Sunday, December 31, 2017

वंचित वर्ग के लिये 2018 में संकल्प जेहनी जहरखुरानी से बचें और संविधान की उदारताओं, अस्पष्टताओं, खामियों और कमजोरियों का लाभ उठाने वालों को नियंत्रित करने के रास्ते खोजें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'


वंचित वर्ग के लिये नववर्ष 2018 में संकल्प जेहनी जहरखुरानी से बचें और संविधान की उदारताओं, अस्पष्टताओं, खामियों और कमजोरियों का लाभ उठाने वालों को नियंत्रित करने के रास्ते खोजें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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सारा संसार जानता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है, जिसमें संवैधानिक शासन व्यवस्था है और स्वतन्त्र न्यायपालिका है। इसके बावजूद आजादी के सात दशक बाद भी भारतीय व्यवस्था केवल 10 फीसदी लोगों के यहां कैद है और मात्र 2 फीसदी लोगों का शासन है। ऐसा क्यों? क्योंकि शेष 90 फीसदी लोग 10 फीसदी सशक्त, चालाक और धूर्त लोगों से या तो भयभीत हैं या किसी न किसी रूप में उनके अंधभक्त और गुलाम हैं।


आजादी के पूर्व से ही इस गुलामी से मुक्ति के लिये, अनेकानेक महापुरुषों ने अपने-अपने तरीके से लम्बे संघर्ष और प्रयास (Struggle and Effort) किये हैं। अधिकतर महापुरुषों को तत्कालीन सशक्त लोगों, षड़यंत्रकारियों (Conspirators) और, या शासकों के बहकावे (जेहनी जहरखुरानी) में आकर/भ्रमित होकर उनके करीबी माने जाने वाले अपनों ने ही धोखा दिया और अधिकतर बेमौत मारे गये। अनेक शहीद हो गये या छले गये या कुछ की षड़यंत्र पूर्वक निर्मम हत्या कर दी गयी या फांसी दे दी गयी। जिन्हें संदिग्ध मौत (Suspicious Death) या हत्या माना जाता रहा है।

ऐसे विकट हालातों (Difficult Circumstances) से रक्तरंजित इतिहास (Bloody History) को जानते हुए भी आजादी के बाद कांशीराम जी को छोड़कर वंचित वर्गों में कोई भी ऐसा दीवाना पैदा नहीं हो सका, जिसने सब कुछ दाव पर लगाकर वंचित वर्ग (MOST=M4Minority + O4OBC + S4SC + T4Tribals) को जगाने के लिये जुनूनी अभियान (Obsessive Campaign) चलाया हो।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यदि कांशीराम जी नहीं हुए होते तो न तो कोई महामानव त्योतिराव फूले को जानता और न ही डॉ. भीमराव अम्बेड़कर को लोग समझ पाते। डॉ. भीमराव अम्बेड़कर को भारत रत्न मिलना कांशीराम के अभियान का परिणाम है। वर्तमान में तो हर कोई डॉ. भीमराव अम्बेड़कर के गुणगान में लगा हुआ है। जिनमें अनेक ढोंगी और अंधभक्त भी शामिल हैं।

इस बस के बावजूद यह शर्मनाक सत्य (Embarrassing Truth) है कि स्वयं कांशीराम जी का और उनके अभियान का दर्दनाक अन्त ((Painful End)) हो चुका है। बेशक कांशीराम जी के खासमखास रहे लोग सामाजिक न्याय अभियान को ठेंगा दिखाकर कांशीराम जी और डॉ. भीमराव अम्बेड़कर के नाम पर घिनौनी राजनीति (Detestable Politics) कर रहे हैं।

इसके बावजूद यह अकाट्य सत्य है कि एक मात्र कांशीराम जी थे, जिनके कारण केवल भारत में ही नहीं, बल्कि संसारभर में बाबा साहब को गहराई से पढने, जानने और समझने वालों की संख्या हर पल बढ रही है। इसके ठीक विपरीत जिस दबे, कुचले, शोषित और पिछड़े समाज के लिये ज्योतिराव फूले, बिरसा मुण्डा, बाबा साहब और कांशीरामजी जो क्रान्ति का बीज बोकर गये, आज वही समाज अपने ही वर्ग के राजनैतिक बिचौलियों और दलालों (Political Intermediaries and Brokers) तथा इनके अंधभक्तों के कारण ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से जाने वाला हर रास्ता अंधेरे में भटकाने वाला है।

ऐसे में देश का बहुसंख्यक वंचित वर्ग (MOST=M4Minority + O4OBC + S4SC + T4Tribals) आज एक नहीं, बल्कि अनेकों ऐसे दीवानों की फौज की प्रतीक्षा कर रहा है, जिनमें ज्योतिराव फूले जैसा साहस हो। बिरसा मुण्डा के समान आक्रोश और वीरता (Anger and Heroism) हो। डॉ. भीमराव अम्बेड़कर के समान बौद्धिक समझ तथा चातुर्य हो। कांशीरामजी की भांति सांगठनिक समझ और सतत संघर्ष करने की असीम ललक हो।

मेरा विनम्र मत है कि वंचित वर्ग को वास्तव में 2018 में और यदि भविष्य में अपने हकों की प्राप्ति के लिये कुछ कर गुजरना है तो उसे अपने बीच से ऐसे सामाजिक और राजनैतिक संयुक्त नेतृत्व को आगे बढाना होगा:-


* 1. जिसमें संविधान के प्रति अंधभक्ति नहीं, बल्कि संविधान की सच्ची समझ के साथ, संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा भी हो।
* 2. जो वाद, कट्टरता और धर्मांधता से मुक्त निरपेक्ष और निर्भीक हो।
* 3. जो खुद को जयहिन्द, जय भारत माता, जयभीम, नमोबुद्धाय, जय आदिवासी, अम्बेड़करवाद, शूद्रत्व, डीएनए, जयमूलनिवासी, जय मूलवासी आदि की संकीर्णतों तक सीमित नहीं हो, बल्कि देश में समानता, सहभागिता और धर्मनिरपेक्षता की व्यावहारिक स्थापना हेतु लैंगिक विभेद से मुक्त जय भारत और जय संविधान की भावना के सच्चा अनुगामी (Follower) हो।

--->>>>>प्रारम्भ कहाँ से करें?:

अन्य किसी भी चक्कर या षड़यंत्र में फंसने के बजाय, कानूनी किताबों की दुकान पर जायें और आज ही भारत का संविधान खरीद कर लायें। जिसे एकाधिक बार पढें, समझें, जानें और फिर संविधान का अनुसरण करें (Follow the Constitution)। संविधान को लागू करवायें। संविधान की उदारताओं, अस्पष्टताओं, खामियों और कमजोरियों का लाभ उठाने वालों को नियंत्रित करने के रास्ते खोजें। भारत के लोगों और विशेषकर वंचित वर्ग के लोगों के लिये नववर्ष 2018 में तथा आने वाले समय के लिये इससे अच्छा कोई संकल्प और तोहफा (Resolution and Gift) नहीं हो सकता।

व्यक्तिगत रूप से मेरी ओर से और हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के लाखों सदस्यों, समर्थकों और सहयोगियों की ओर से वर्ष 2017 की समाप्ति पर उपरोक्त आकांक्षाओं (Expectations) के साथ नववर्ष 2018 की अनन्त शुभकामनाएँ।

'हमारा मकसद साफ! सभी से साथ इंसाफ!'
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी सब एक सामान!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
जयपुर, राजस्थान। 9875066111, 31.12.17, 08.12AM

Tuesday, December 26, 2017

धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध केन्द्रीय मंत्री हेगड़े का बयान कमजोर संविधान का प्रमाण!

धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध केन्द्रीय मंत्री हेगड़े का बयान कमजोर संविधान का प्रमाण!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
संविधान दिवस मनाने का नाटक करने वाली नरेन्द्र मोदी सरकार के केंद्रीय कौशल विकास राज्यमंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भारत के संविधान की धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे बेहद घटिया और असंवैधानिक टिप्पणी की है।जिसे मीडिया गुलाम द्वारा मात्र विवादास्पद बयान बताकर मंत्री को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। राज्यमंत्री हेगड़े ने कहा कि ''धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील होने का दावा वे लोग करते हैं, जिन्हें अपने मां-बाप के खून का पता नहीं होता। लोगों को अपनी पहचान सेक्युलर के बजाय धर्म और जाति के आधार पर बतानी चाहिए। हम संविधान में संशोधन कर सेक्युलर शब्द हटा सकते हैं।''


अपने मंत्री पद की शपथ और संविधान के उपबन्धों के विरुद्ध दिये गये, इस बयान के बावजूद आश्चर्यजनक रूप से हेगड़े अपने पद पर बने हुए हैं! मीडिया इसे केवल विवादास्पद बयान बता रहा है और संविधान की रक्षा की गारण्टी देने वाली न्यायपालिका स्वयं संज्ञान लेकर हेगड़े को मंत्री पद से बर्खास्त करने की जिम्मेदारी निभाने के बजाय मौन है! जबकि इससे भी कम गंभीर मामलों में न्यायपालिका स्वयं संज्ञान लेकर दिशानिर्देश जारी करती रही है।

संघ की साम्प्रदायिक नीतियों के क्रियान्वयन के लिये अग्रसर केन्द्र सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि संविधान का अपमान करने वाले लोगों को मंत्री पद से बर्खास्त किया जा सके? बल्कि मेरा तो स्पष्ट मत है कि हेगड़े के बयान के द्वारा संघ भारत के संविधान को तोड़ने और बदलने से पहले देश के लोगों और संवैधानिक संस्थानों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है।

ऐसे असंवैधानिक और अपमानकारी बयानों के माध्यम से संघ द्वारा यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि यदि भाजपा द्वारा संविधान के साथ खिलवाड़ किया जाये तो देश के लोग क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? हेगड़े के इस बयान से एक बार फिर से यह बात सिद्ध हो गयी है कि भारत का संविधान इतना कमजोर है, कि वह खुद अपनी रक्षा करने में असमर्थ है। यदि संविधान निर्माताओं ने संविधान के उल्लंघन और अपमान को दण्डनीय अपराध घोषित किया होता तो आज संविधान का मजाक उड़ाने की हेगड़े जैसों की हिम्मत नहीं हो पाती?

