ परिवार रिजर्वेशन का फायदा उठा रहे हैं। संघ की चंडान चौकड़ी संविधान की धज्जियां उड़ा रही है। लेकिन संविधान कुछ नहीं कर सकता। ऐसा संविधान किस काम का?''
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 9875066111, 25092017

Monday, September 11, 2017

थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में बाधक

थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में बाधक



1. हम सब को अभिव्यक्ति की आजादी है, लेकिन जमीनी सच्चाई को नकारना मेरी दृष्टि में बुद्धिमता नहीं। यद्यपि विचारणीय तथ्य यह है कि केवल और *केवल डिग्रीधारी या उच्च पद दिलाने वाली शिक्षा के अहंकार से संचालित लोगों की शैक्षिक ईगो (अहंकार) जीवन और समाज को दिशा देने के मामले में खतरनाक सिद्ध हो सकती है। बल्कि खतरनाक सिद्ध हो ही रही है।* मानव व्यवहार शास्त्र और मानव मनोविज्ञान का ज्ञान रखने वाले विश्वस्तरीय विद्वान्/मनीषी इस बात को जानते और मानते हैं कि *दुनिया केवल कानून, तर्क और तथ्यों से न कभी चली है और न कभी चल सकती। जीवन मानव के अवचेतन मन के गहरे तल पर हजारों सालों से स्थापित अच्छे-बुरे संस्कार, ज्ञान, अवधारणाओं, परम्पराओं और अनचाही आदतों से संचालित होता है।*

2. भारत के मोस्ट वर्ग में एक छोटा सा, बल्कि *मुठ्ठीभर लोगों का ऐसा समुदाय है, जो धर्म, अध्यात्म आदि को सीधे-सीधे ढोंग तथा अवैज्ञानिक करार देता है। ऐसे लोगों के समर्थन में भारत की एक फीसदी आबादी भी नहीं है।* जबकि यह वैज्ञानिक सत्य है कि अध्यात्म, प्रार्थना और मैडीटेशन का अवचेतन मन की शक्ति से सीधा जुड़ाव है। जिसे जाने और समझे बिना *अधिकतर आम आस्तिक लोग परमेश्वर, दैवीय शक्ति या अपने आराध्य की प्रार्थना करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से उनको, उनकी प्रार्थनाओं के परिणाम भी मिलते हैं। जिसे मनोवैज्ञानिकों ने संसार के अनेक देशों, धर्मों और नस्लों के लोगों में बार-बार सत्य पाया है। यह अलग बात है कि प्रार्थनाओं से मिलने वाले परिणाम दैवीय शक्ति या आराध्य के ही कारण ही मिलते हैं, इसका आज तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन जिन आस्तिक लोगों को परिणाम मिलते हैं। उनकी आस्था को झुठलाना वैज्ञानिक रूप से इतना सरल नहीं है, जितना कि कुछ कथित कट्टरपंथी नास्तिक समझते हैं।*

3. कड़वा सच तो यह है कि *खुद को नास्तिक कहने और बोलने वाले सबसे बड़े/कट्टर आस्तिक होते हैं। इस विषय में, मेरी ओर से 23 अक्टूबर, 2016 को ''नास्तिकता और आस्तिकता दोनों ही मनोवैज्ञानिक और मानव व्यवहारशास्त्र से जुड़ी अवधारणाएं हैं'' शीर्षक से एक आलेख लिखा था। जिसमें मूलत: स्पष्ट किया गया था कि-
  • (1) मैं अनेक बार चाहकर भी अनेक (नास्तिकता और आस्तिकता से जुड़े) विषयों पर इस कारण से नहीं लिखता, क्योंकि अधिकांश लोग अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त हुए बिना किसी बात को महामानव बुद्ध की दृष्टि से समझने को सहमत ही नहीं होते हैं। ऐसे लोगों के पास अपना खुद का कोई चिन्तन, शोधन या परिष्कार नहीं होता है, बल्कि तोतारटन्त ज्ञान को अन्तिम ज्ञान मानकर विचार व्यक्त करते रहते हैं।
  • (2) नास्तिक और आस्तिक दोनों शब्द भी इसी कारण से समझने में दिक्कत पैदा करते हैं। हमारे यहां पर अधिसंख्य लोग और विशेषकर वे लोग जिनको मनुवादी कारणों से अस्पृश्यता और विभेद का दंश झेलना पड़ा है या झेल रहे हैं, जिनमें मैं भी एक हूं, उन में से अधिकाँश को हर एक बात धार्मिक चश्मे से ही दिखाई देती है।
  • (3) जबकि नास्तिकता और आस्तिकता दोनों ही मनोवैज्ञानिक और मानव व्यवहारशास्त्र से जुड़ी अवधारणाएं हैं, लेकिन मनुवाद विरोधी धर्म के चश्मे से देखने की उनकी आदत निष्पक्षता को छीन चुकी है।
  • (4) उदाहरण: एक भगवान को नहीं मानने वाला भारतीय व्यक्ति बेशक अपने आप को नास्तिक कहता रहे, लेकिन बीमार होने पर वह अपना उपचार उसी चिकित्सा पद्धति और उसी डॉक्टर से करवाता है। जिसके प्रति उसके मन में अनुराग, आस्था अर्थात् आस्तिकता होती है। इसी प्रकार रिश्तों, जाति, रंग, पूंजीवाद, समाजवाद या साम्यवाद आदि के प्रति अनुराग या आस्था होना भी मनोव्यवहारीय (मनोवैज्ञानिक) दृष्टिकोण से आस्तिकता का वैज्ञानिक प्रमाण है। मुझे पता है कि मनुवाद विरोधी चश्में से इन अवधारणाओं पर चिन्तन असम्भव है। अत: अनेक लोग कुतर्क और बहस कर सकते हैं, जबकि यह गहन चिन्तन और चर्चा का विषय है।
12 जुलाई, 2017 को लिखे लेख में मैंने आगे लिखा था कि-

4. जानने और समझने वाली बात यह है कि *इस संसार में ऐसी बहुत सी अज्ञात शक्तियां और ज्ञान की शाखाएं हैं, जिनके बारे में जाने बिना, उन विषयों पर (अन्तिम) निर्णय सुनाने वाले वास्तव में सबसे बड़े अमानवीय और अन्यायी हैं। वंचित/मोस्ट वर्ग में एक समुदाय ऐसे अन्यायी और नास्तिक लोगों की कट्टरपंथी फौज तैयार कर रहा है। जिसकी प्रतिक्रिया में वंचित वर्ग के एक तबके पर लगातार अत्याचार, व्यभिचार और अन्याय बढ़ते जा रहे हैं। जिसकी कीमत सम्पूर्ण मोस्ट वर्ग को चुकानी पड़ रही है। इस विषय में भी, मैं अनेक बार विस्तार से लिख चुका हूँ। फिर भी ऐसे लोगों की पूर्वाग्रही धारणाएं शिथिल नहीं हो रही हैं। जो मोस्ट वर्ग की एकता के लिये सबसे खतरनाक तथा भयावह स्थिति है।*

5. जिन लोगों को अवचेतन मन की शक्ति, मैडिटेशन (ध्यान की निश्छल नीरवता) और लॉ ऑफ़ अट्रेक्शन का प्राथमिक ज्ञान भी रहा होता है, उनके द्वारा कभी भी धर्म, आध्यात्म और आस्तिकता का विरोध नहीं किया जा सकता। लेकिन *कट्टरपंथियों द्वारा ब्रेन वाश किया हुआ पूर्वाग्रही विचारों से ओतप्रोत तथा शाब्दिक ज्ञान की धारा पर तरंगित मन-अवचेतन मन की शक्ति, आकर्षण, न्याय, युक्तियुक्तता, ऋजु इत्यादि अवधारणाओं को न तो जान सकता है और न ही उसे दूसरों की आस्थाओं, विश्वासों, संवेदनाओं तथा सिद्धांतों की परवाह होती है।

6. वजह साफ है, क्योंकि ऐसे ब्रेन वाश किये हुए कट्टरपंथी लोगों और आतंकवादियों के मानसिक स्तर में कोई अंतर नहीं होता। बल्कि दोनों में मौलिक समानता होती है। वजह वैचारिक रूप से दोनों ही कट्टरपंथी होते हैं। कट्टरपंथियों और आतंकियों के अवचेतन मन में मौलिक रूप से एक बात बिठायी जाती है- *मैं जो जानता हूँ, जो करता हूँ, जो बोलता हूँ, वही सच है। अतः इस सच को सारी दुनिया को जानना और मानना चाहिए। जो नहीं मानते वे मूर्ख, गद्दार, देशद्रोही और असामाजिक हैं। अतः ऐसे लोगों को बहिष्कृत किया जाए या तुरंत रास्ते से हटा दिया जाए। दुष्परिणाम हर दिन हत्याएं और बलात्कार हो रहे हैं!*

7. भारत 1947 में आजाद हुआ। भारत में 1950 से लोकतंत्र की गणतंत्रीय व्यवस्था का संचालक संविधान लागू हुआ। इसके बावजूद भी सामाजिक न्याय से वंचित लोगों को संविधान के प्रावधानों के होते हुए न्याय नहीं मिल रहा है। अन्याय और अत्याचार यथावत जारी रहे हैं। वंचित-मोस्ट वर्ग संख्यात्मक दृष्टि से बहुसंख्यक एवं सशक्त होते हुए भी सात दशक बाद भी बिखरा हुआ है और हर मुकाम पर अपमानित तथा शोषित होने को विवश है। *जिसका मूल कारण है-आपसी एकता का अभाव है। मोस्ट वर्ग की एकता में बाधक वही लोग हैं, जिनके हाथ में मोस्ट वर्ग की लगाम रही है। उनको इतनी समझ तक नहीं कि लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करके, उनका स्नेह, अपनापन, सम्मान, मत और समर्थन हासिल नहीं किया जा सकता।*

8. ऐसे लोग इस देश की सत्ता को किसी न किसी बहाने अपने कब्जे में लेने के सपने तो देखते रहते हैं, लेकिन मतदाता के मनोभाव को नहीं समझना चाहते। अत: इनके सपने पूरे होना कभी भी सम्भव नहीं है। जो कोई भी व्यक्ति आम लोगों की सुन नहीं सकता, वह कभी भी अच्छा वक्ता नहीं बन सकता। क्योंकि वक्ता होने के लिए श्रोताओं की जरूरत होती है और श्रोता उसी को सुनते हैं, जो उनकी आस्थाओं, विश्वासों, भावनाओं, आकांक्षाओं, इच्छाओं और जरूरतों का आदर करता हो। *क्या कोई नास्तिक कभी भारत में 99 फीसदी से अधिक आस्तिक मोस्ट वर्ग के लोगों की भावनाओं को धुत्कार कर, उनका चहेता बन सकता है? मेरी राय में कभी नहीं।*