इन हालतों में यदि संविधान के अनुसार संचालित लोकतांत्रिक गणतंत्रीय व्यवस्थाओं और संस्थानों को बचाना है तो भारत के संविधानविदों को इस बात पर गम्भीरता पूर्वक विमर्श करना होगा कि संविधान के उल्लंघन और अपमान को रोकने के लिये संविधान में कठोर दण्डात्मक प्रावधान किस प्रकार से लागू किये जावें? इन हालातों में, मैं इस तथ्य को दोहराने को विवश हूं कि देश के सभी समुदायों के प्रबुद्ध लोगों को इस बारे में गम्भीरतापूर्वक चिंतन, मंथन और विमर्श करने के सख्त जरूरत है। अन्यथा भारत भी उन देशों में शामिल हो सकता है, जहां पर जनता को दशकों से फासिस्ट लोगों के अधिनायकतंत्र से मुक्ति मिलना असंभव हो चुका है! आखिर हम कब तक यों ही चुपचाप सिसकते रहेंगे? देशवासियों को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी, क्योंकि बालेंगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?
'हमारा मकसद साफ! सभी से साथ इंसाफ!'
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी सब एक सामान!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
जयपुर, राजस्थान। 9875066111, 26.12.17, 18.54

Wednesday, December 20, 2017

जेहनी जहरखुरानी (Jehani Zaharkhurani)

जेहनी जहरखुरानी (Jehani Zaharkhurani)

रेल और बस में यात्रा करने वाले जानते होंगे। यदि नहीं जानते तो जान लेना चाहिये कि-
'बस या रेल-यात्रा के दौरान जब कोई अनजान व्यक्ति लुभावनी और मीठी-मीठी बातें करके आत्मीयता दर्शाये और खाने-पीने में बेहोशी या नशे का पदार्थ मिलाकर आपका सब कुछ लूट ले तो इसे 'जहरखुरानी' कहा जाता है। इस अपराध के लिये दोषी व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस द्वारा दण्डात्मक कार्यवाही की जाती है।'

उपरोक्तानुसार जहरखुरानी का मतलब समझने के बाद यह बात समझना मुश्किल नहीं होना चाहिये कि-
'जब कोई चतुर-चालाक व्यक्ति, राजनेता, ढोंगी संत/महात्मा, कथित समाज सुधारक या उद्धारक और, या इन सबके अंधभक्त झूठे-सच्चे और मनगढंथ किस्से-कहानियां, लच्छेदार भाषण, लुभावने नारे तथा सम्मोहक जुमलों के जरिये आम सभाओं या कैडर-कैम्पस में भोले-भाले लोगों को कुछ समय के लिये या जीवनभर के लिये दिमांगी तौर पर गुमराह, भ्रमित या सम्मोहित (Misleading, Confused, or Hypnotized) करके उनका मत, सहयोग और समर्थन हासिल कर लें तो इसे मैं डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 'जेहनी जहरखुरानी' या दिमांगी बेहोशी का अपराध मानता हूं। मेरी राय में 'जेहनी जहरखुरानी' का अपराध 'जहरखुरानी' से भी अधिक गम्भीर अपराध है। मगर इसके लिये कानून में कोई सजा मुकर्रर नहीं है।' इस बारे में सबसे पहले मैंने 22 अक्टूबर, 2017 को सोशल मीडिया पर लिखा था।

'जेहनी जहरखुरानी' की गम्भीरता को समझने के लिये यह यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत में और भारत के बाहर अनेक ऐसे व्यक्ति, समूह, संगठन और राजनीतिक दल कार्यरत हैं। जो भारत के आम लोगों को गुमराह, भ्रमित या सम्मोहित (Misleading, Confused, or Hypnotized) करने के लिये लगातार तरह-तरह की अफवाह फैलाते रहते हैं। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते रहते हैं। तरह-तरह के षड़यंत्र रचते रहते हैं। लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते रहते रहते हैं, ताकि वे आम लोगों में घृणा, दुश्मनी एवं प्रतिशोध (Hatred, Hostility and Vengeance) की भावना जगा सकें। ऐसा करके वे अपने पक्ष में जनमत (Public Opinion) तैयार करते हैं। जिससे उनके दुराशय और दुराग्रह पूर्ण होते हैं, संक्षेप में यही 'ज़ेहनी ज़हरख़ुरानी' का मकसद होता है। जिसके दुष्परिणाम ना-ना प्रकार के दंगे, अपराध, साम्प्रदायिक वैमनस्यता, जातीय/धार्मिक उन्माद, लैंगिक विभेद, अलोकतांत्रिक लोगों और दलों को चुनावी सफलता के रूप में देखे जा सकते हैं।

ऐसा भारत के हर गांव, ढाणी, मुहल्ला, कस्बा, शहर, नगर और महानगर में हर दिन हो रहा है। अत: 'ज़ेहनी जहरखुरानी' के इस गम्भीरतम अपराध को रोकने के लिये भारत के प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र के विवेकवान, किन्तु अपूर्वाग्रही तथा साहसी लोगों की समर्पित टीम की जरूरत है, जिनमें अपने अनुभव तथा समझ के जरिये 'ज़ेहनी जहरखुरानी' के अपराध को समझने की योग्यता हो।

अत: 'जेहनी जहरखुरानी' की समझ रखने वाले, हम लोगों को प्राथमिक तौर पर अपने आप से 3 अपेक्षाएं करनी चाहिये:-

1-पहला इस 'जेहनी जहरखुरानी' से खुद बचें और दूसरे लोगों को बचायें।
2-दूसरा 'जेहनी जहरखुरानी' के अपराधियों को सजा दिलवाने के लिये दण्डात्मक कानूनी प्रावधान बनवाने हेतु हर सम्भव प्रयास करें।
3-उपरोक्त के अलावा इस ग्रुप पर अन्य किन्हीं विचारों को प्रचार-प्रसार नहीं होगा।

उपराक्त लक्ष्यों को हासिल करने के लिये, मैं समझता हूं कि सबसे पहला काम है, लोगों को 'जेहनी जहरखुरानी' को समझने योग्य बनाने के लिये जनजागरण करना। इसी मकसद को हासिल करने के लिये यह फेसबुक ग्रुप (आज 20.12.2017 को) बनाकर सोशल मीडिया के मार्फत 'जेहनी जहरखुरानी' के विरुद्ध देशभर के लोगों को एकजुट करने का एक छोटा सा प्रयास शुरू किया जा रहा है। इच्छुक संजीदा मित्रों का स्वागत है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
मो. एवं वाट्सएप नम्बर: 9875066111, 20.12.2017
https://www.facebook.com/groups/246817575849750/?source=create_flow

Saturday, December 16, 2017

शतप्रतिशत ब्राह्मण पुजारियों पर सवाल उठाना बेमानी!

शतप्रतिशत ब्राह्मण पुजारियों पर सवाल उठाना बेमानी!


अनेक गैर-ब्राह्मण विद्वान अकसर यह सवाल उठाते रहते हैं कि भारत के सभी मंदिरों में पुजारी के रूप में शतप्रतिशत केवल ब्राह्मणों का ही कब्जा क्यों है? यह भी सवाल उठाते हैं कि श्रीकृष्ण जो यादव थे, हनुमान जो आदिवासी थे, फिर भी इनके मन्दिरों में भी ब्राह्मणों का ही कब्जा क्यों है? ऐसे सवाल उठाने वाले विद्वानों से मेरा कहना है कि इस प्रकार के सवाल पूछना ही उचित नहीं है, क्योंकि मंदिर नामक कारखानों (धार्मिक बिजनिश) की खोज और स्थापना सदियों पूर्व ब्राह्मणों के जिन पूर्वजों ने की है, उन मंदिरों की देखरेख और उनके संचालन की जिम्मेदार किसी ब्राह्मणों के वर्तमान वंशजों द्वारा गैर-ब्राह्मण-समुदाय के लोगों को कैसे और क्यों सौंपी जा सकती है? अत: सभी मन्दिरों में ब्राह्मणों के शतप्रतिशत पुजारी होने पर सवाल उठाना, उनके पैतिृक हकों पर सवाल उठाने के समान है। उनकी जमी-जमायी व्यवस्था (धार्मिक बिजनिश) को छीनने के समान है। जिसके लिये सदियों से उनके पूर्वजों ने अनेक प्रकार के परिश्रम किये हैं और वे अभी भी कर रहे हैं! हां निर्धारित दान-दक्षिणा अदा करने में आस्था और विश्वास रखने वाले भक्त और अंधभक्त बनकर अवश्य आम लोगों को मन्दिरों के प्रांगण में प्रवेश की अनुमति है। कथित शूद्रों/अछूतों को अभी तक मन्दिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी, लेकिन आधुनिक भारत में कथित शूद्रों/अछूतों के वोट हासिल करने के लिये, कथित शूद्रों/अछूतों को भी मन्दिरों में प्रवेश दिलाकर उन्हें पाप योनि से मुक्ति दिलाकर वैकुण्ठ में सीट पक्की करवाने के मकसद से नवीन व्यवस्था संचालित की जाती रही है। जिसके लिये जन्म आधारित जाति व्यवस्था के कट्टर पोषक स्वयं सेवक कथित शूद्रों/अछूतों को गाजे-बाजे के साथ, सामूहिक रूप में से मन्दिरों में प्रवेश दिलाने हेतु लगातार प्रयास (कुटिलतापूर्ण-राजनीतिक-ढोंग) करते रहते हैं। जिससे कि पुजारियों और उनके पूर्वजों की जमी-जमायी व्यवस्था (धार्मिक बिजनिश) को नये ग्राहक तथा आधुनिक राजनीतिक दुकान भाजपा को वोटर उपलब्ध करवाये जा सकें।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
जयपुर, राजस्थान। 9875066111, 16 दिसम्बर, 2017

Wednesday, December 13, 2017

प्रधानमंत्री द्वारा 'जेहन जहरखुरानी' लोकतंत्र को खतरा?