9. याद रहे-*पाखण्ड और आस्थाओं में अंतर होता है। कोई भी व्यक्ति एक बार पाखण्ड को छोड़ने या त्यागने को सहमत किया भी जा सकता है, लेकिन वही व्यक्ति यकायक अपनी आस्थाओं और विश्वासों को नहीं त्याग सकता।* हमें इस बात को स्वीकारना होगा कि परिवर्तन सतत प्रक्रिया है। जिसमें समय लगता है। पीढियां गुजर जाती हैं। तब कहीं थोड़े-बहुत बदलाव दिखने लगते हैं। इस बात को जाने बिना कुछ लोग डंडे के बल पर लोगों को बदलना चाहते हैं। ऐसे लोग मोस्ट वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं। *दुःखद स्थिति यह कि मोस्ट की कमान ऐसे ही लोगों के ही हाथों में है। इससे भी दुःखद यह कि इन लोगों में भी अधिकाँश लोग ढोंगी हैं।*

उपरोक्त लेख का देश के अधिसंख्य अपूर्वाग्रही विद्वानों ने समर्थन किया जो लेख की मूल भावना तथा लेखक का सम्मान है। इसी विषय में मुझे आगे यह और कहना है कि-

10. नास्तिकता और आस्तिकता जैसे विषयों पर सोशल मीडिया पर या वाट्सएप पर चैटिंग के मार्फ़त वांछित परिणाम मिलना तो संदिग्ध है ही, साथ ही साथ, इस कारण नजदीकी लोगों में आपसी दूरियाँ भी बढ़ रही हैं। अतः नास्तिकता समर्थक विद्वानों को कम से कम वंचित/मोस्ट वर्ग के विद्वानों को इस विषय पर समसामयिक हालातों के अनुसार समग्र समाज के हित और अहित को ध्यान में रखकर चिंतन करना होगा। अन्यथा बाद में पछतावे के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।

11. मैं निजी तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 21 एवं 25 के प्रकाश में धार्मिक मामलों को भारत के लोगों का निजी विषय मानकर, इन पर किसी के भी द्वारा, किसी पर भी अपने नास्तिकता के विचार थोपने या आस्तिकता का मजाक उड़ाने या नास्तिकता को स्थापित करने के लिये आस्तिकों को अपमानित करने के समर्थन में नहीं हूँ। हाँ पाखण्ड, ढोंग, अंधविश्वास आदि का आमजन के धार्मिक विश्वास और उस विश्वास के दैनिक जीवन में पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभावों का निष्पक्ष अध्ययन करने के बाद, इन पर अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ काम करने की जरूरत है। जिससे कि लोगों की भावनाओं को आहत किये बिना, उनको स्वेच्छा से इन्हें छोड़ने के लिए सहमत किया जा सके।

12. निःसन्देह धर्मांधता वंचित वर्गों के समग्र विकास में बाधक है, लेकिन थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में सबसे बड़ी बाधा है! नास्तिकता का आरोपण करोड़ों लोगों के जीवन जीने के आधार धर्म, आस्था तथा विश्वास को कुचलने के समान है। हम जिन वंचित लोगों को आगे बढाने के लिये काम करना चाहते हैं। हम जिन वंचित लोगों के समर्थन से राजनीतिक सत्ता पाना चाहते हैं। यदि वही लोग असहज या नाखुश अनुभव करके, हम से दूर जाने लगें तो ऐसी नास्तिकता किस काम की? समझने वाली महत्वूपर्ण बात यह है कि जैसे-जैसे लोगों को सत्य के ज्ञान के साथ-साथ, सत्य का अनुभव भी होगा, स्वत: ही बदलाव की बयार बहने लगेगी।

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 9875066111, 11092017

Sunday, September 10, 2017

14 फर्जी बाबाओं की सूची की आधिकारिकता पर सवाल?

14 फर्जी बाबाओं की सूची की आधिकारिकता पर सवाल?

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने आज 10 सितम्बर, 2017 को संगमनगरी इलाहाबाद में विशेष बैठक करके 14 फर्जी बाबाओं की सूची जारी की है। इलाहाबाद के बाघंबरी मठ में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की विशेष बैठक में 13 अखाड़ा के 26 संत शामिल हुए। इस बैठक में 14 फर्जी बाबाओं के सामूहिक बहिष्कार का भी फैसला किया गया। बैठक के बाद परिषद अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि का कहना है कि फर्जी धर्मगुरुओं से सनातन धर्म के स्वरूप को काफी नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा सोशल मीडिया में संतों व प्रमुख नेताओं के खिलाफ हो रहे गलत शब्दों के प्रयोग पर भी नाराजगी व्यक्त कर प्रशासन से अंकुश लगाने की मांग की गयी है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की ओर से जारी बयान के अनुसार फर्जी बाबा की सूची इस प्रकार है:—

1- आसाराम बापू उर्फ आशुमल शिरमलानी
2- सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां
3- सच्चिदानंद गिरि उर्फ सचिन दत्ता
4- गुरमीत सिंह राम रहीम सच्चा डेरा, सिरसा।
5- ओम बाबा उर्फ विवेकानंद झा।
6- निर्मल बाबा उर्फ निर्मलप्रीत सिंह।
7- इच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी।
8- स्वामी असीमानंद।
9- ऊं नम: शिवाय।
10- नारायण साईं।
11 राम पाल।
12- आचार्य कुशमुनि
13- बृहस्पति गिरि
14- मलखान गिरि।

उपरोक्त बयान जारी किये जाने पर कुछ सवाल जो आमजन के मन में उठ सकते हैं और उठने भी चाहिये:—

1. बेशक अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का सनातन धर्म से वास्ता है, लेकिन भारत में कथित रूप से इन्हीं सनातन धर्मियों का बाहुल्य बताया जाता है। अत: बयान जारी करने में इनको इतना लम्बा समय क्यों लगा?
2. केवल 14 फर्जी बाबाओं को फर्जी बताने की सूची जारी की गयी है। इसका अभिप्राय क्या यह नहीं है कि इनके अलावा क्या शेष सभी बाबा असली हैं? आगे चलकर 14 की सूची में शामिल फर्जी बाबाओं के अलावा यदि किसी सनातनधर्मी बाबा ने अशोभनीय कुकृत्य किया तो क्या उसके लिये अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद जिम्मेदार होगी?
देश के आम लोगों के उपरोक्त और बहुत सारे संदेहों को दूर करने के लिये अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को देशभर में स्थिति साफ करनी चाहिये? साथ में देश और दुनिया को यह भी बताया जाना चाहिये कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को इस प्रकार के प्रमाण-पत्र जारी करने की आधिकारिकता कहां से मिली?
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 9875066111, 10092017

Saturday, September 9, 2017

बेरोकटरोक पुलिस का डंडा, नीट के खिलाफ 'जस्टिस फॉर अनीता' पर रोक। गलत कौन है-संविधान, संविधान लागू करने वाली सरकार या सुप्रीम कोर्ट?

बेरोकटरोक पुलिस का डंडा, नीट के खिलाफ 'जस्टिस फॉर अनीता' पर रोक।
गलत कौन है-संविधान, संविधान लागू करने वाली सरकार या सुप्रीम कोर्ट?

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
संविधान के अनुच्छेद 21 में सम्पूर्ण गरिमा के साथ जीवन जीना प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 226 एवं 32 में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की गारण्टी न्यायपालिका के कंधों पर है। बावजूद इसके सम्पूर्ण भारत में हर दिन पुलिस लोगों को बेइज्जत करते हुए बेरहमी से डंडा बरसाती रहती है। एक आम नागरिक से लेकर समस्त जनप्रतिनिधि, मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, जज और राष्ट्रपति तक, सब के सब जानते हैं कि हर दिन संविधान को तार-तार करते हुए पुलिस हर रोज सरेराह लोगों पर डंडा बरसाती रहती है। मगर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि पुलिस के डंडे का बार केवल आम लोगों पर होता है।



इसके विपरीत 8 सितम्बर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सूरतसिंह को प्रस्तुत मामले में जिरह करने से वंचित करते हुए याचिका को निरस्त कर देते हैं। साथ ही 50 हजार का जुर्माना भी लगा देते हैं। केवल इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा को वरिष्ठ वकील सूरतसिंह को द्वारा जिरह करने की मांग करने से इतना अपमान और असम्मान महसूस होता है कि न्यायिक अवमानना की धमकी देते हुए वकील को जेल भेजने की धमकी देते हैं। जबकि उसी सु्प्रीम कोर्ट के समक्ष न्याय की आस में हत्या के हजारों मुकदमें दशकों तक लम्बित पड़े रहते हैं। दशकों बाद अनेक आरोपियों को निर्दोष मानकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिहा कर दिया जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट निर्दोष करार दिये जाते समय किसी भी निर्दोष व्यक्ति के सम्मान या जीवन की भरपाई करने के लिये कभी कोई आदेश जारी नहीं करता है? शायद ऐसे लोगों का सम्मान सुप्रीम कोर्ट को याद ही नहीं रहता है?

देशभर में सरेआम लोगों के साथ विभेद और अत्याचार जारी है! क्या यही वजह है कि राजस्थान की राजधानी जयपुर के रामगंज बाजार में 8 सितम्बर, 2017 को ही अकारण ही पुलिस का जवान एक बाइक सवार निर्दोष व्यक्ति पर डंडा बरसा देता है? जिसकी कड़ी प्रतिक्रिया होती है। आम लोग भड़क जाते हैं और जयपुर जल उठता है! इसके बावजदू सभी संवैधानिक संस्थान मौन साधे रहते हैं! एक ओर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस को अपने सम्मान की रक्षा करने की इतनी चिन्ता है कि जज की कुर्सी पर बैठकर वरिष्ठ वकील को जेल भेजने की धमकी दी जाती है। दूसरी ओर पुलिस बेरोकटोक लोगों पर डंडा बरसाती रहती है। पुलिस पीड़ितों के मुकदमें तक दायर नहीं करती है और हत्यारें, चोर, डकैत और सफेदपोश लोगों को संरक्षण प्रदान किया जाता है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में गरिमापूर्ण जीवन जीने का मूल अधिकार किसको दिया गया है? अपने सम्मान के लिये उतावली न्यायपालिका जानवरों की भांति लोगोंं पर डंडा बरसाने वाली पुलिस के विरुद्ध कभी स्वयं संज्ञान क्यों नहीं लेती है? ऐसे मामलों में पुलिस तथा सरकारों के विरुद्ध संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों की अवमानना की कार्यवाही नहीं की जाती है! क्या सुप्रीम कोर्ट को केवल अपनी स्वघोषित और स्वपरिभाषित अवमानना की तुलना में संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों अवमानना की कोई परवाह नहीं है? यदि ऐसा नहीं है तो ऐसा क्यों हो रहा है? जनता को पूछने का हक है कि इस सब के लिये कौन जिम्मेदार है?