प्रधानमंत्री द्वारा 'जेहन जहरखुरानी' लोकतंत्र को खतरा?
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
भारत के इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री हमेशा अपने सम्बोधनों में देश का नाम 'भारत' के बजाय 'हिन्दुस्तान' का उपयोग करते हैं। जो प्रधानमंत्री पद की शपथ और संविधान का खुला अल्लंघन है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा लोकल स्तर के गैर-संजीदा और अपरिपक्व प्रचारकों की भांति हिन्दू-मुसलमानों के मध्य वैमनस्यता पैदा करने वाले घृणास्पद बयान दिये गये हैं। ऐसे बयान जिनका मकसद केवल चुनाव जीतना ही नहीं है, बल्कि भोले-भाले और आम देशवासियों को गुमराह करना भी है।

हम सभी जानते हैं कि रेल-बस यात्रा के दौरान धोखे से नशीली वस्तुओं का सेवन करवाकर यात्रियों को बेहोश, अर्द्ध-मूर्छित करके लूटा जाता है तो जहरखुरानी का आपराधिक जन्म लेता है। इसी तरह से भारत के प्रधानमंत्री और उनकी टीम के लोग भारत के लोगों के समक्ष गलत बयानी के जरिये लोगों के अवचेतन मन को सम्मोहित करके जहां एक ओर लोगों का मत प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लोगों के मध्य सदियों से स्थापित साम्प्रदायिक सौहार्द तथा आपसी भ्रातृत्व को नेस्तनाबूद करके नफरत का वातावरण पैदा कर रहे हैं। यह कुकृत्य 'जेहन जहरखुरानी' का संगीन अपराध है।

राजनीति की आड़ में प्रधानमंत्री के स्तर पर भारत के लोकतंत्र को खतम करने का खतरनाक खेल तो नहीं खेला जा रहा है? इसे हलके से नहीं लिया जा सकता! अत:देश के सभी समुदायों के प्रबुद्ध लोगों को इस बारे में गम्भीरतापूर्वक चिंतन, मंथन और विमर्श करने के सख्त जरूरत है। अन्यथा भारत भी उन देशों में शामिल हो सकता है, जहां पर जनता को दशकों से फासिस्ट लोगों के अधिनायकतंत्र से मुक्ति मिलना असंभव हो चुका है! आखिर हम कब तक यों ही चुपचाप सिसकते रहेंगे? देशवासियों को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी, क्योंकि बालेंगे नहीं तो कोई सुनेगा कैसे?

'हमारा मकसद साफ! सभी से साथ इंसाफ!'
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी सब एक सामान!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
जयपुर, राजस्थान। 9875066111, 13 दिसम्बर, 2017

Thursday, December 7, 2017

हक रक्षक दल (HRD) की ओर से डॉ. अम्बेड़कर को श्रृद्धांजलि

हक रक्षक दल (HRD) की ओर से डॉ. अम्बेड़कर को श्रृद्धांजलि

अन्याय, असमानता, छुआछूत और सामाजिक अन्याय विरुद्ध संघर्षशील रहे तथा संविधान निर्माण में विशेष योगदान करने वाले डॉ. भीमराव अम्बेड़कर की आज ही के दिन, 6 दिसम्बर, 1956 को 65 वर्ष की आयु में संदिग्ध मृत्यु हुई थी। जिसकी जांच हेतु तत्कालीन सरकार ने सक्सैना समिति गठित की थी। जिसकी जांच रिपोर्ट का आज तक खुलासा नहीं किया गया है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि डॉ. अम्बेड़कर की असमय अकाल मौत अछूत जातियों और सामाजिक न्याय के मिशन के लिये बहुत बड़ी क्षति थी।

डॉ. अम्बेड़कर के जीवन दर्शन में आस्था और विश्वास रखने वालों की ओर से 14 अप्रेल और 6 दिसम्बर को देशभर बड़े-बड़े आयोजन किये जाते हैं। डॉ. अम्बेड़कर के नाम पर हर दिन राजनीति की जाती रहती है। अब तो संघ और भाजपा भी डॉ. अम्बेड़कर के बहाने, उनके अनुयाई वोटरों को हाई जैक करने के लिये अनेक हथकंडे अपना रहे हैं। इसी क्रम में डॉ. उदित राज जैसे ढोंगी अम्बेड़करवादी को भाजपा ने दलित-आदिवासियों को गुमराह करने का ठेका दे रखा है! भाजपा मित्र रामविलास पासवान ने भी दलित-आदिवासियों को गुमराह करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। दलित हितैषी होने का दम भरने वाली मायावती ने भी ब्राह्मण प्रेम के चलते डॉ. अम्बेड़कर की चिंता के केन्द्र रहे अछूतों के लिये बने एट्रोसिटी एक्ट को निलम्बित करके हृदयहीन अम्बेड़करवादी होने का परिचय दे चुकी हैं। वहीं वामन मेश्राम 'जय भीम' बोलने वालों को 'जय मूलनिवासी षड़यंत्र' में उलझाकर डॉ. अम्बेड़कर के विचारों से विमुख करने में लिप्त हैं।

डॉ. अम्बेड़कर के नाम से अम्बेड़करवादियों द्वारा सामाजिक एकता तथा परिवर्तन की हुंकार तो भरी जाती है। मगर दु:ख इस बात का है कि जो डॉ. अम्बेड़कर जीवनभर जिन अछूतों के लिये संघर्ष करते रहे, उन्हीं अछूतों के राजनेताओं और समाज सुधारकों या अम्बेड़करवादियों में से किसी ने भी उनकी संदिग्ध मौत की निष्पक्ष जांच करवाने, सक्सैना समिति की जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और यदि कोई दोषी थे, तो उनको सजा दिलवाने हेतु आज तक कोई जनांदोलन नहीं चलाया।

दूसरी बात डॉ. अम्बेड़कर द्वारा तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से अछूतों के लिये स्वीकृत करवाये गये, लेकिन एम के गांधी द्वारा लागू होने से पहले ही छीन लिये गये साम्प्रदायिक पंचाट को वापस पाने के लिये भी अछूतों की ओर कोई परिणामदायी गंभीर प्रयास नहीं किये गये।

मेरी दृष्टि में अम्बेड़करवादियों की ओर से डॉ. अम्बेड़कर को दी जाने वाली श्रृद्धांजलि उक्त दोनों मांगों के बिना अधूरी और सिर्फ औपचारिकता मात्र रह जाती हैं। इससे भी बड़ा दु:ख तो इस बात का है कि डॉ. अम्बेड़कर की संदिग्ध मौत से पर्दा हटाये बिना इस दिन को 'निर्वाण दिवस' के रूप में मनाने वाले, उनकी संदिग्ध मौत पर सीधे-सीधे पर्दा डालने का काम कर रहे हैं। जिस व्यक्ति को जीवन की अंतिम सांस प्रकृति के अनुक्रम में नहीं लेने दी गयी हो, उनके जीवन के समापन को निर्वाण प्राप्ति कहकर महिमामण्डित करना, मेरी राय में उनकी संदिग्ध मौत के लिये जिम्मेदार लोगों को बचाने के अपराध से कम नहीं है।

हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन द्वारा देशभर में सेवारत अपने लाखों समर्थकों और सदस्यों की ओर से आज के दिन डॉ. अम्बेड़कर को श्रृद्धासुमन अर्पित करते हुए केन्द्र सरकार से खुली मांग की जाती है कि-
  • 1. डॉ. अम्बेड़कर की संदिग्ध मौत की निष्पक्ष जांच करवाई जावे।
  • 2. सक्सैना समिति की जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जावे। और
  • 3. जांच रिपोर्ट में यदि कोई दोषी थे, तो उनको सजा दिलाई जावे।
उपरोक्त के अलावा डॉ. अम्बेड़कर प्रेमियों की भावनाओं का सम्पूर्ण आदर करते हुए, उनसे विनम्र निवेदन है कि जब तक डॉ. अम्बेड़कर की संदिग्ध मौत का खुलासा नहीं हो जाता है, उनकी संदिग्ध मौत के दिन को 'निर्वाण दिवस' के नाम देकर, कथित हत्यारों को बचाने का काम नहीं करें। इस धोखे भरे-दर्दनाक दिवस को 'निर्वाण दिवस' नाम देकर डॉ. अम्बेड़कर के कथित हत्यारों और षड़यंत्रकारियों को संरक्षण प्रदान करने में सहयोगी नहीं बनें।

यदि हम भारत के लोग महान विधिवेत्ता और संविधान के शिल्पकार के रूप में पहचाने जाने वाले भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेड़कर के योगदान और संघर्षमय जीवन को वाकई सच्ची श्रृद्धांजलि देना चाहते हैं तो हमें केवल उनके नाम और संघर्ष का गुणगान करते रहने के बजाय, आज ​के दिन संविधान खरीदकर संविधान का गहराई से अध्ययन करना होगा। जो लोग संविधान खरीद नहीं सकते, उन्हें खरीदकर देना होगा। जो लोग संविधान को पढ या समझ नहीं सकते, उनके लिये देशभर में लगातार संविधान वाचन का अभियान चलान चलाने का निर्णय लेना होगा। जिससे फासिस्ट ताकतों से संविधान को बचाया जा सके और संविधान के कल्याणकारी, लोकतांत्रिक तथा मानवता संरक्षक प्रावधानों को कड़ाई से लागू करने और करवाने हेतु लोगों को संविधान के प्रति जागृत किया जा सके।

जय भारत! जय संविधान!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
जयपुर, राजस्थान। 9875066111, 06 दिसम्बर, 2017

Tuesday, December 5, 2017

मीणाओं को कट्टर संघी हिन्दू और दलित हिन्दू में से कौनसी पहचान अपमानकारी या गौरवमयी लगती है?

मीणाओं को कट्टर संघी हिन्दू और दलित हिन्दू में से कौनसी पहचान अपमानकारी या गौरवमयी लगती है?
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
आज सुबह आभासी दुनिया के एक मीणा से मोबाइल पर बात हुई। बातों से वे बड़े परेशान और चिंतित लग रहे थे। उनकी परेशानी का कारण यह था कि राजस्थान के जालौर जिले में प्रस्तावित किसी धार्मिक आयोजन के बहाने *आदिवासी मीणा जाति को दलित बनाने का षड्यन्त्र चल रहा है।* उनकी सारी बातें और दलीलें सुनने के बाद मैंने उनसे सीधे-सीधे पूछा कि-


1. दशकों से देशभर के आदिवासियों को दलित बोला और लिखा जाता रहा है। मगर आपको या मीणा जाति के लोगों को इससे कभी कोई पीड़ा क्यों नहीं हुई?
2. अब जब आपके अनुसार केवल मीणा जाति को टारगेट करके मीणाओं को दलित बनाये जाने का षड़यंत्र रचा जा रहा है, आप केवल दलित बनाये जाने की आशंका मात्र से ही तिलमिला रहे हैं? जबकि हजारों आदिवासियों को अजजा के बजाय, ओबीसी एवं अजा वर्गों में शामिल किया जा चुका है एवं ईसाई तक बनाया जा चुका है! तब आप ​कहां थे?
3. राजस्थान की मीणा जाति को 2-3 दशक से सुनियोजित तरीके से संघी गुलाम बनाया जा रहा है। तब आपने चुप्पी क्यों नहीं तोड़ी?
4. मीणा जाति, जो वैवाहिक तथा धर्म-कर्म-कांडों में तो श्रृद्धापूर्वक वैदिक रीति-रिवाजों का पालन करती है, लेकिन विवाह विच्छेद के समय अहिन्दू आदिवासी बनकर पंचायती फरमान जारी करने में गर्व का अनुभव करती है। ऐसे में क्या इस बात का निर्णय नहीं होना चाहिए कि मीणा जाति के लोग अहिंदू आदिवासी हैं या केवल हिन्दू जनजाति हैं?
5. जिन आदिवासी मीणाओं को हिंदू धर्म के निम्नतम शुद्र वर्ण की गुलामी में कैद रखने वाले संघी नेताओं की संघी पहचान के तले दबे रहने में अपमान का अहसास नहीं होता, उन मीणाओं को दलित बनाने की आशंका मात्र से ही परेशानी हो रही है। आखिर इसकी कोई वजह तो होनी चाहिये?

लम्बी चर्चा के बाद मैंने मीणा मित्र को कहा कि अब समय आ गया है, जबकि मीणा जाति को बात का निर्णय कर ही लेना चाहिये कि-

  • (1) आर्यों के हाथों धोखे से मारे गए मीन-ध्वजाधारी मीणाओं के पूर्वज आदिवासी राजा के वंशज होने में मीणा जाति का गौरव है या अपमान?
  • (2) यूरेशियन आर्य राजा विष्णु के कथित मीनावतार को मीणा जाति का पूर्वज मानकर पूजा करने में मीणा जाति का गौरव है या अपमान?
  • (3) संघियों के षड्यन्त्र में फँसकर कट्टर हिंदू संघी बने रहने में मीणा जाति का गौरव है या अपमान?
  • (4) राजनीति की खातिर मीणा जाति को दलित बनाने वालों से भयभीत होकर दलित नहीं बनने में मीणा जाति का गौरव है या अमपान?
अंत में मैंने उन्हें साफ शब्दों में कहा कि यदि मीणाओं को अहिन्दू आदिवासी कहलवाने में शर्म तथा अपमान की अनुभूति होती है तो मीणा जाति के लोगों को यह निर्णय तो करना ही होगा कि कट्टर संघी हिन्दू और दलित हिन्दू में से कौनसी पहचान अपमानकारी या गौरवमयी लगती है?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
जयपुर, राजस्थान। 9875066111, 05 दिसम्बर, 2017

शरद यादव का अवसान या पुनरोदय?

शरद यादव का अवसान या पुनरोदय?
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
भारतीय राजनीति में शरद यादव किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अनेक लोगों का मानना है कि बहुत से राजनीतिक उतार-चढावों के बावजूद भी वर्तमान भारत में सामाजिक न्याय की अवधारणा के सच्चे ​अनुयाईयों तथा संसदीय परम्पराओं के समर्थकों में शरद यादव जिंदा मिशाल हैं।




पूर्व में भाजपा की साझी बिहार सरकार में मौन धारण करने के बाद, अचानक हृदय परिवर्तन हो गया या कोई राजनीतिक बदलाव, लेकिन इस बार शरद यादव, नीतीश कुमार से अलग हो गये। पिछली साझी बिहार सरकार के समय शरद यादव जनता दल (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। अत: तब उनके लिये भाजपा के साथ साझी सरकार चलाने का विरोध करना अधिक सुगम था, लेकिन तब वे चुप रहे (?) इस बार जब उनसे राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी छिन गयी, तब भाजपा का विरोध करना, उन्हें क्यों उचित लगा (?), यह तथ्य अपने आप में अनेक सवालों को जन्म देता है? राजनीति के जानकार अनेक लोगों का मानना है कि अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी छिन जाने के कारण ही शरद यादव का यह कूटनीतिभरा निर्णय है। जिसके तहत वे संघ-भाजपा से दूरी बनाकर जनता दल के गठन के समय प्रारम्भ की गयी सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढाने को कृतसंकल्प बताये जाते हैं।

इस क्रम में 4 दिसम्बर, 2017 को उनकी राज्यसभा की सांसदी तो छिन ही चुकी है। आने वाले तीन महिनों में दिल्ली स्थित बंगला भी खाली करना पड़ेगा। ऐसे में शरद यादव का अपने ही दल के विरोध में शुरू किया गया राजनीतिक अभियान और खुद उनका राजनीतिक जीवन क्या मोड़ लेगा? यह वर्तमान राजनीति के दांव-पेचों के जानकारों के लिये गम्भीर विषय हो सकता है। क्योंकि भारत की वर्तमान राजनीति के हालात शरद यादव जैसे राजनेता के अवसान या पुनरोदय दोनों ही दिशाओं के मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह शरद यादव के राजनीतिक कौशल पर निर्भर करता है कि उनके द्वारा कब और क्या निर्णय लिये जाते हैं?
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
जयपुर, राजस्थान। 9875066111, 05 दिसम्बर, 2017

Saturday, December 2, 2017

यदि ईवीएम का यही रुझान (चमत्कार) जारी रहा तो गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत और लोकतंत्र की हत्या तय है।

यदि ईवीएम का यही रुझान (चमत्कार) जारी रहा तो गुजरात और
हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत और लोकतंत्र की हत्या तय है।
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
दैनिक जागरण के मुख्य सम्पादकीय के अन्तिम पेराग्राफ में किशोर जोशी लिखते हैं कि-
''उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव परिणाम गुजरात में कितना असर दिखाएंगे, इसका फिलहाल आकलन करना कठिन है, लेकिन इतना अवश्य है कि जहां कांग्रेस गुजरात में इन चुनावों का उल्लेख करने से बचेगी वहीं भाजपा उन्हें अपनी उपलब्धि के तौर पर रेखांकित करेगी। जो भी हो, यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि निकाय चुनाव नतीजे आते ही एक बार फिर से ईवीएम के खिलाफ रोना-पीटना मच गया है। यह चुनाव आयोग को लांछित करने वाली गंदी राजनीति है। अगर ईवीएम की गड़बड़ी ने भाजपा की मदद की तो फिर 16 नगर निगमों में से 2 विपक्ष के पास कैसे चले गए? यह संयोग ही है कि दोनों नगर निगम उस बसपा के खाते में गए जिसने ईवीएम के खिलाफ सबसे ज्यादा शोर मचाया था।''
जोशी का तर्क है-''अगर ईवीएम की गड़बड़ी ने भाजपा की मदद की तो फिर 16 नगर निगमों में से 2 विपक्ष के पास कैसे चले गए? यह संयोग ही है कि दोनों नगर निगम उस बसपा के खाते में गए जिसने ईवीएम के खिलाफ सबसे ज्यादा शोर मचाया था।''




उक्त तर्क को यदि थोड़ा सा बदल दिया जाये तो-''ईवीएम की गड़बड़ी से सभी 18 नगर निगमों के नतीजे अगर भाजपा के पास चले गए होते तो? वह बसपा जिसने ईवीएम के खिलाफ सबसे ज्यादा शोर मचाया था। सही सबित हो जाती? अत: क्या यह नहीं हो सकता कि जानबूझकर दो नगरनिगम बसपा के पक्ष में जाने दिये गये हों?''

उपरोक्त तर्क का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है और न ही चुनाव प्रणाली पर सवाल उठाना मेरा मकसद है, लेकिन यह सवाल इसलिये जरूरी हो जाता है, क्योंकि सहारनपुर, उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी शबाना को खुद का और उसके पति तक का वोट नहीं मिला।

अकेली शबाना के साथ ऐसा नहीं हुआ, बल्कि उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में ग्राम पंचायत प्रधान के चुनावों में सैकड़ों प्रत्याशियों को खुद अपना ही वोट नहीं मिला। मुझे नहीं याद कभी इतिहास में ऐसा हुआ हो? क्या यह ईवीएम का ही चमत्कार नहीं है?

यदि ईवीएम का यही रुझान (चमत्कार) जारी रहा तो गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की जीत और लोकतंत्र की हत्या तय है। जिसके चलते लोकतंत्र समाप्त होना और फासिस्ट ताकतों का भारत पर स्थायी कब्जा होना, भारत के दु:खद भविष्य का संकेत है। जिस पर सभी दलों और विशेष रूप से ईवीएम की जन्मदात्री कांग्रेस को समय रहते कठोर निर्णय लेने की जरूरत है।
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख, हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 9875066111, 02.12.2017

Thursday, November 30, 2017

सवाल: क्या अतीत गलतियों को सुधारे बिना, वर्तमान में जारी शोषण से मुक्ति सम्भव है?

सवाल: क्या अतीत गलतियों को सुधारे बिना, वर्तमान में जारी शोषण से मुक्ति सम्भव है?

आजादी के वक्त जो सामंत और पूंजीपति थे। उनके द्वारा अर्जित सम्पदा में क्या उन दमित, दलित, वंचित और उत्पीड़ित मजदूरों का योगदान नहीं था, जिनका शोषण करके उनके द्वारा अकूत सम्पदा अर्जित की गयी थी?

यदि हां तो ऐसे शोषकों की सम्पत्ति का राष्ट्रीय करण करते समय—
  • 1. उन शोषकों के एशोआराम के लिये सरकारी कोष से मुआवजा देने का क्या कोई संवैधानिक औचित्य था?
  • 2. क्या ऐसे शोषकों को संविधान की भावना के अनुसार आम आदमी के बराबर खड़ा करने के लिये मुआवजा दिया गया था? या उन्हें उनकी सम्पत्ति के राष्ट्रीयकरण के बाद भी लाटसाहब बनाये रखने के लिये मुआवजा दिया गया था?
  • 3. उक्त शोषक पूंजिपतियों और सामंतों को मुआवजा दिये जाने के पक्षधर तत्कालीन सत्ता के कर्णधारों, राजनेताओं, संविधानविदों, कानूनविदों, अर्थशास्त्रियों और, या समाजसुधारकों क्या वंचित समुदायों का हितैषी माना जाना चाहिये?