'जस्टिस फॉर अनीता' नाम से तमिलनाडू में नीट के खिलाफ जारी प्रदर्शनों को भी 8 सितम्बर, 2017 को ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा गलत मानते हुए, प्रदर्शनों को रोकने के आदेश जारी किये जाते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि लोक सेवकों द्वारा हड़ताल करने को असंवैधानिक ठहरा चुके सुप्रीम कोर्ट द्वारा-ओबीसी को उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण प्रदान करने के खिलाफ हड़ताल करने वाले अनारक्षित वर्ग के लोक सेवकों की असंवैधानिक और गैर कानूनी हड़ताल को सही ठहराते हुए सप्रीम कोर्ट केन्द्र सरकार को आदेश जारी कर चुका है कि हड़तालियों को सरकारी सेवा से अनुपस्थित मानकर, उनका वेतन काटने का निर्णय लेकर केन्द्र सरकार हड़तालियों के प्रति निर्मम नहीं हो सकती है? आरक्षण के विरुद्ध हड़ताल करने वालों को ड्यूटी पर माना जावे और उनको पूर्ण वेतन दिया जावे। वही सुप्रीम कोर्ट 'जस्टिस फॉर अनीता' की मांग पर रोक लगा देता है! क्या यही लोकतंत्र है?

इन सब हालातों में देश के लोगों को क्या यह सवाल पूछने का हक नहीं है कि गलत कौन है-संविधान, संविधान लागू करने वाली सरकार या सुप्रीम कोर्ट? इस सवाल का जवाब तो तलाशना ही होगा? क्योंकि लोकतंत्र का दूसरा नाम सवाल पूछने की आजादी है!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 9875066111, 09092017

Thursday, August 31, 2017

उत्तर पश्चिम रेलवे की महिला अधिकारी अंशुल सारस्वत ने मुख्य कार्यालय अधीक्षक राजेंद्रसिंह को पीटा और रेल संगठन विभागीय कार्यवाही के बहाने मामले को दबा रहे हैं?

उत्तर पश्चिम रेलवे की महिला अधिकारी अंशुल सारस्वत ने मुख्य कार्यालय अधीक्षक राजेंद्रसिंह को पीटा और रेल संगठन विभागीय कार्यवाही के बहाने मामले को दबा रहे हैं?

लेखक: डॉ. पुरुषोत्त्म मीणा 'निरंकुश'
उत्तर पश्चिम रेलवे मुख्यालय जयपुर में कार्यरत प्रथम श्रेणी महिला अधिकारी अंशुल सारस्वत ने 30 अगस्त, 2017 को तृतीय श्रेणी रेलकर्मी मुख्य कार्यालय अधीक्षक राजेंद्रसिंह को सार्वजनिक रूप से अपशब्द कहते हुए 2-3 थप्पड़ जड़ दिये। इस आपराधिक कृत्य की तत्काल पुलिस में रिपोर्ट करके महिला अधिकारी को गिरफ्तार करवाने के बजाय रेलवे कर्मचारी संगठन विभाग प्रमुख से महिला अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही की मांग कर रहे हैं। अकसर रेलवे सहित सभी सरकारी विभागों में आपराधिक घटनाओं को इसी प्रकार से दबाया जाता है। जिन आपराधिक मामलों में आरोपियों को पुलिस की गिरफ्त और अन्तत: जेल में होना चाहिये, ऐसे मामलों को विभागीय स्तर पर भी रफादफा कर दिया जाता है। जिनमें उच्च अफसरशाही से साठगांठ रखने वाले रेलवे कर्मचारी संगठनों की प्रमुख भूमिका होती है। रेलकर्मरी संगठन कर्मचारियों के हितों की रक्षा के बजाय उच्चाधिकारियों के संरक्षण के लिये काम करते देखे जा सकते हैं।

दैनिक भास्कर, जयपुर पेज 3, 31 अगस्त, 2017 की खबर 

प्रस्तुत आपराधिक मामले में पीड़ित मुख्य कार्यालय अधीक्षक राजेंद्रसिंह के सरकारी दायित्वों के ईमानदारी से निर्वाह करने में व्यवधान पैदा करने, पीड़ित की मानहानि करने और उसकी मारपीट करने सहित, अपनी पदस्थिति का दुरूपयोग करने के गम्भीर अपराध में महिला रेल आधिकारी के विरूद्ध तत्काल पुलिस में मामला पेश करके एफआईआर दर्ज करनी चाहिये। इसके बाद विभागीय अनुशासनहीनता की कार्यवाही तो रेल विभाग प्रमुख को करनी ही होगी और दोनों स्तर पर मामले चलेंगे। दोषी पाये जाने पर दोनों स्तर पर सजा भी भुगतनी होगी। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य है कि अपने आप को पढे-लिखे कहने वाले, सरकारी बड़े बाबू उच्च पदस्थ रेल अफसरों से भयभीत, बल्कि आतंकित रहते हैं और रेलकर्मचारी संगठन विभागीय कार्यवाही के नाम पर उनको गुमराह करते रहते हैं। इस कारण मामले विभागीय स्तर पर ही दब जाते हैं। जिससे ऐसे उद्दंड और आपराधिक प्रवृत्ति के अफसरों के होंसले बुलन्द होते जाते हैं। जबकि इस मामले की पुलिस में रिपोर्ट करना पीड़ित का पहला अधिकार और दायित्व है। वहीं विभाग प्रमुख का भी पदीय दायित्व है, कि वह तुरंत पुलिस को रिपोर्ट पेश करें।
डॉ. पुरुषोत्त्म मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 9875066111, 31 अगस्त, 2017
https://www.bhaskar.com/news/RAJ-JAI-HMU-MAT-latest-jaipur-news-031007-3305148-NOR.html

Monday, August 28, 2017

ऐसे कमेंट्स से समस्त वंचित वर्ग के लोग और डॉ. अम्बेड़कर जैसे इतिहास पुरुष निशाने पर आते हैं!

ऐसे कमेंट्स से समस्त वंचित वर्ग के लोग और डॉ. अम्बेड़कर जैसे इतिहास पुरुष निशाने पर आते हैं!

राम-रहीम को दोषी ठहराये जाने के बाद अम्बेड़कर के कार्यों को तहस-नहस करने वालों में शामिल किसी अपरिपक्व व्यक्ति ने एक मैसेज या कमेंट जारी/पास किया। जिसे बिना जाने-समझे अंधभक्तों ने आगे फारवर्ड करना शुरू कर दिया। कोपी पेस्ट में आस्था रखने वाले अनेक मित्रों से यह मैसेज मुझे इन बॉक्स में मिला। आप भी पढें-

''इसको कहते है कलम की ताकत कल तक अपने आपको भगवान कहलाने वाला आज संविधान के सामने रहम की भीख मांग राह है आज फिर दैवीय शक्ति हार गई और संविधान की जीत हुई है ओर पूरे विश्व ने माना कि भारत मे सिर्फ एक ही बाबा है वो है बाबा साहेब अंबेडकर जागो साथियो जागो। बाबा साहेब अम्बेडकर अमर रहे''

इस बारे में मेरा यह कहना है कि-


सबसे पहले तो इस मामले में अम्बेडकर को बीच में लाकर ऐसे लोग क्या सिद्ध करना चाहते हैं? क्योंकि जब हजारों दोषी कानून को ठेंगा दिखा कर अदालतों से छूट जाते हैं और हो सकता है कि आगे जाकर यह राम-रहीम भी छूट जाए? तब भी क्या इसके लिये अम्बेडकर को ही जिम्मेदार ठहराया जायेगा? मेरी राय में इस तरह के कमेंट पास करना निहायती ही बचकाना और आत्मघाती दृष्टिकोण है, जिसके कारण समस्त वंचित वर्ग को और डॉ. अम्बेड़कर जैसे विधिवेत्ता के व्यक्तित्व को बहुत नुकसान हो रहा है।

दूसरी बात: कमेन्ट में लिखा है कि-'पूरे विश्व ने माना कि भारत मे सिर्फ एक ही बाबा है वो है बाबा साहेब अंबेडकर'-इस टिप्पणी का आधार क्या है? विश्व में किसने मान लिया? कोई बयान? कोई घोषणा? कोई प्रस्ताव पास हुआ क्या? शर्म नहीं आती ऐसे लोगों को जो जबरदस्ती आम लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं!

अत: इस बात को सम्पूर्ण संजीदगी से समझना होगा कि ऐसी रुग्ण मानसिकता के लोगों से विचारों से सावधान रहने की जरूरत है। हां यदि यही मैसेज संशोधित होकर निम्न प्रकार से होता तो कोई बात होती-

''कल तक अपने आपको भगवान कहलाने वाला आज कानून के सामने रहम की भीख मांग राह है! आज दैवीय शक्ति हार गई और कानून की जीत हुई। इसे कहते हैं कानून का शासन!''