जब तक हम इन विषयों के सही और सच्चे उत्तर नहीं तलाशेंगे, वर्तमान भारत में शोषण से मुक्ति की बात करना बेमानी है। अत: मेरा सवाल यही है कि क्या अतीत की गलतियों को सुधारे बिना, वर्तमान में जारी शोषण से मुक्ति सम्भव है?

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख, हक रक्षक दल (HRD) 9875066111, 30.11.2017

Sunday, November 26, 2017

संविधान दिवस: संविधान निर्माण और भ्रान्तियां!—2: डॉ. अम्बेड़कर पर यह आरोप निराधार है कि उन्होंने संविधान में आरक्षण के प्रावधान लिख दिये।

संविधान दिवस: संविधान निर्माण और भ्रान्तियां!-2: डॉ. अम्बेड़कर पर यह आरोप निराधार है कि उन्होंने संविधान में आरक्षण के प्रावधान लिख दिये।

मुझे जहां तक याद है, 18 साल की उम्र से अनारक्षित वर्ग के लोगों से यह वाक्य सुनता आ रहा हूं कि संविधान बनाने का काम डॉ. अम्बेड़कर को सौंप देने के कारण संविधान में अयोग्य लोगों (अजा एवं अजजा) को सरकारी नौकरियों एवं शिक्षण संस्थानों में प्रवेश हेतु आरक्षण प्रदान कर दिया।

इस सम्बन्ध में, मैं अनारक्षित वर्ग के ऐसे गुमराह मित्रों को संविधान दिवस के दिन अवगत करवाना चाहता हूं कि सराकरी नौकरियों और सरकारी शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में निर्धारित अर्हताओं में छूट प्रदान करने के जो प्रावधान संविधान के मूल अधिकारों के शीर्षक से संविधान के भाग-3 के अनुच्छेद 15 एवं 16 में शामिल किये गये हैं।

इस सम्बन्ध में यह एक दस्तावेजी प्रमाण है कि संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण हेतु अनेक समितियों का निर्माण किया गया था। जिनकी सिफारिशों पर गहन चर्चा के बाद संविधान सभा द्वारा आम सहमति या बहुमत से स्वीकृत प्रावधानों को, अंत में डॉ. अम्बेड़कर के नेतृत्व वाली 7 सदस्यीय संविधान प्रारूप समिति द्वारा लिखा गया।
यहां सबसे बड़ा तथ्य यह है कि मौलिक अधिकारों के निर्धारण के लिये बनायी गयी समिति के अध्यक्ष सरदार बल्लभभाई पटेल थे। डॉ. अम्बेड़कर तो इस समिति के सदस्य तक नहीं थे। ऐसे में डॉ. अम्बेड़कर पर यह आरोप निराधार है कि उन्होंने संविधान में आरक्षण के प्रावधान लिख दिये। 

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख, हक रक्षक दल (HRD) 9875066111, 26.11.2017

संविधान दिवस: संविधान_निर्माण और भ्रान्तियां!




*संविधान दिवस: संविधान निर्माण और भ्रान्तियां!*


भारत के संविधान के बारे में एक वर्ग विशेष द्वारा अनेक प्रकार की भ्रांतियां प्रचारित की जाती रहती हैं। इसी क्रम में सोशल, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से लगातार यह झूठ प्रचारित किया जाता रहा है कि-





''संविधान संविधान सभा में अम्बेड़कर सहित कुल 7 सदस्य थे। उनमें से एक की मृत्यु हो गयी। एक अमेरिका में रहने लगे। एक को सरकारी काम से फुर्सत नहीं मिली। दो बीमार होने के कारण दिल्ली से बाहर रहते थे। छठे तत्कालीन राष्ट्रपति थे, जिन्हें राजकाज से फुर्सज नहीं थी। इस प्रकार 6 सदस्यों ने संविधान निर्माण में कोई योगदान नहीं किया। अस्वस्थ होते हुए अकेले डॉ. अम्बेड़कर ने अपने कंधों पर संविधान निर्माण का जिम्मा संभाला और विश्व का सबसे अच्छा संविधान बनाया।''


जबकि अधिकृत तथ्य यह है कि संविधान का निर्माण जिस संविधान सभा ने किया। जिसमें भारत विभाजन के बाद 7 नहीं, बल्कि 299 सदस्य थे। जिन 7 (सात) सदस्यों के बारे में भ्रामक जानकारी फैलायी जाती है, वह भी आधी-अधूरी है। संविधान निर्माण के लिये अनेक समितियों का गठन किया गया था। जिनकी रिपोर्ट्स के अनुसार संविधान को लिखित अन्तिम रूप देने के लिये डॉ. अम्बेड़कर के नेतृत्व में सात सदस्यीय संविधान प्रारूप समिति बनायी गयी थी। जिसमें डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे ही नहीं। संविधान प्रारूप समिति में 7 सदस्यों की सूची इस प्रकार है:-
समिति में अध्यक्ष डा. अंबेडकर के अतिरिक्त 6 सदस्य थे:-

  • *1. अल्लादि कृष्णस्वामी।* 
  • *2. बी.एल. मित्तर।* 
  • *3. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी।* 
  • *4. एन. गोपालस्वामी आयंगर।* 
  • *5. डी.पी. खेतान।* 
  • *6. सैयद मोहम्मद सआदुल्ला।*

*नोट: बाद में बी.एल. मितर के स्थान पर एन. माधवराव नियुक्त हुए और डी.पी. खेतान की मृत्यु के पश्चात् उनके स्थान पर टी.टी. कृष्णमाचारी शामिल किये गये।*

संविधान निर्माण हेतु संविधान सभा के अधीन अनेक समितियां बनायी गयी थी। प्रमुख समितियो की सूची इस प्रकार है:-
  • 1.प्रक्रिया विषयक नियमों संबंधी समिति, जिसके *अध्यक्ष-राजेन्द्र प्रसाद।*
  • 2. संचालन समिति, जिसके *अध्यक्ष-राजेन्द्र प्रसाद।*
  • 3. वित्त एवं स्टाफ समिति, जिसके *अध्यक्ष-राजेन्द्र प्रसाद।*
  • 4. प्रत्यय-पत्र संबंधी समिति, जिसके *अध्यक्ष-अलादि कृष्णास्वामी अय्यर।*
  • 5. आवास समिति, जिसके *अध्यक्ष-बी. पट्टाभि सीतारमैय्या।*
  • 6. कार्य संचालन संबंधी समिति, जिसके *अध्यक्ष-के.एम. मुन्शी।*
  • 7. राष्ट्रीय ध्वज संबंधी तदर्थ समिति, जिसके *अध्यक्ष-राजेन्द्र प्रसाद।*
  • 8. संविधान सभा के कार्यकरण संबंधी समिति, जिसके *अध्यक्ष-जी.वी. मावलंकर।*
  • 9. राज्यों संबंधी समिति, जिसके *अध्यक्ष-जवाहरलाल नेहरू।*
  • 10. मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यकों एवं जनजातीय और अपवर्जित क्षेत्रों संबंधी सलाहकारी समिति, जिसके *अध्यक्ष-सरदार वल्लभभाई पटेल।*
  • 11. मौलिक अधिकारों संबंधी उप-समिति, जिसके *अध्यक्ष-जे.बी. कृपलानी।*
  • 12. पूर्वोत्तर सीमांत जनजातीय क्षेत्रों और आसाम के अपवर्जित और आंशिक रूप से अपवर्जित क्षेत्रों संबंधी उपसमिति, जिसके *अध्यक्ष-गोपीनाथ बारदोलोई।*
  • 13. अपवर्जित और आंशिक रूप से अपवर्जित क्षेत्रों (असम के क्षेत्रों को छोड़कर) संबंधी उपसमिति, जिसके *अध्यक्ष-ए.वी. ठक्कर।*
  • 14. संघीय शक्तियों संबंधी समिति, जिसके *अध्यक्ष-जवाहरलाल नेहरु।*
  • 15. संघीय संविधान समिति, जिसके *अध्यक्ष-जवाहरलाल नेहरु।*
  • 16. प्रारूप समिति, जिसके *अध्यक्ष-बी.आर. अम्बेडकर।*
*दस्तावेजी तथ्यात्मक सत्य यह है कि उक्त सभी समितयों ने अपनी—अपनी योग्यता के अनुसार परिश्रम करके संविधान निर्माण कार्य को अंजाम दिया। क्रम 1 से क्रम 15 तक वर्णित समितियों की रिपोर्ट्स पर संविधान सभा में गहन, विमर्श, चर्चा और बहस हुई। अन्त में जिन मुद्दों पर संविधान सभा में सहमति बनी या बहुमत जिसके पक्ष में था, उसके अनुसार निर्णीत प्रावधानों को क्रम 16 पर उल्लिख्ति डॉ. अम्बेड़कर के नेतृत्व वाली 7 सदस्यीय समिति द्वारा संविधान को केवल लिखा गया। इस समिति द्वारा संविधान का निर्माण नहीं किया गया। इसके अलावा भी बहुत कुछ है, जो जानबूझकर छिपाया या गलत प्रचारित किया जाता रहा है। जो भयंकरतम अपराध है, क्योंकि इसकी वजह से वर्तमान पीढियां अज्ञान तथा भ्रांतियों की शिकार हो रही हैं।*
*क्रमश: जारी......*
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख, हक रक्षक दल (HRD) 9875066111, 26.11.2017, जयपुर, राजस्थान।

Friday, November 24, 2017

स्मृतियां: एससीएसटी रेलवे ऐसोसिएशन के पदाधिकारियों के जमीर कैसे बिकते हैं?