यह मैसेज न तो भड़काउ है और न हीं किसी व्यक्ति या वर्ग को बढाने या गिराने वाला। वैसे भी राम-रहीम संविधान का नहीं, कानून का कैदी है। क्योंकि उसने उस आईपीसी का उल्लंधन किया है, जो भारत में संविधान लागू होने से अनेक दशक पहले से भारत में लागू है।


मेरी व्यक्तिगत सलाह है कि इस प्रकार के मैसेज प्रोत्साहित नहीं किये जावें। इनसे अनेक लोगों की भावनाएं आहत होती हैं और ऐसे कमेंट्स के कारण समस्त वंचित वर्ग के लोग और डॉ. अम्बेड़कर जैसे इतिहास पुरुष निशाने पर आते हैं। यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि अपराधी की कोई जाति या धर्म या वर्ग नहीं होता। हर दिन हर कौम, धर्म और वर्ग के लोग अपराध करते हुए पकड़े जाते रहते हैं। कानून को अपना काम करने दिया जावे। विरोध करना है तो चोर का नहीं, चोर की मां का करो। चोर की मां है-राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ। जो इस देश को धार्मिक उन्माद, साम्प्रदायिकता और षड़यंत्रों में उलझाता रहता है और लोगों को जन्म के आधार पर जातियों में बांटकर इंसाफ से वंचित करने में विश्वास करता है।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल सा.सं., 9875066111, 280817

Wednesday, August 23, 2017

भारत के मूलवासी-आदिवासी का अस्तित्व मिटाने के लिये:-

*भारत के मूलवासी-आदिवासी का अस्तित्व मिटाने के लिये:-*


लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
1. *संघ* ने आदिवासी को कभी भी आदिवासी नहीं माना, बल्कि आदिवासी को वनवासी, गिरिवासी, वनबंधु, गिरिजन आदि अनेक नये नाम दे दिये।
2. *अम्बेडकर* ने संघियों की मदद से संविधान में आदिवासी की जगह *अजजा* लिख दिया। या संघियों ने अम्बेडकर की मदद करके आदिवासी की जगह *अजजा* लिखवा दिया। जिसके कारण सम्पूर्ण भारत के सम्पूर्ण आदिवासियों को एक समान संवैधानिक, वैधानिक तथा राजनीतिक संरक्षण मिलने की सारी सम्भावनाएं सदैव के लिये समाप्त हो गयी और आदिवासी को जनजाति बनाकर कमजोर तथा विखण्डित कर दिया गया।
3. *कांशीराम* ने जनजाति बनाये आदिवासी को बुद्ध के बहुजन में मर्ज कर दिया। यद्यपि बहुजन नेतृत्व में आदिवासी को कभी कोई हिस्सेदारी नहीं दी।
4. *मायावती* ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में अजजा के लिये सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को ही समाप्त करके *अजा* के लिये आरक्षित कर दिया और अजजा में शामिल अनेक जाति-समुदायों को अजा वर्ग में शामिल करके उत्तर प्रदेश को आदिवासीमुक्त बना दिया।
5. *ईसाई मिशनरियों* ने आदिवासी की दयनीय दुर्दशा का लाभ उठाकर, आदिवासी को ईसाई बनाने का अभियान चला रखा है। जिसमें उन्हें सफलता मिल रही है।
6. *कॉर्पोरेट-पूंजीपतियों* ने आदिवासी क्षेत्र में जमा अमूल्य खनिज सम्पदा को लूटने के लिये प्रशासन और सरकार को खरीदकर, आदिवासी को नक्सली घोषित करवा दिया।
7. *केंद्र सरकार* ने संयुक्त राष्ट्र संघ में घोषणा कर दी की भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ की परिभाषा के अनुसार कोई भी आदिवासी नहीं है।
8. *बामसेफ* ने मूलवासी से मिलते-जुलते मूलनिवासी शब्द का उपयोग करके भारत की 85% आबादी को भारत की मूलवासी बनाने की फर्जी मुहिम चलाकर आदिवासियों के गौरवमयी मूलवंशी इतिहास को नेस्तनाबूद करने की प्रतिज्ञा की हुई है।
9. *खुद आदिवासियों* ने उक्त हालातों में संघ के गुलाम बने आदिवासी राजनेताओं के बहकावे और सम्मोहन में फंसकर भारत की सत्ता *कॉरपोरेट-पूंजीवादी समर्थक भाजपा को सौंपने की आत्मघाती भूल कर डाली।*
10. *भाजपा की मोदी सरकार* ने 2016 में *विश्व आदिवासी दिवस* को *विश्व आदिवासी निर्मूलन दिवस* के रूप में मनाकर आदिवासी को सरकारी स्तर पर समाप्त करने की औपचारिक शुरूआत कर दी है।
11. उपरोक्त हालातों के बावजूद अभी भी आदिवासी को यह समझ में नहीं आ रहा कि *जब तक आदिवासी खुद, अपने अस्तित्व की रक्षा नहीं करेगा, बाहरी कोई भी व्यक्ति, राजनेता, संगठन राजनीतिक दल आदिवासी के कुछ नहीं कर सकता।* आदिवासी को संघियों, बासपाईयों, बामसेफियों और इन सबके मानसिक, राजनतिक एवं आर्थिक गुलाम आदिवासी राजनेताओं एवं पेड राईटर्स के पिछलग्गू बनने की आत्मघाती नीति को तुरंत त्यागकर खुद आगे आना होगा। अपनी शर्तों पर वंचित वर्ग के दूसरे समुदायों का सहयोग लेने तथा सहयोग देने की सम्मानजनक नीति सीखनी होगी।

*सावधान:* जनता की पसीने की कमाई से जीवनभर रस-मलाई तथा सुख-सुविधाएं भोगने वाले कमीशनखोर (किन्हीं अपवादों को छोड़कर) पूर्व नौकरशाहों और पूंजीतिपियों के राजनीति में प्रवेश करने के कारण भारतीय लोकतंत्र अंतिम सांसें गिन रहा है।

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय पुमख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
M/WA 9875066111, 23 अगस्त, 2017

Saturday, August 19, 2017

संसार में आदिवासी 50 करोड़ और अकेले भारत में 110 करोड़? कैसे?

*संसार में आदिवासी 50 करोड़ और अकेले भारत में 110 करोड़? कैसे?*


संयुक्त राष्ट्रसंघ के मुताबिक विश्वभर के 72 देशों के इंडीजिनियश (स्वदेशी) पीपुल/आदिवासियों की 5000 प्रजातियों की कुल आबादी 50 करोड़ से कम है। जबकि बामसेफ द्वारा घोषित भारत के इंडीजिनियश (स्वदेशी) पीपुल/मूलनिवासियों की कुल आबादी 110 करोड़ से अधिक है। जो संसार के समस्त इंडीजिनियश (स्वदेशी) पीपुल/आदिवासियों की संख्या से भी दुगनी है। क्या यह सम्भव है? यदि हाँ तो कैसे? क्या यह आर्यवर्णी शूद्रों को भारत के बाप-दादा बनाने हेतु बनायी गयी बमसाडी डीएनए रिपोर्ट का कमाल है? *-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-9875066111, 19.08.2017*




Friday, August 18, 2017

विश्व आदिवासी दिवस को विश्व मूलनिवासी दिवस लिखने वालों का पर्दाफाश? संसारभर के कुल इंडीजिनियश (स्वदेशी) पीपुल की आबादी 50 करोड़ से कम, जबकि अकेले भारत में खुद को मूलनिवासी के आधार पर इंडीजिनियश (स्वदेशी) पीपुल कहने वालों की कुल आबादी 110 करोड़ से अधिक! क्या यह सम्भव है?

*विश्व आदिवासी दिवस को विश्व मूलनिवासी दिवस लिखने वालों का पर्दाफाश? संसारभर के कुल इंडीजिनियश (स्वदेशी) पीपुल की आबादी 50 करोड़ से कम, जबकि अकेले भारत में खुद को मूलनिवासी के आधार पर इंडीजिनियश (स्वदेशी) पीपुल कहने वालों की कुल आबादी 110 करोड़ से अधिक! क्या यह सम्भव है?*

*विस्तार से जानने के लिये निम्न विवरण पढ़ें।*

सबसे पहले स्पष्ट कर दूं कि *हम* भारत की 90 फीसदी वंचित/MOST (Minority + OBC + SC + Tribals) आबादी की आत्मीय एकता, संयुक्त विचारधारा और संयुक्त नेतृत्व में सामाजिक न्याय के मिशन के संचालन के हिमायती हैं, लेकिन *मूलनिवासी शब्द की आड़ में भारत को देशी और विदेशी के आधार पर काल्पनिक नस्लीय विभेद के बहाने देश को गृहयुद्ध की ओर धकेलने के लिये संचालित आर्यवंशी शूद्रवर्णी षड्यन्त्र का हम कभी भी समर्थन नहीं कर सकते!* अतः राष्ट्रहित में *विश्व आदिवासी दिवस* को *विश्व मूलनिवासी दिवस* घोषित करने वालों का पर्दाफाश करना आज की जरूरत हो गया है।

संसार की कुल आबादी में भारत की कुल आबादी का हिस्सा करीब 15 प्रतिशत है। भारत में आदिवासी के विरुद्ध संचालित मूलनिवासी षड्यन्त्र का पर्दाफाश करना है तो भारत के इंसाफ़पसन्द लोगों को आबादी के इन आंकड़ों को पहले खुद समझना होगा और फिर दुनिया को समझाना होगा। *अन्यथा आर्यवंशी शूद्रवर्णी लोगों द्वारा मूलनिवासी षड्यन्त्र जारी रहेगा। जिसके जरिये देश तथा दुनिया को गुमराह करके और भारत को गृहयुद्ध की ओर धकेला जाना जारी रहेगा।*

भारत की 85% आबादी को भारत के शूद्र और मूलनिवासी अर्थात स्वदेशी घोषित करने वाले *आर्यवंशी शूद्रवर्णी लोगों और बामसेफियों से मेरा सीधा सवाल है:--*

*"संयुक्त राष्ट्रसंघ के मुताबिक इंडीजिनियश (स्वदेशी) पीपुल की श्रेणी में शामिल 72 देशों की 5000 प्रजातियों की कुल आबादी संसार की कुल आबादी का मात्र 6 प्रतिशत है। (जो वर्तमान में करीब-करीब 42 से 50 करोड़ है) जबकि भारत के कथित मूलनिवासियों की कुल आबादी भारत की कुल आबादी की 85% अर्थात 110 करोड़ से अधिक है। क्या यह सम्भव है? डीएनए की आड़ में संचालित मूलनिवासी षड्यन्त्र के संचालकों को इस सवाल का जवाब देना होगा। अन्यथा डीएनए और मूलनिवासी षड्यन्त्र को तुरन्त बंद करना होगा।"*

*डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'*
*राष्ट्रीय प्रमुख*
*हक रक्षक दल (HRD)*
*9875066111/18.08.17*

Monday, August 14, 2017

कौन जिन्दाबाद और कौन मुर्दाबाद?

कौन जिन्दाबाद और कौन मुर्दाबाद?
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
15 अगस्त, 1947 को भारत अन्तिम बार अंग्रेजी सत्ता से आजाद हुआ था। अन्तिम बार इसलिये लिखा, क्योंकि भारत की जनता हजारों बार आजाद और गुलाम होती रही है। अबोध तथा मासूम बच्चों से इस दिन जिन्दाबाद के नारे लगवाये जाते हैं, लेकिन विद्यालयों में मुर्दाबाद के नारे लगवाने की परम्परा विकसित ही नहीं होने दी गयी!। आखिर क्यों? जबकि अभिव्यक्ति के अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार के तहत हर व्यक्ति को यह जानने का हक तो होना ही चाहिये कि झूठ और सच क्या है?
1. जातीय तथा साम्प्रदायिक हिंसा, फासिस्टवाद, मनुवाद तथा जन्मजातीय विभेद की पाठशाला संचालित करने वाले, लेकिन राष्ट्रभक्ति का लाईसेंस बांटने वाले संघ, संघ के विद्यार्थी गोडसे तथा गोडसे के वंशजों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
2. हजारों सालों से शोषित और प्रताड़ित अछूतों को अंग्रेजी सत्ता से मिले दो वोट तथा पृथक निर्वाचन के हक को छीनने वाले, लेकिन अहिंसा के पुजारी कहलवाने वाले एमके गांधी को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
3. अंग्रेजों की गुलामी करके आजादी के परवानों के खिलाफ गवाही देने वालों द्वारा वर्तमान में राष्ट्रभक्ति के लाईसेंस बांटने की राजनीति को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
4. सामाजिक न्याय के नाम पर वंचितों को गुमराह करके उच्च जातीय आर्यों को संविधान के विरुद्ध आरक्षण की मांग करने वालों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
5. गौ-रक्षा के नाम पर अछूतों तथा मुसलमानों का कत्लेआम करने और इन कत्लेआम पर मगरमच्छी आंसु बहाने वाले प्रधान सेवक को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
6. जातिवाद तथा अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष करने वाले, लेकिन संविधान से आदिवासी का नामोनिशान मिटाने वाले डॉ. बीआर अम्बेड़कर को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
7. अजा एवं अजजा के नाम पर संगठन बनाकर संगठनों के नीति-नियन्तों पदों से अजजा को 70 साल से वंचित रखने वाले अजा नेतृत्व को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
8. अजा एवं अजजा के लिये आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित होकर भी अजा एवं अजजा के मुद्दों पर मौन रहने वाले सांसदों और विधायकों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
9. आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी हासिल करने वाले लोक सेवकों के दारू, धन/दहेज (भ्रष्टाचार) और धर्मान्धता को बढावा देने वाले कार्यों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
10. नारियों की पूजा करने की खोखली गाथाओं का बखान करके, लैंगिक विभेद को जिन्दा रखने वाले तथा कन्याभ्रूण हत्यारों को संरक्षण देने वालों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
11. मुसलमानों के विरुद्ध घृणा फैलाने के लिये गुलाबी क्रान्ति (गोमांस) का विरोध करके, सत्ता हासिल करके गोमांस निर्यात को बढावा देने वालों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
नोट: विद्वजन इस लिस्ट को बढा सकते हैं!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/15.08.2017

Wednesday, August 9, 2017

‘हम आदिवासियों के साथ हैं'-संयुक्त राष्ट्र संघ! ‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं'-भारत सरकार!! 'आदिवासी नहीं, मूलनिवासी दिवस'-आर्यवंशी शूद्र!!!

*‘हम आदिवासियों के साथ हैं'-संयुक्त राष्ट्र संघ*
*‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं'-भारत सरकार!! *
*'आदिवासी नहीं, मूलनिवासी दिवस'-आर्यवंशी शूद्र!*


*डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’*
9 अगस्त को विश्‍व आदिवासी दिवस है। कितने आदिवासी जानते हैं कि यह दिन कब से और क्यों मनाया जाता है? विश्‍व आदिवासी दिवस के प्रति सरकार और खुद आदिवासियों के क्या दायित्व है? आदिवासियों के निर्वाचित जन प्रतिनिधि और आदिवासी कोटे में नियुक्त लोक सेवक विश्‍व आदिवासी दिवस के मकसद को पूरा करने के लिये अपने आदिवासियों के प्रति कितने संवेदनशील, समर्पित और निष्ठावान हैं?




*विश्‍व आदिवासी दिवस का संक्षिप्त इतिहास:*

द वर्डस इंडीजिनियश The world's Indigenous अर्थात् विश्व के इंडीजिनियश पीपुल अर्थात् विश्‍व के आदिवासियों के हकों और मानव अधिकारों को विश्‍वभर में क्रियान्वित करने और उनके संरक्षण के लिए अब से 35 वर्ष पूर्व अर्थात् वर्ष-1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) द्वारा एक UNWGEP नामक कार्यदल उप आयोग का गठन किया गया। जिसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को सम्पन्न हुई थी।

उक्त कार्यदल ने आदिवासियों की समस्याओं के निराकरण हेतु विश्‍व के तमाम देशों के ध्यानाकर्षण के लिए सबसे पहले विश्‍व पृथ्वी दिवस 3 जून 1992 के अवसर पर होने वाले सम्मेलन के एजेंडे में 'रिओ-डी-जनेरो (ब्राजील) सम्मेलन में विश्‍व के आदिवासियों की स्थिति की समीक्षा और चर्चा का एक प्रस्ताव पारित किया गया। ऐसा विश्‍व में पहली बार हुआ जब कि आदिवासियों के हालातों के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर प्रस्ताव पारित किया गया।

संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अपने गठन के 50वें वर्ष में यह महसूस किया कि 21वीं सदी में भी विश्‍व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासी लोग अपनी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, बेरोजगारी एवं बन्धुआ तथा बाल मजदूरी जैसी समस्याओं से ग्रसित हैं। अतः 1993 में UNWGEP कार्यदल के 11वें अधिवेशन में आदिवासी अधिकार घोषणा प्रारूप को मान्यता मिलने पर 1993 को पहली बार विश्‍व आदिवासी वर्ष एवं आगे हमेशा के लिये 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया गया।

आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास आदि के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 में जेनेवा शहर में विश्‍व के आदिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्‍व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया।

9 अगस्त, 1994 को विश्‍वभर के आदिवासियों की संस्कृति, भाषा, मूलभूत हक को सभी ने एक मत से स्वीकार किया और आदिवासियों के सभी हक बरकरार हैं, इस बात की पुष्टि कर दी गई। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने यह कहकर आदिवासियों को वचन दिया कि-‘हम आपके साथ है|’

संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) की जनरल असेम्बली (महासभा) ने व्यापक चर्चा के बाद 21 दिसम्बर, 1993 से 20 दिसम्बर, 2004 तक आदिवासी दशक और 9 अगस्त को International Day of the world's Indigenous people (विश्‍व आदिवासी दिवस) मनाने का फैसला लेकर विश्‍व के सभी सदस्य देशों को विश्‍व आदिवासी दिवस मनाने के निर्देश दिये।

इसके बाद विश्‍व के सभी देशों में इस दिवस को मनाया जाने लगा, पर अफसोस भारत की आर्यों के वर्चस्व वाली मनुवादी सरकारों ने आदिवासियों के साथ निर्ममतापूर्वक धोखा किया। आदिवासियों को न तो इस बारे में कुछ बताया गया और ना ही भारत में आधिकारिक रूप से विश्‍व आदिवासी दिवस मनाया गया। आदिवासियों के हालातों में कोई सुधार नहीं होने पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 16.12.2005 से 15.12.2014 को दूसरी बार फिर से आदिवासी दशक घोषित किया गया।

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर यह लिखते हुए गहरा दुख और अफसोस होता है कि *विधायिका में आदिवासियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और लोक सेवाओं में चयनित प्रशासनिक प्रतिनिधियों के होते हुए भारत की सभी सरकारें आदिवासियों के प्रति संयुक्त राष्ट्र संघ के स्पष्ट प्रस्ताव के बावजूद भी आज तक हृदयहीन, धोखेबाज और निष्ठुर बनी रही हैं। आखिर ऐसा क्यों? प्रत्येक आदिवासी को इस सवाल का जवाब जानना होगा।* लेकिन यह जानकर पाठकों को घोर आश्चर्य होगा कि 23 साल पहले जब प्रथम आदिवासी दिवस सम्मेलन 1994 में जेनेवा में यूएनओ द्वारा आयोजित हुआ। जिसमें विश्‍व के सभी सदस्य देशों से प्रतिनिधि बुलाये गये थे। भारत सरकार की तरफ से तत्कालीन केन्द्रीय राज्य मंत्री के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने जिनेवा सम्मेलन में भाग लिया था।

इस सम्मेलन में भारत सरकार के प्रतिनिधि द्वारा सँयुक्त राष्ट्र संघ को अवगत कराया था कि *‘संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिभाषित आदिवासी लोग भारत में हैं ही नहीं।’* बल्कि इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र संघ को यह बताया गया कि *‘भारत के सभी लोग भारत के आदिवासी हैं और भारत की जन जातियां किसी प्रकार के सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक पक्षपात या भेदभाव की शिकार नहीं हो रहे हैं।'* सोचिये इससे बड़ा सरकारी झूठ और षड़यंत्र क्या हो सकता है? लेकिन दु:खद आदिवासी प्रतिनिधि मौन हैं?

भारत की जो सरकारें संसार के सबसे बड़े मंच पर इतना बड़ा झूठ बोल सकती हैं। उनकी ओर से अपने हकों की मांग करने वाले आदिवासियों को नक्सलवादी घोषित करना कौनसी बड़ी बात है? ऐसी सरकारें आदिवासियों को समाप्त करने के लिये कुछ भी कर सकती हैं। *'भारत में आदिवासी हैं ही नहीं और भारत के सभी लोग आदिवासी हैं।'* यह झूठ क्यों बोला गया? इसके पीछे सरकार की गहरी साजिश है! जिसका उत्तर जानने के लिये प्रत्येक आदिवासी को भारत की व्यवस्था पर काबिज बकवास वर्ग के षड़यंत्रों को तो समझना ही होगा।

इसके साथ-साथ दो बातें वर्तमान में विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। *भारत के आदिवासी को नेस्तनाबूद करने के लिये वर्तमान में आर्यों के चारों वर्ण सक्रिय हैं! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की श्रेृष्ठता कायम रखने के लिये संचालित आरएसएस भारत का इतिहास नये सिरे से लिखवाकर यह सिद्ध करने में लगा हुआ है कि आर्य यूरेशिया से भारत आने से पहले भारत के निवासी थे। आर्य भारत से यूरेशिया गये ​थे। वहीं दूसरी ओर आर्य ब्राह्मणों द्वारा उपनयन अर्थात जनेऊ संस्कार बंद करके आर्यों का चौथा शूद्र वर्ण घोषित (लेकिन सम्पूर्ण अनुसूचित जातियां शूद्र नहीं) लोगों के वर्तमान वंशज प्रायोजित डीएनए रिपोर्ट की मनमानी तथा भ्रामक व्याख्या करके आर्यवंशी शूद्रों को मूलनिवासी शब्द की आड़ में भारत के मूल मालिक सिद्ध करने में लगा हुआ है। इस प्रकार आर्यों के चारों वर्ण आदिवासी अस्तित्व को नेस्तनाबूद करके अपने आप को भारत के मूलनिवासी घोषित करने के षड़यंत्र में अन्दरखाने संलिप्त और सहभागी लगते हैं। लेकिन दु:खद आश्चर्य आर्यों के चारों वर्णों में से किसी में इतना साहस नहीं कि वे 'विश्व आदिवासी दिवस' के दिन अपने आप को भारत के आदिवासी कह सकें!* (नोट: 04 अगस्त, 2015 को—— *संयुक्त राष्ट्र संघ ने कहा-‘हम आदिवासियों के साथ हैं|’ भारत सरकार ने कहा-‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं|’* ———शीर्षक से लिखा आलेख आंशिक संपादन के साथ पुन: प्रस्तुत है।)

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/09.08.2017

Friday, July 28, 2017

दीपा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद के मौन के मायने?