स्मृतियां: एससीएसटी रेलवे ऐसोसिएशन के पदाधिकारियों के जमीर कैसे बिकते हैं?
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
मैंने 20 वर्ष से अधिक समय तक रेलवे में मजदूरी की है। इस दौरान मैंने एससीएसटी रेलकर्मियों के हकों का मजाक बनते हुए तथा एससीएसटी रेलवे ऐसोसिएशन के पदाधिकारियों के जमीर बहुत सस्ते में बिकते हुए देखे हैं।

उल्लेखनीय है कि एससीएसटी रेलकर्मियों के हकों की रक्षा हेतु भारतीय रेलवे में 'आॅल इण्डिया एससीएसटी रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन' संचालित है। लेकिन इस एसोसिएशन पर वर्षों ही नहीं, दशकों से काबिज अधिकतर पदाधिकारी अकसर बहुत सस्ते में बिकते रहते हैं।

अनेक बार मैंने देखा है कि नियम-कानूनों को ताक पर रखकर एससीएसटी के किसी रेलकर्मी के साथ अन्याय करने के लिये दोषी रेलवे अधिकारी को सजा दिलवाने की कोशिश करने के बजाय, दोषी रेल अधिकारी को बचाने के लिये एससीएसटी रेलवे ऐसोसिएशन के प्रमुख पदाधिकारियों द्वारा एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया जाता है।

कारण: एससीएसटी रेलवे ऐसोसिएशन के ऐसे भ्रष्ट पदाधिकारियों को इसके बदले/प्रतिफल में ठेकेदारों या माल आपूर्तिकर्ताओं के बिल पास करने का ऐसा कार्य आवंटित कर दिया जाता है। जिसमें प्रतिमाह वेतन से भी अधिक कमीशन मिलता है।

रेल-प्रशासन मुर्दाबाद का नाटक: दूसरी ओर एससीएसटी रेलवे ऐसोसिएशन के इन्हीं बिके हुए पदाधिकारियों द्वारा रेल दफ्तरों के सामने रेल-प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाने के नाटक किये जाते हैं। एससीएसटी रेलकर्मियों से चंदा उगाकर बड़े-बड़े सम्मेलन किये जाते हैं। जिनमें बड़ी-बड़ी आदर्श की बातें की जाती हैं। मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात।

ऐसोसिएशन में चुनावों का नाटक: एससीएसटी रेलवे ऐसोसिएशन के मूल संविधान में संशोधन करवाकर लोकतंत्र को दफल किया जा चुका है। अब प्रत्यक्ष के बजाय, अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली लागू करवादी गयी है। इस कारण चुनावों का केवल नाटक होता है। एसोसिएशन का हाई कमान जिनको चाहता है, उन्हें ही पदाधिकारी चुना जाता है।

स्थिति जस की तस: एससीएसटी रेलवे ऐसोसिएशन के ऐसे भ्रष्ट पदाधिकारी रेल अफसरों के साथ बैठकर एससीएसटी रेल​कर्मियों हितों की रक्षा के लिये वार्ता करते हैं! इसी कारण एससीएसटी रेलर्मियों की स्थितिस्थिति जस की तस है।

दुष्परिणाम: ऐसी स्थिति में पीड़ित और हतोत्साहित एससीएसटी रेलकर्मी, एससीएसटी वर्गों के हितों के विरुद्ध काम करने वाले मजदूर संघ तथा एम्पलाईज यूनियन की शरण में चले जाते हैं। जिसके चलते एससीएसटी वर्गों में मजबूती के बजाय बिखराव होता है। कमोबेश सम्पूर्ण भारतीय रेलवे में ऊपर से नीचे तक यही हो रहा है। ऐसे बिके हुए जमीर के लोग काला धन एकतित्रत करके विधायक तथा सांसद बनने के सपने भी देखते रहते हैं। इस कारण नौकरी में रहते हुए किसी न किसी राजनीतिक आका को अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित करके उसकी/उनकी चमचागिरी भी जारी रखते हैं।

नोट: एसोसिएशन में कुछ अच्छे पदाधिकारी भी हो सकते हैं, क्योंकि अपवाद हर जगह मौजूद होते हैं। लेकिन ऐसे लोगों को लम्बे समय तक पद पर नहीं रहने दिया जाता।
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन-9875066111, 24.11.2017, जयपुर, राजस्थान।

Wednesday, November 22, 2017

संविधान की कमजोरी का उदाहरण: भाजपा नेता द्वारा पादुकोण तथा भंसाली के सिर काट कर लाने वाले को 10 करोड़ का इनाम घोषित और पुलिस का शर्मनाक रवैया?


संविधान की कमजोरी का उदाहरण: भाजपा नेता द्वारा पादुकोण तथा भंसाली के सिर काट कर लाने वाले को 10 करोड़ का इनाम घोषित और पुलिस का शर्मनाक रवैया?
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

हरियाणा भाजपा के मुख्य मीडिया को-ऑर्डिनेट कुंवर सूरजपाल सिंह अम्मू के खिलाफ, हरियाणा गुरुग्राम के चक्करपुर गांव के निवासी पवन कुमार की शिकायत पर गुरुग्राम के सेक्टर 29 पुलिस थाने में धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया गया है। बॉलीवुड फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली और अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के सिर काटने की धमकी देने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। भाजपा नेता ने 'पद्मावती' फिल्म के विवाद पर दोनों के सिर काट कर लाने वाले को 10 करोड़ रुपये के इनाम की घोषणा की थी। अम्मू ने मंगलवार 21 नवम्बर को फिर से कहा कि उसने यह बयान बतौर एक राजपूत दिया है और वह अपने बयान पर अडिग है। इसके बावजूद पुलिस जांच अधिकारी सुनील कुमार ने कहा है कि कि जांच का हिस्सा बनने के लिए आरोपी अम्मू को जल्द ही नोटिस भेजा जाएगा। पुलिस का यह रवैया न मात्र शर्मनाक है, बल्कि ऐसे व्यवहार के कारण ही पुलिस की छवि खराब हो रही है। जिसकी पुलिस को चिन्ता करनी होगी।
यहां मेरा सवाल यदि यही धमकी किसी आम व्यक्ति या वंचित वर्ग के किसी आम व्यक्ति द्वारा दी गयी होती, तब भी क्या पुलिस का यही रवैया रहता? यदि यही रवैया नहीं रहता तो फिर संविधान के अनुच्छेद 14 के इस प्रावधान का क्या मतलब है, जो यह उपबन्धित करता है कि-'कानून के समक्ष सभी लोगों को समान समझा जायेगा और सभी लोगों को कानून का समान संरक्षण प्रदान किया जायेगा।'

मेरी स्पष्ट मान्यता है कि ऐसा इस कारण होता रहता है, क्योंकि संविधान स्पष्ट के प्रावधानों और मूल अधिकारों तक का उल्लंधन करने पर, किसी को, किसी भी प्रकार की सजा का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, जो संविधान की सबसे बड़ी कमजोरी है।
'हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन-9875066111, 22.11.2017, जयपुर, राजस्थान।

Friday, November 17, 2017

विमर्श: क्या हमारे कार्य करने के तरीकों में खोट या अव्यावहारिकता है?

विमर्श: क्या हमारे कार्य करने के तरीकों में खोट या अव्यावहारिकता है?

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

आजादी के बाद से वंचित समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव, अत्याचार और नाइंसाफी से मुक्ति हेतु अनेकानेक महान समाज सुधारकों ने अनेक अभियान चलाये और व्यथित, पीड़ित, उत्पीड़ित, वंचित लोगों को एकजुट करने के अनेक प्रयास किये। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर मूलभूत समस्याओं के स्थायी समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे। भेदभाव, अत्याचार और नाइंसाफी जस की तस जारी हैं, बल्कि नयी-नयी समस्याएं लगातार बढती जा रही हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश की सरकारों और शासकों के लिये यह स्थिति अपने आप में गहन चिन्ता का विषय होना चाहिये। विशेषकर तब जबकि वंचित समुदायों के वोट से बड़ी आसानी से सरकारें बन और बिगड़ सकती हैं। मगर व्यवहार में ऐसा हो नहीं रहा है।

2014 से 2016 में दुर्घटनाग्रस्त होने तक हक रक्षक दल (HRD) के राष्ट्रीय प्रमुख की हैसियत से मैंने भी अनेक राज्यों में अनेक दर्जन कार्यशालाओं, सभाओं और विविध सामाजिक आयोजनों को मुख्य वक्ता के रूप में प्रबुद्ध लोगों को सम्बोधित किया। लोगों की तालियां भी खूब मिली। देशभर में अनेकानेक विद्वान और अनेक संगठन लगातार अपने-अपने तरीके से प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद वंचित समुदायों की मूलभूत समस्याएं जस की तस कायम हैं, बल्कि वर्तमान में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं।

उपरोक्त पृष्ठभूमि में विद्वजनों के विमर्श हेतु कुछ सवाल प्रस्तुत हैं:-
1. क्या हमारे सुधार के प्रयास नाकाफी हैं?
2. क्या हमारे कार्य करने के तरीकों में खोट या अव्यावहारिकता है?
3. यदि हां तो क्या सुधार अपेक्षित हैं?

'हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन-9875066111, 17.11.2017, जयपुर, राजस्थान।

Thursday, November 16, 2017

यदि वंचितों के भगवान ही तारणहार हैं तो आर्य भगवानों के विरोध का औचित्य?

यदि वंचितों के भगवान ही तारणहार हैं तो आर्य भगवानों के विरोध का औचित्य?

लेख​क: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
15 नवम्बर को वीर बिरसा मुण्डा की जयन्ती पर, बिरसाभक्तों ने बिरसा को भगवान बिरसा सम्बोधित किया। अकसर देखा जाता है कि बिरसा, भीम और बुद्ध के अंधभक्त इन तीनों ही महापुरुषों को भगवान मानकर गुणगान, वंदना और पूजा अर्चना तक करते रहते हैं।












इन हालातें में कुछ सवाल खड़े होना लाजिमी है। जैसे कि—
  • 1. क्या वंचित लोग अपने महापुरुषों को भगवान बनाकर/मानकर, वंचकों से अपने हक हासिल कर पायेंगे?
  • 2. यदि भगवान ही वंचकों के तारणहार हैं तो वंचितों के बुजुर्गों द्वारा पूजे और माने जाते रहे भगवानों का विरोध कितना उचित है?
  • 3. यदि भगवानों की पूजा-अर्चना करके ही मंजिल हासिल हो सकती है तो फिर भगवानों के विरुद्ध आम-भोले लोगों को भटकाना कितना सही है?
  • 4. जो लोग अपने महापुरुषों को भगवान का दर्जा देते हैं। उन लोगों को इस बात का क्या हक है कि वे दूसरे समाजों द्वारा मान्य भगवानों को गाली-गलोंच करें?
  • 5. सामाजिक न्याय, हक-हकूक और भागीदारी के मिशन को किसी धर्म के विरोध या किसी धर्म के प्रचार से जोड़ना कितना सही है?
  • 6. महापुरुषों के अनुकरण हेतु उनकी पूजा-अर्चना ही एक मात्र मार्ग है या महापुरुषों के विचारों पर मंथन और विमर्श करने की भी जरूरत है?
  • 7. क्या पूजा-अर्चना और गुणगान करने से महापुरुषों के अधूरे काम पूरे हो जायेंगे?
उक्त सवालों और ऐसे ही अन्य सवालों पर अपूर्वाग्रही बुद्धिजीवियों से परिणामदायी विमर्श की अपेक्षा है।

'हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन-9875066111, 16.11.2017, Jaipur, Rajasthan

Saturday, November 11, 2017

वंचित वर्गों की बीमारी-ब्राह्मणवाद। जिसे जिन्दा रखने वाला संगठन-आरएसएस। इसका एक मात्र इलाज और टीकाकरण-संविधान का ज्ञान।

वंचित वर्गों की बीमारी-ब्राह्मणवाद। जिसे जिन्दा रखने वाला संगठन-आरएसएस। इसका एक मात्र इलाज और टीकाकरण-संविधान का ज्ञान।

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
आरएसएस किस प्रकार से लोगों के मन में धार्मिक नफरत पैदा रकता है। इसका एक उदाहरण प्रस्तुत है। राजस्थान पुलिस में सिपाही के पद पर सेवारत एक आदिवासी का अनुभव, जो उन्होंने मुझे बताया। सुरक्षा की दृष्टि से उनका नाम, पता गुप्त रखा गया है।



''जरूरत के मुताबिक पुलिस जाप्ता/पुलिस सिपाहियों की तैनाती विभिन्न जगहों पर की जाती रहती है। बीच-बीच में, मैं आरएसएस-भाजपा से जुड़े एक आदिवासी राजनेता की सुरक्षा में भी तैनात रहा हूं। इसी बीच केवल 15 दिन के लिये मैं आरएसएस की शाखा में चला गया। संयोग से इसके बाद मेरी ड्यूटी अजमेर दरगाह में लगा दी गयी। मेरी ड्यूटी अंदर दरगाह में थी, लेकिन आरएसएस की शाखा में जाने के कारण मुसलमानों के प्रति मेरे मन में इतनी घृणा पैदा हो गयी कि दरगाह में अन्दर घुसने का मन तक नहीं करता था। आखिर मैंने तय किया कि भविष्य में कभी भी आरएसएस की शाखा में नहीं जाऊंगा।''

यहां समझने वाली बात यह है कि आरएसएस लोगों के अवचेतन मन को अपने वश में करके, उन्हें कथित रूप से धार्मिक गुलाम बनाने और जन्मजातीय उच्चता के अहंकार से पूरित ब्राह्मणवादी व्यवस्था अंधभक्त समर्थक तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था संरक्षक राष्ट्रवादी बना रहा है। जिसके दो मूल मकसद है-हिन्दुओं को ब्राह्मणी व्यवस्था के अनुसार जातियों में विभाजित करके ब्राह्मण श्रेष्ठता को कायम रखना और जातियों में विभाजित हिन्दुओं को एकजुट करने के लिये मुसलमानों का भय पैदा करके, मुसलमानों के प्रति नफरत पैदा करना। यही आरएसएस का असली सांस्कृतिक और धार्मिक राष्ट्रवाद है। जिसकी खिलाफत करना आरएसएस की दृष्टि में देशद्रोह, अमानवीयता और अधार्मिकता है। जिस दिन देश के वंचित वर्ग को यह बात समझ में आ जायेगी, भारत आरएसएस तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था की मानसिक गुलामी से एक झटके में पूरी तरह से मुक्त हो जायेगा। लेकिन इस गुलामी से मुक्ति के लिये ब्राह्मणों को, हिन्दू धर्म को या हिन्दू धर्म के प्रतीकों का गाली देना मूर्खतापूर्ण, आत्मघाती तथा आपराधिक कृत्य है। जिससे हमें हर कीमत पर बचना होगा। हमें अपने मन में ब्राह्मण सहित किसी के भी प्रति दुर्भाव या नफरत की भावना नहीं रखनी है। क्योंकि आज ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में ऐसी विपन्नता विद्यमान है, कि उनको दो जून की रोटी तक नसीब नहीं है। मगर दु:खद पहलु यह है कि विपन्नता का कोढ झेल रहे ये लोग भी ब्राह्मणी व्यवस्था मानसिक गुलाम है।

अवचेतन मन में स्थापित इस मानसिक गुलामी से मुक्ति का एक ही मंत्र है-'भारत का संविधान' जो भारत के सभी लोगों को एक समान मानने तथा समान रूप से इंसाफ प्रदान करने की गारण्टी देता है। यह व्यवस्था आरएसएस को कदापि मंजूर नहीं है। क्योंकि सभी भारतीयों को समान मानते ही ब्राह्मण की जन्मजातीय श्रृेष्ठता और कुलीनता समाप्त हो जाती है। इसी जन्मजातीय श्रृेष्ठता और कुलीनता पर ब्राह्मणी धर्म के विभेदकारी धार्मिक कानून और उनका कथित धर्म टिका हुआ है। इस प्रकार हर आम-ओ-खास को यह तथ्य समझ में आ जाना जरूरी है कि भारत के वंचित वर्गों की असली बीमारी है-ब्राह्मणवाद। जिसे जिन्दा रखने और फैलाने वाला संगठन है-आरएसएस। इस छूत की बीमारी का एक मात्र पक्का इलाज और टीकाकरण है-संविधान का ज्ञान। साथ ही साथ आरएसएस की गुलामी के गीत गाने वाले वंचित वर्ग के प्रतिनिधियों का सार्वजनिक बहिष्कार।

अत: हमें सबसे पहले आरएसएस के इस दुष्चक्र को समझना और नेस्तनाबूद करना होगा। इससे मुक्ति के लिये संविधान तथा संवैधानिक मूल अधिकारों को ठीक से समझना तथा सभी को ठीक से समझाना होगा। मेरा मत है कि जिस दिन हम संविधान के अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 13 के प्रावधानों के विपरीत संचालित कथित धार्मिक एवं परम्परागत मनमाने कानूनों तथा जन्मजातीय विभेद की प्रवर्तक ब्राह्मणवादी असंवैधानिक धार्मिक व्यवस्था को अच्छे से समझ जायेंगे। इसके बाद आरएसएस का कथित धार्मिक और राष्ट्रवादी मायाजाल स्वत: ही नंगा हो जायेगा। हमारा अवचेतन मन स्वत: ही ब्राह्मणवादी गुलामी से मुक्त हो जायेंगे। इस सबके लिये सबसे पहली जरूरत है-वंचित वर्ग की संयुक्त संवैधानिक विचारधारा और समग्रता का संरक्षक संयुक्त नेतृत्व। जो संविधान के मुताबिक काम करे। इस विषय पर वंचित वर्ग के प्रबुद्ध लोगों को सकारात्मक रूप से तथा सतत रूप से सम्पूर्ण देश में एकजुट होकर काम करने की जरूरत है। साथ ही साथ इस बात को भी अच्छे से समझना और याद रखना होगा कि हम किसी के भी दुश्मन नहीं हैं। हम किसी के भी खिलाफ नहीं हैं। क्योंकि-'हमारा मकसद साफ! सभी के साथ इंसाफ!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन-9875066111, 11.11.2017, Jaipur, Rajasthan

Monday, October 23, 2017

बाल विवाह रोकने हैं तो काजी और पुरोहित को पाबन्द किया जाये!

बाल विवाह रोकने हैं तो काजी और पुरोहित को पाबन्द किया जाये!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
बिहार के मुख्यमंत्री ने आदेश दिया है कि बिहार में अगर शादी करनी है तो आपको पहले शपथ पत्र में लिखकर देना होगा कि यह विवाह बाल विवाह नहीं है और इसमें दहेज का कोई लेन-देन नहीं है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत यह शपथ पत्र देना जरूरी होगा। हालांकि शपथ पत्र भरवाने का जिम्मा मैरेज हॉल के प्रबंधकों का होगा। बिना शपथ पत्र भरे मैरिज हॉल की बुकिंग नहीं हो सकती है। उल्लेखनीय है कि बिहार में आज भी 40 प्रतिशत बाल विवाह होते हैं और दहेज हत्या में बिहार का देश में दूसरा स्थान है।

मुख्यमंत्री की पहल नि:संदेह प्रशंसनीय होकर भी नाकाफी है। विचारणीय सवाल यह है कि बाल विवाह करने वाले लोग क्या मैरिज हॉल बुक करने में सक्षम होते हैं? यदि वाकई बिहार के मुख्यमंत्री सहित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी बाल विवाहों को रोकने के लिये संजीदा हैं तो ऐसे फौरी तथा दिखावटी प्रयास करने के बजाय ऐसे व्यावहारिक कानूनी प्रावधान बनाकर लागू करें, जिनसे वाकई वाल विवाह रुक सकें। सरकार को सबसे पहले बाल विवाह के सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों को समझना होगा और उन कारणों का निवारण का वास्तविक निवारण जरूरी है। जिससे कोई भी माता-पिता बाल विवाह करे ही नहीं।


सभी राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार को मेरा एक सुझाव: बिहार के मुख्यमंत्री बाल विवाह के बारे में जो शपथ-पत्र भरवाने की जिम्मेदारी मैरेज हॉल के प्रबंधकों पर डाल रहे हैं, यदि ऐसा ही शपथ-पत्र भरकर उसकी तस्दीक करके विधिवत विवाह सम्पन्न करवाने की जिम्मेदारी विवाह सम्पन्न करवाने वाले पुराहितों और काजियों पर डाली जाये तो अधिक सकारात्मक परिणाम सामने आयेंगे। अत: बाल विवाह रोकने हैं तो काजी और पुरोहित को पाबन्द किया जाये और उल्लंघन करने पर हो कठोर सजा का प्रावधान। अन्यथा चोंचलेबाजी बंद हो।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS)-9875066111, 23.10.2017, Jaipur, Rajasthan.