दीपा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद के मौन के मायने?
मोस्ट वॉइस: अंक-2 28 जुलाई, 2017
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

दीपा ईवी बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया प्रकरण में ओबीसी के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रेल, 2017 जो निर्णय सुनाया है, उसका तत्परता से क्रियान्वयन शुरू हो चुका है। जिसके तहत केन्द्र और सभी राज्य सरकारों द्वारा प्रशासनिक आदेश/सर्क्यूलर जारी किये जा चुके हैं/जा रहे हैं।
इस प्रकरण में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस पर लम्बी-चौड़ी चर्चा, बहस और विवेचना की गुंजाइश हो। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में आदेश दिये हैं कि आरक्षित वर्ग के आवेदक/प्रत्याशी द्वारा यदि शुल्क छूट के अलावा किसी भी प्रकार की छूट प्राप्त की गयी है तो वह अनारक्षित बौद्धिक कोटे की मेरिट में नहीं गिना जायेगा, बेशक वह मेरिट में टॉपर ही क्यों न रहा हो? इसका सीधा और साफ अभिप्राय यही है कि यदि आरक्षित वर्ग के आवेदक अनारक्षित मेरिट में प्रवेश, नियुक्ति/चयन चाहते हैं तो उनके पास दो विकल्प हैं:-

पहला: किसी भी चयन के लिये बेशक साथ में जाति प्रमाण पत्र संलग्न करें। लेकिन चयन के प्रारंभिक चरण से ही अनारक्षित आवेदकों के समान पात्रता अर्जित करके आवेदन करें। यद्यपि बहुत ही कम संख्या में ऐसे आवेदक होंगे जो अर्हता और पात्रता में किसी भी प्रकार की छूट प्राप्त किये बिना पहले चरण से आवेदन करने के लिये पात्र हों और यदि पहले चरण तक पात्र हों भी तो चयन के अन्तिम चरण तक किसी भी प्रकार की छूट हासिल करने के लिये विवश नहीं हों। यदि लिखित प्रतियोगिताओं में बिना छूट के अनारक्षित बौद्धिक कोटे में मेरिट हासिल कर भी ली तो अन्त में साक्षात्कार में इतने कम अंक दिये जाते हैं कि उनका अनारक्षित बौद्धिक कोटे से बाहर होना तय है।

दूसरा: उन्हें अनारक्षित आवेदक के रूप में आवेदन करना होगा।

उक्त दोनों स्थितियों में मूल अंतर यह है कि पहली में आवेदक के पास दोनों विकल्प उपलब्ध हैं। जबकि दूसरे विकल्प में आरक्षित वर्ग के आवेदकों को केवल बौद्धिक कोटे में ही मेरिट अर्जित करके चयनित होने का एक मात्र विकल्प है। सामान्यतया आरक्षित वर्ग के आवेदकों से ऐसा रिस्क लेने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

निश्चय ही यह निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु प्रतिपादित उस पवित्र सिद्धान्त के विपरीत है, जिसमें सरकार से साफ शब्दों में यह अपेक्षा की गयी है कि समानता का तात्पर्य आंख बंद करके लोगों के बीच एक जैसा व्यवहार करना कतई भी समानता नहीं है, बल्कि समानता का तात्पर्य जन्मजातीय विभेद का दंश झेलने वाले एक जैसी सामाजिक एवं शैक्षणिक परिस्थितियों और पृष्ठभूमि की जातियों में जन्मने वाले लोगों के बीच एक जैसा व्यवहार करना है। इसी के मूल सिद्धान्त के तहत संविधान में वर्गीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है।

प्रतियोगिताओं में वंचित वर्गों को निर्धारित अर्हताओं में छूट प्रदान करना भी इसी सिद्धान्त में शामिल है। जबकि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस सिद्धान्त का खुला उल्लंघन करने के साथ-साथ, सुप्रीम कोर्ट के अनेक पूर्ववर्ती निर्णयों के भी विपरीत है। जिनमें यह कहा गया है कि-'आरक्षण का बिलकुल भी यह अर्थ नहीं है कि आरक्षित वर्गों को निर्धारित आरक्षण प्रतिशत से अधिक प्रवेश/नियुक्तियां नहीं दी जावें, बल्कि निर्धारित आरक्षण प्रतिशत तो आरक्षित वर्गों का न्यूनतम प्रतिनिधित्व है।'

यहां यह उल्लेखनीय है कि आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों की संकीर्ण व्याख्या के जरिये, आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने का यह सिलसिला 1950 से दोराईराजन के प्रकरण से जारी है। मेरा मानना है कि अब आरक्षण व्यवस्था के प्रावधानों को कमजोर करने के लिये सुप्रीम कोर्ट के पास अधिक कुछ शेष बचा नहीं है। फिर भी आने वाले समय में आरक्षण के सिद्धान्तों की और अधिक संकीर्ण व्याख्या करने वाले निर्णय आ सकते हैं।

उपरोक्त निर्णय के अलावा नीट मामला सबके सामने है। इसके साथ ही साथ यह भी तय हो चुका है कि जिस किसी ने सरकारी सेवा में प्रवेश के लिये कभी भी एक बार यदि आरक्षण का लाभ ले लिया तो ऐसे लोक सेवक को भविष्य में अनारक्षित कोटे का लाभ नहीं मिलेगा। मतलब साफ है कि बैक लोग खाली रहेगा तथा उच्च और नीतिनियन्ता प्रशासनिक पदों पर आरक्षित वर्ग के लोगों को नहीं पहुंचने देने की सम्पूर्ण तैयारी की जा चुकी है। इसीलिये मैंने संविधान की व्याख्या के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश गुलामी की गाथा लिखने वाले श्लोक सिद्ध होंगे। शीर्षक से प्रकाशित लेख में वंचित मोस्ट वर्ग को आगाह किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी अनेक बार संविधान की संकीर्ण व्याख्या करने वाले निर्णय सुनाये थे, जिन्हें तत्कालीन संसद द्वारा संविधान संशोधन के जरिये निष्प्रभावी कर दिया गया था। लेकिन वर्तमान में सभी सांसद, अर्थात संसद मौन है। कारण बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिये। हम सभी जानते हैं कि देश के लोगों ने केन्द्र और अनेक राज्यों में ऐसी विचारधारा की सरकार को बहुमत प्रदान किया है, जो पण्डित दीनदयान उपाध्याय के मानव एकात्ववाद के सिद्धान्त को लागू करने को प्रतिबद्ध है। जो नहीं जानते, उन्हें एक पंक्ति में जान लेना चाहिये कि पण्डित दीनदयान उपाध्याय का एकात्म मानववाद और कुछ नहीं, सीधे शब्दों में मनुवाद ही है। जिसका पूर्व में एम के गांधी ने भी खुलकर समर्थन किया है।

वर्तमान में भाजपा के माध्यम से जिस किसी भी वर्ग के जो भी सांसद और विधायक या अन्य जनप्रतिनिधि हैं या अन्य जो चाहे किसी भी दल में हों या निर्दलीय हो, यदि वे संघ के प्रति निष्ठावान हैं तो उनका सीधा लक्ष्य एकात्म मानववाद के मार्फत भारत में मनुवादी व्यवस्था को लागू करना है। अत: वर्तमान में कार्यपालिका, व्यवस्थापालिका और न्यायपालिका तीनों के मार्फत पण्डित दीनदयान उपाध्याय के एकात्म मानववाद को लागू किया जा रहा है। जिसको प्रेसपालिका अर्थात मीडिया का भी खुलकर समर्थन मिल रहा है।

दीपा प्रकरण में परोक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 50.50 फीसदी बौद्धिक कोटे को आरक्षित वर्ग के टॉपर्स से मुक्त रखते हुए, अनारक्षित वर्ग के लिये आरक्षित करने के समान है। जिसका स्थायी, संवैधानिक और न्यायसंगत समाधान यही है कि जाति आधारित जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक किये जावें। आरक्षित वंचित वर्ग की जातियों की वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का न्यूनतम कोटा निर्धारित किया जावे। यह सब करने का संवैधानिक अधिकार संसद के पास है, लेकिन संसद मौन है।

आरक्षित वंचित मोस्ट वर्ग के जो भी लोग, संगठन या राजनैतिक दल वंचित वर्ग के प्रतिनिधि या हितैषी होने की बात करते या कहते हैं, उनका लक्ष्य वंचित वर्ग को गुमराह करके येन-केन-प्रकारेण, कैसे भी सत्ता प्राप्ति रसमलाई का रसास्वादन करना रहा है। अत: उनसे किसी प्रकार की उम्मीद करना वंचित वर्ग को खुद को धोखा देने के समान है।

अत: अन्तिम बात वंचित मोस्ट वर्ग को संयुक्त विचार और संयुक्त नेतृत्व के सिद्धान्त को स्वीकार करना होगा। संयुक्त नेतृत्व में देशव्यापी आन्दोलन चलाना होगा। जिसके बारे में 'बकवास वर्ग के अत्याचारों के विरुद्ध मोस्ट वंचित वर्ग की रणनीति?' शीर्षक से पूर्व प्रकाशित लेख में प्रकाश डाला जा चुका है।

Note: जो भी कोई अपने वाट्सएप इन बॉक्स में मोस्ट वॉइस तथा मेरे समसामयिक आलेख ब्रॉड कॉस्ट सिस्टम के जरिये प्राप्त करने के इच्छुक हैं, वे मेरे वाट्सएप नम्बर: 9875066111 पर सहमति भेज सकते हैं। उनका परिचय प्राप्त करके उन्हें नियमित सामग्री भेजी जाती रहेगी।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, Mobile & Whatsapp No.: 9875066111, 28.07.2017

Tuesday, July 25, 2017

वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा

वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा
मोस्ट वॉइस : अंकः 1, 25 जुलाई, 2017
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
मैंने अनुभव से सीखा है कि जब आप नेतृत्व कर रहे होते हैं तो आप पर असंख्य लोगों की नजरें होती हैं, जिनमें अनेक निर्मल-हृदयी होते हैं। जिन्हें सिर्फ आपकी अच्छाई और सच्चाई ही दिखती है। ऐसे लोग आपको प्रोत्साहित करते हैं। कुछ तटस्थ और निष्पक्ष लोग होते हैं जो सब कुछ सच-सच कहते, लिखते और बोलते हैं। उनको इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इससे नेतृत्व को, पढ़ने-सुनने वालों या नेतृत्व के अनुयाईयों या समाज को कैसा लगेगा या क्या प्रभाव होने वाले हैं।
जबकि समाज में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो सिर्फ नेतृत्व की कमियों, कमजोरियों और जुबान फिसलने को मुद्दा बनाने का इन्तजार करते रहते हैं, ताकि नेतृत्व को दुनिया के सामने कमजोर, मूर्ख और नालायक सिद्ध किया जा सके! जिसके पीछे अनेक बार उनका कोई मकसद नहीं होता। मनोवैज्ञानिक कहते हैं, ऐसा करने में इन लोगों को मजा आता है। उनको आनंद की अनुभूति होती है, क्योंकि उनको इस बात से सन्तुष्टि मिलती है कि उन्होंने कितने बड़े व्यक्ति को निशाना बनाया। कुछ मामलों में ऐसी आलोचना करने के पीछे, आलोचना करने वालों की सस्ती प्रसिद्धि पाने की रुग्ण मनोविकृति भी होती है।
इन सब से अलग एक और भी प्रकार के लोग होते हैं, जो मीठी- मीठी बातें करते हैं। नेतृत्व के प्रति वफादारी दिखाने के लिए कसमें खाते हैं, हर कदम पर साथ निभाने की बातें करते हैं, लेकिन वक्त जरूरत पड़ने पर वे कभी भी सामने नहीं आते। जब भी उनके सहयोग की जरूरत होती है, उनके पास बहुत अच्छे बहाने और अजीब से तर्क होते हैं। ऐसे लोग अकसर अपने ही नेतृत्व की कमजोरियों को नोट करते रहते हैं या नेतृत्व की भलमनसाहत को ही कमजोरी मानकर भितरघात के लिए अवसर की तलाश और इंतजार में रहते हैं।
इस प्रकार के लोग दूसरों के मार्फत अपने आप का गुणगान करवाते हैं। वास्तव में ऐसे लोग अब्बल दर्जे के मूर्ख और कुख्यात धूर्त होते हैं, जो अनुभवी लोगों को खुद से कमजोर मानकर अपना और अपने ही संगठन का अत्यधिक नुकसान कर देते हैं। अनेक भले और अच्छे लोग भी इन धूर्तों के कुचक्र में फंसकर अपना सार्वजनिक जीवन बर्बाद कर चुके होते हैं, जबकि अनेक बार आश्चर्यजनक रूप से ऐसे धूर्त लोग खुद की नजरों में और अनेक भोले लोगों की नजरों में खुद को बचा लेने में कामयाब हो जाते हैं!
इस प्रकार सार्वजनिक जीवन में काम करते वक्त अनेक प्रकार के लोगों के बीच रहकर रास्ता तय करना होता। नेतृत्व की हर पल परीक्षा होती रहती है। ऐसे समय में यह निर्णय करना भी नेतृत्व की सफलता या असफलता हेतु निर्णायक साबित होता है कि किसको कब और क्या जवाब देना है और किसकी बात की अनसुनी करनी है।
ऐसे समय में सहयोगी नेतृत्व, मित्रों और शुभचिंतकों की भी परीक्षा हो ही जाती है। इस माने में नेतृत्व के लिए ऐसा चुनौतीपूर्ण समय अपने लोगों की परीक्षा करने का सुअवसर भी होता है और साथ ही नये शुभचिंतकों के लिए भी ऐसे वक्त ही दरवाजे खुलते हैं। अनेक आस्तीन के सांप भी ऐसे समय में डसने के लिए बिलों से बाहर निकल आते हैं तो वहीं इन साँपों के फनों को कुचलने वाले नये साहसी और सच्चे मित्र तथा शुभ चिंतक भी नेतृत्व के साथ आ खड़े होते हैं।
ऐसे समय में यह भी ज्ञात हो जाता है कि नेतृत्व के पास कैसे और कितने सच्चे और कच्चे दोस्त तथा दुश्मन हैं? कितने सच्चे हितचिंतक और कितने शुभचिंतक हैं? कितने दगाबाज और कितने गद्दार हैं? कितनों का आपके पक्ष या विपक्ष में हृदय परिवर्तन होता है?
इन सब हालातों में आज के असहज और अन्यायपूर्ण चुनौतियों से भरे समाज में किसी भी नेतृत्व को सच्चाई की लड़ाई जीतने या अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल सच्ची बात कहने, सच बोलने या सच का साथ देने से ही काम नहीं चलता है, बल्कि सच्ची लड़ाई को जीतने के लिए कम से कम दो प्रकार के दोस्तों की अत्यधिक जरूरत होती हैः-
1. पहले कृष्ण जैसे सच्चे-सद्भावी मित्र और सारथी साथ होने चाहिए, जो बेशक सामने आकर आपके लिए युद्ध न भी लड़ सकें, लेकिन हर कदम पर आपके सच्चे और विश्वसनीय मार्गदर्शक अवश्य बने रहें।
और
2. दूसरे कर्ण जैसे वीर और निस्वार्थी दोस्त भी जरूर साथ होने चाहिए, जो दुनिया की नजर में तुम्हारे गलत होने की परवाह नहीं करते हुए सिर्फ और सिर्फ अपनी दोस्ती और दोस्ती के फर्ज को निभाने के लिए आगे आकर लड़ें और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहें।
अंत में एक बात और यह कि कठिन समय में सच्चे मित्र सही और सुगम रास्ता खोजते हैं। हर पल आपका मार्गदर्शन करते हैं, जबकि झूठे और मक्कार लोग आपको भटकाते हैं। बहाने बनाते हैं और आपको गलत सिद्ध करने के लिए किसी भी हद को पार कर जाते हैं।
मगर यही तो जीवन है। मुश्किलों को चुनौती मानकर स्वीकार करने में ही तो हमारी खुद की और हमारे अपनों की सच्ची परीक्षा होती है।
शुक्रिया उन धूर्त, मूर्ख और नकाबपोशों का जिनकी रुग्ण मानसिकता के कारण मैंने अपने जीवन में बहुत-कुछ पाया है। क्योंकि ऐसे लोगों के कारण गद्दारों की नकाब उतर गयी और सच्चे वफादारों को अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करने का समय से पूर्व अवसर मिल गया।
यदि सामाजिक जीवन में काम करने वाले हम सभी लोग उपरोक्त वर्णित हालातों और घटनाओं का अवलोकन करते हुए आगे बढें तो यह तय है कि असफलता भी वरदान सिद्ध हो सकती है।
भारत की कुल आबादी में 90 फीसदी होकर भी वंचित-मोस्ट वर्ग अपने हकों से वंचित है। अतः मोस्ट आन्दोलन के सहभागियों, नेतृत्वकर्ताओं और समर्थकों को पूर्वाग्रही और संकीर्ण सोच को त्यागकर सामूहिक, उदार और सूझबूझ से परिपूर्ण संयुक्त विचारधारा को अपनाने की जरूरत है। मेरी राय में वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा।
नोटः उक्त लेख 03 फरवरी, 2015 को ‘शुक्रिया उन धूर्त, मूर्ख और नकाबपोशों का जिनकी समय से पूर्व नकाब उतर गयी!’’ शीर्षक से प्रकाशित मेरे खुद के एक आलेख को आंशिक रूप से संपादित करके प्रस्तुत किया गया है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, मो. वाअ: 9875066111, 25.07.2017

Saturday, July 22, 2017

जन्मजातीय विभेद से पीड़ित भारतीय समाज में मूलनिवासी और विदेशी के जरिये वंचित वर्गों की एकता को छिन्नभिन्न करने वाला मूलवंश या नस्लीय विभेद का काल्पनिक आन्दोलन क्यों?—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

*जन्मजातीय विभेद से पीड़ित भारतीय समाज में मूलनिवासी और विदेशी के जरिये वंचित वर्गों की एकता को छिन्नभिन्न करने वाला मूलवंश या नस्लीय विभेद का काल्पनिक आन्दोलन क्यों?—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'*
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मैं एक गरीब और संघर्ष झेलने को विवश आदिवासी मीणा परिवार में जन्मने के बाद 1978—1979 से सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ हूं। 4 साल 2 माह 26 दिन 4 जेलों में रहा। 20 साल 9 माह 5 दिन तक 3 रेलवेज में रेलवे सेवा की और पत्रकारिता तथा लेखन क्षेत्र से जुड़ा रहा हूं। लम्बे समय तक रेलवे में कर्मचारी प्रतिनिधि भी रहा। 22 राज्यों में सेवारत भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान बास का 1993 से राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं। इसके अलावा भी दैनिक जीवन में अनेकानेक प्रकार के लोगों से वास्ता पड़ता रहा है।

*इस दौरान मुझे व्यक्तिगत तौर पर तथा अपने नजदीकियों, सहयोगियों, मित्रों आदि के मामलों में जातिगत और वर्गगत आधार पर तो सैकड़ों बार कुटिल विभेद, तिरस्कार, शोषण, अधिकार हनन, अपमान जैसे वाकयों से दो-चार होना पड़ा। मगर मुझे कभी भी मूलवंश या नस्ल के आधार पर किसी अप्रिय या अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा! यही कारण है कि भारत में 90 फीसदी से अधिक लोग विदेशी मूल के होने के बावजूद भी किसी प्रकार का कोई नस्लीय विभेद देखने को नहीं मिलता है। परिणामत: भारत में नस्ल और मूलवंश के आधार पर विभेद के आपराधिक मामले लगभग शून्य हैं।*

इसके बावजूद जन्म आधारित जातिगत विभेद को दरकिनार करके विदेशी मूल के आर्यवंशी शूद्रों *(कृपया इस तथ्य की पुष्टि हेतु नीचे दिये गये नोट को भी पढें)* के वर्तमान वंशजों के नेतृत्व में *मूलनिवासी* और विदेशी जैसी शब्दावली के जरिये भारत को विभाजित करके लोगों में *वैमनस्यता पैदा करने तथा वंचित वर्गों की एकता को छिन्नभिन्न करने वाला अभियान संचालित करने का औचित्य क्या है?* 
*नोट:*
*एक महत्वूपर्ण तथ्य* डॉ. अम्बेड़कर *'शूद्र कौन थे'* पुस्तक में शोधपूर्ण सत्य लेखन के जरिये प्रमाणित कर चुके हैं कि—
*शूरवीर सूर्यवंशी आर्य क्षत्रियों द्वारा* लगातार ब्राह्मणों पर अत्याचार किये जाने के कारण, *ब्राह्मणों ने सूर्यवंशी आर्य क्षत्रियों का उपनयन संस्कार प्रतिबन्धित करके* उन्हें क्षत्रिण वर्ण से नये चौथे शूद्र वर्ण में डाल दिया। इस प्रकार *शूद्र आर्यवंशी सवर्ण हैं।*

*दूसरा महत्वूपर्ण तथ्य* डॉ. अम्बेड़कर *'अछूत कौन हैं...'* पुस्तक में शोधपूर्ण सत्य लेखन के जरिये प्रमाणित कर चुके हैं कि—

अछूत घोषित जातियों की अग्रेजों द्वारा विभिन्न समयों पर अनेक सूचियां जारी की गयी। जिनकी *कुल संख्या 429 बतायी गयी। जिनमें से 427 को डॉ. अम्बेड़कर ने गैर शूद्र अछूत जाति माना है।*

तदनुसार वर्तमान में *अजा वर्ग में शामिल सभी जातियां आर्यवंशी सवर्ण शूद्र नहीं हैं।*

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 9875066111, 22.07.2017
https://www.facebook.com/NirankushWriter/posts/456401324719637

Wednesday, July 19, 2017

मोस्ट वर्ग की एकता हेतु संयुक्त विचारधारा और संयुक्त नेतृत्व सबसे पहली जरूरत!

मोस्ट वर्ग की एकता हेतु संयुक्त विचारधारा और संयुक्त नेतृत्व सबसे पहली जरूरत!

आजादी के बाद से भारत में सामाजिक न्याय का मिशन अजा वर्ग के लोगों के नेतृत्व में संचालित होता रहा है। जिसमें आदिवासियों का सहयोगी के रूप में सक्रिय योगदान रहा है। लेकिन अजा वर्ग ने संयुक्त संगठनों में आदिवासी को कभी भी नेतृत्व नहीं करने दिया। इस कारण आपसी रिश्तों में अभी तक मजबूती का अभाव है। लेकिन पिछले 70 साल से जारी विचारधारा और नेतृत्व पूरी तरह से असफल, अनुदार और नाकारा सिद्ध हो चुके हैं। अत: वर्तमान हालातों में वंचित मोस्ट वर्ग को यदि एक होकर सामाजिक न्याय के मिशन को आगे बढाना ना है तो-

1. मोस्ट वर्ग की एकता के लिये संयुक्त विचारधारा और संयुक्त नेतृत्व को सबसे पहली जरूरत और अनिवार्यता मानकर आगे बढना होगा।

2. अभी तक अजा वर्ग के नेतृत्व द्वारा सामाजिक न्याय हेतु जारी रखी गयी, लेकिन असफल सिद्ध हो चुकी विचारधारा का मोस्ट वर्ग के विद्वानों की संयुक्त टीम द्वारा परीक्षण तथा पुनरावलोकन करना। जिससे कि मोस्ट वर्ग की एकता में बाधक तत्वों को चिह्नित करके निरसित/रिपील अर्थात डिलीट किया जा सके। साफ शब्दों में ओबीसी, मायनोरिटी और आदिवासी वर्गों को अस्वीकार्य विचारों तथा धारणाओं को हर हासल में त्यागना ही होगा।

3. सामाजिक न्याय के मिशन को भटकाने वाले अजा वर्ग के अग्रणी नेतृत्व को अपनी 70 साल से जारी गलतियों तथा असफलताओं को खुले मन से और सार्वजनिक रूप से स्वीकार करके ओबीसी, मायनोरिटी और आदिवासी नेतृत्व के सहयोगी के रूप में काम करना होगा।

उपरोक्त विचारों में सुधार, परिवर्तन, संशोधन सुझाने वाले पूर्वाग्रह से मुक्त विद्वान विश्लेष्कों के विचारों का स्वागत है।

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
W & M No. 9875066111, 19072017

Tuesday, July 18, 2017

अफसर मोबाईल रखते हैं, लेकिन सिपाही मोबाईल नहीं रख सकता! मोबाईल उपयोग नहीं करने देने पर सिपाही ने की मेजर की हत्या!!

अफसर मोबाईल रखते हैं, लेकिन सिपाही मोबाईल नहीं रख सकता!
मोबाईल उपयोग नहीं करने देने पर सिपाही ने की मेजर की हत्या!!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

सोमवार, 17 जुलाई, 2017 को रात करीब सवा बारह बजे उत्तरी कश्मीर के उड़ी सेक्टर में एलओसी के अग्रिम छोर पर स्थित बुचर चौकी के पास एक सिपाही ने मेजर की हत्या कर दी। हत्या का कारण सिपाही को मोबाईल रखने की अनुमति नहीं होने के बावजूद सिपाही को मोबाईल का इस्तेमाल करते हुए पकड़ा जाना। इस कारण 71 आर्मर्ड रेजिमेंट के मेजर शिखर थापा ने 9 मद्रास रेजिमेंट के नायक काठी रीसन से मोबाइल फोन छीन लिया। दोनों के बीच कथित तौर पर हाथापाई हुइ। जिसमें सिपाही का मोबाइल क्षतिग्रस्त हो गया।

इसके बाद मेजर ने कमांडिंग ऑफिसर को रिपोर्ट करके सिपाही के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करवाने की धमकी दी। इस पर सिपाही काठी रीसन ने मेजर पर अपनी एसाल्ट राइफल से गोलियों की बौछार कर दी। इससे मेजर की मौके पर ही मौत हो गई।

सबसे पहले तो यह घटना देश और सेना के लिये अत्यन्त दु:खद और चिन्ताजनक है। दिवंगत मेजर की मौत उसके परिवार और सेना के लिये बड़ी क्षति है। वहीं सिपाही का इस प्रकार का व्यवहार अनेक सवालों को जन्म देता है।

सामान्यत: फौजी अफसर सुविधा-सम्पन्न दफ्तरों, स्थानों और, या शहरों में पदस्थ रहते हैं। आम तौर पर फौजी अफसरों के परिवार भी उनके साथ ही रहते हैं। इसके बावजूद भी उन्हें मोबाईल सहित संचार के सभी साधन चौबीसों घंटे सरकारी खर्चे पर उपयोग करने की अनुमति होती है। इसके विपरीत एक सिपाही, सीमा पर मौसम की मार झेलते हुए, अनेक प्रकार के तनावों और परेशानियों में अपनी सेवाएं देता है। हर समय उसके सिर पर दुश्मन की गोली का खतरा मंडराता रहता है। लम्बे समय तक उसे अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ-साथ शहरी जीवन की सुविधाओं से बहुत दूर रहना पड़ता है। इस कारण सिपाही को अनेक प्रकार के तनाव और विषाद झेलने होते हैं। ऐसे में सिपाही को अपने परिवार, दफ्तर और देश-दुनियां से जुड़े रहने के लिये संचार सुविधाओं की तुलनात्मक रूप से अफसरों से अधिक जरूरत होती है। बल्कि इन हालातों में वर्तमान समय में एक सिपाही के लिये इंटरनेटयुक्त मोबाईल अनिवार्य है।

सु्प्रीम कोर्ट ने एक मामले में संचार सुविधाओं को अनुच्छेद 21 के तहत वर्णित जीवन के मूल अधिकार का अपरिहार्य हिस्सा घोषित किया हुआ है। ऐसे में सिपाही को ड्यूटी के दौरान मोबाईल का इस्तेमाल करने का हक नहीं देने वाला कोई भी सैनिक आदेश या नियम मूल अधिकारों को छीनने और हनन करने वाला होने के कारण अनुच्छेद 13 (2) के प्रकाश में कानूनी दृष्टि से शून्य है।

इसके बावजूद भी सिपाही को मोबाईल इस्तेमाल नहीं करने देना और मोबाईल को छीनना, सिपाही के साथ मारपीट करते हुए कानूनी कार्यवाही की धमकी देना, अपने आप में भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध है। ऐसे में देश की रक्षा के लिये तैनात सिपाही के संवैधानिक मूल अधिकारों को छीनकर, उसके आत्मस्वाभिमान को कुचलने का आपराधिक कुकृत्य भी उतना ही निन्दनीय, गलत, अक्षम्य और चिन्ताजनक है, जितना कि देश सेवा के लिये तैनात एक मेजर की मौत।

हत्या नहीं मानव वध: निश्चय ही यह हत्या का अपराध नहीं है, क्योंकि मेजर की हत्या के पीछे सिपाही का कोई मोटिव या इंटेशन प्रकट नहीं होता है। अत: मेजर की मौत को हत्या नहीं, बल्कि मानव वध की श्रेणी का अपराध है।

अन्तिम बात: वास्तव में यह घटना अन्याय, विभेद और मनमानी व्यवस्था के विरुद्ध, वंचित-शोषित तथा आक्रोशित मानव मन की अति-आपराधिक प्रतिक्रिया है। जिसे व्यवस्था पर काबिज लोगों द्वारा रोका जा सकता था, बशर्ते सिपाही के मूल अधिकारों का हनन नहीं किया गया होता। इस घटना से सबक लेकर भविष्य में हो सकने वाली ऐसी घटनाओं को रोकना सम्भव है। यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि मूल अधिकारों के हनन को संविधान में ही दण्डनीय आपराधिक कृत्य घोषित कर दिया गया होता तो आम व्यक्ति और निम्न स्तर पर सेवारत लोक सेवकों के मूल अधिकारों को छीनने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता था। मगर खेद है कि संविधान निर्माताओं ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। 
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/18.07.2017