Sunday, October 22, 2017

जेहनी जहरखुरानी


बस या रेल-यात्रा के दौरान जब कोई अनजान व्यक्ति लुभावनी और मीठी-मीठी बातें करके आत्मीयता दर्शाये और खाने-पीने में बेहोशी या नशे का पदार्थ मिलाकर आपका सब कुछ लूट ले तो इसे 'जहरखुरानी' कहा जाता है। जिसके लिये दोषी व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस द्वारा दण्डात्मक कार्यवाही की जाती है।

इसके विपरीत जब कोई चतुर-चालाक व्यक्ति, राजनेता, ढोंगी संत, कथित समाज उद्धारक और, या इनके अंधभक्त झूठे-सच्चे और मनगढंथ किस्से-कहानियों, लच्छेदार भाषण, लुभावने नारे तथा सम्मोहक जुमलों के जरिये आम सभाओं या कैडर-कैम्पस में भोले-भाले लोगों को कुछ समय के लिये या जीवनभर के लिये दिमांगी तौर पर सम्मोहित या गुमराह करके उनका मत और समर्थन हासिल कर लें तो इसे मैं डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 'जेहनी जहरखुरानी' या दिमांगी बेहोशी का अपराध मानता हूं।

यह जहरखुरानी से भी अधिक गम्भीर अपराध है। मगर इसके लिये कानून में कोई सजा मुकर्रर नहीं है। अत: सबसे पहले इस जेहनी जहरखुरानी से बचें-बचायें। द्वितीय यदि सच बोलने की हिम्मत हो तो और जेहनी जहरखुरानी के अपराधियों को सजा दिलवाने के लिये दण्डात्मक कानूनी प्रावधान बनाने की मांग करें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (BAAS)-9875066111, 22.10.2017, Jaipur, Rajasthan

Monday, September 25, 2017

भारतीय संविधान किसने बनाया-सर्वे के नतीजे

भारतीय संविधान किसने बनाया-सर्वे के नतीजे

भारत एक लोकतांत्रित गणतंत्र है। इस वजह से सरकार और प्रशासन के संचालन में भारत के संविधान का सर्वाधिक महत्व है। सरकार और प्रशासन के सफल संचालन के लिये देश के लोगों को संविधान का ज्ञान होने की उम्मीद की जाती है। इसके बावजूद भारत में आम नागरिकों और उच्च पदस्थ अधिकारियों तक में संविधान का ज्ञान हासिल करने के प्रति कोई विशेष रुझान नहीं देखा जाता है। सोशल मीडिया पर देशभर के लोग सक्रिय हैं। जो संविधान सहित विभिन्न विषयों पर आये दिन अपनी राय प्रकट करते रहते हैं। ऐसे ही सक्रिय लोगों में से मुझ से वाट्सएप पर देश के 22 प्रदेशों और 4 केन्द्र शासित प्रदेशों के 4213 लोग सीधे जुड़े हुए हैं। ब्रॉड कास्टिंग के जरिये इनके मध्य एक सर्वे आयोजित किया गया। सर्वे का विषय था: *सवाल: भारतीय संविधान किसने बनाया?* हमारी ओर से निम्न 8 विकल्प दिये गये। सर्वे में 4213 में से करीब 68.81% (2899) लोगों ने भाग लिया। जिसे अच्छी भागीदारी माना जा सकता है। जिसके परिणाम इस प्रकार रहे:-

1. डॉ. बीआर अम्बेडकर द्वारा। 1134 (39.12%)
2. भारत के लोगों द्वारा। 45 (1.55 %)
3. संविधान सभा द्वारा। 968 (33.39%)
4. बहुसंख्यक भारतीयों द्वारा। 99 (3.41%)
5. तत्कालीन ताकतवर लोगों द्वारा। 365 (12.59%)
6. ब्रिटिशभक्त राजनेताओं द्वारा। 201 (6.93%)
7. उक्त सभी के द्वारा। 27 (0.93%)
8. अन्य:...... 60 (2.06%)

सर्वे में भाग लेने वालों की सामाजिक हिस्सेदारी आंकड़ों में निम्न प्रकार समझी जा सकती है:
मायनोरिटी के करीब 4.21% (122)
ओबीसी के करीब 14% (403)
अजा वर्ग के करीब 39.15% (1135)
अजजा वर्ग के करीब 36.63% (1062)
अनारक्षित वर्ग के करीब 6.11% (177)

सर्वे में भाग लेने वालों की कुछ रोचक और महत्वपूर्ण टिप्पणियां:

1. अनारक्षित वर्ग राजकुमार भार्गव चूरू, राजस्थान लिखते हैं कि ''सर जहाँ तक मैंने राजनीति मे पढा था कि सविधान के निर्माता डॉ. बी आर अम्बेडकर को बताया गया था जीसको बनाने मे 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा था। और एक जगह पढा जिसमें बताया गया कि संविधान का निर्माण एक संबिधान सभा ने किया है। संविधान सभा में 299 लोग थे। इन सब लोगों ने मिलकर संबिधान बनाया था। संबिधान सभा के कानूनी सलाहकार B. N. Rao थे। Rao ने ही संबिधान का पहला प्रारूप बनाया था। इस प्रारूप की जांच के लिए एक प्रारूप समिति बनाई गई थी। इस समिति में 8 लोग थे। जिसमें सिर्फ 1 सदस्य आंबेडकर था। जिसे प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया और इसी को संबिधान निर्माता कहते हैं। आंबेडकर को संबिधान सभा में बंगाल से चुना गया था। संबिधान सभा के अध्य्क्ष राजेंद्र प्रसाद थे। लेकिन जनरल केटेगरी का होने के कारण इनका नाम नहीं लिया जाता है। संबिधान सभा के बहस में नेहरू जी और पटेल जी का अहम योगदान था। लेकिन इन दोनों का नाम भी हटा दिया गया। डॉ. राधाकृष्णन सभा के प्रथम प्रवक्ता थे। लेकिन जनरल होने के कारण इनका नाम भी हटा दिया गया।''
2. अजजा वर्ग के कृष्णा मीणा, चाकसू जयपुर राजस्थान लिखते हैं कि ''जहाँ तक मैने पढा है तो यह ब्रिटिश राज में तैयार किया गया अधिनियम था जो उन्होने अपने फायदे के लिए बनाया था पर जब भारत आजाद हुआ तो भारतीय नेताओ ने उसमें कुछ परिवर्तन करके उसे अपना लिया जिसमें हम देख सकते हैं कि आज भी आम आदमी से ज्यादा पैसे वालो का बोलबाला है।''
3. अजजा वर्ग वीसाराम मीणा जालोर, राजस्थान लिखते हैं कि ''मेरे हिसाब से तो सारे तत्व शामिल होंगे. मेरे जहन मे एक प्रशन लगातार आ रहा है कि क्या अंबेडकर नहीं होते तो भारत का संविधान बनता और बनता कैसा बनता. दुनिया भर मे संविधान बने हुए और सारे देशो के संविधान उनके लोगो के कल्याण हेतु बनाए गए है. आपके भारत के संविधान यानि अंबेडकर संविधान कमजोर वर्ग या आपके अनुसार मोस्ट वर्ग को ताकत मिली है या उल्टा जातिवाद का जहर बढता जा रहा है? आपके अनुसार अंबेडकर के संविधान ने मोस्ट वर्ग को ताकत दी है या जातिवाद का जहर बढाया है?''
4. अजजा वर्ग की अनिता सोलंकी, सेंधवा, मध्य प्रदेश लिखती हैं कि ''डॉ बी आर अम्बेडकर द्वारा लेकिन उनके साथ मेंएक नाम हम भूल जाते है जो सिर्फ आदिवासी नाम देकर गये जयपालसिंग मुंडा जिन्होंने आदिवासीयो के लिए संविधानिक लडाई लडे.''
5. अजा वर्ग के कल्पेश आर सोलंकी भरूंच गुजरात लिखते हैं कि ''हम तो समाज में आम्बेडकर वाद लाना चाहते है इस लिये में तो बाबा साहब ही कहुगा''
6. अजा वर्ग की राजेश शाक्य कोटा राजस्थान लिखती हैं कि ''यह सवाल क्यो? डा. भीम राव अम्बेडकर जी ने ही लिखा है.''
7. मॉयनोरिटी वर्ग के सरदार गुरमीत सिंह अम्बाला हरियाणा लिखते हैं कि ''भारतीय संविधान का मूल पाठ अंग्रेजों दुवारा ही निर्मित है, जिसमे कुछ भारतीय सन्दर्भ में पैबन्द लगाए गए है, देश की सबसे बड़ी ताकत न्याय प्रणाली है,जो आई पी सी से चलती है जो अंग्रेजो ने भारतीयों को गुलामी में जकड़ने के लिए 1861 में बनाई थी जो आजाद भारत मे ज्यों की त्यों लागू है,ये ही आई पी सी पाकिस्तान में भी लागू है,किसी कनसीपरेन्सी के तहत ही यह चलन में है।''
8. अजा वर्ग के उत्तम कुमार गौतम, लखनऊ, उत्तर प्रदेश लिखते हैं कि ''संविधान सभा में कुल 7 सदस्य थे, सभी निकम्मे, मूर्ख, बीमार और विदेश घूमने वाले थे. 7तो सदसयो ने कुछ नहीं किया. अकेले बाबा साहब ने संविधान सारा बनाया. संविधान बनाने पर सवाल उठाने वाले बाबा साहब के और बाबा साहब के संविधान के दुश्मन हैं. संविधान बुद्धमय भारत बनाने का सूत्र है. भारत एक दिन बुद्धिस्तान बनेगा.''
9. ओबीसी के प्रेम प्रकाश भाटी, धार मध्य प्रदेश से लिखते है कि ''संविधान तो संविधान सभा ने बनाया था. वोट के लिये अम्बेड़कर को निर्माता बना दिया. सूचना अधिकार कानून के तहत पूछा जा सकता है कि संविधान निर्माता कौन है। संविधान को बनाने में संविधान सभा के सदसय रहे देश के विद्वानों का योगदान है। अकेल अम्बेड़कर को श्रेय देना संविधानसभा का अपमान है।''
10. अनारक्षित वर्ग के अरुण मिश्रा पटना, बिहार से लिखते हैं कि ''संविधान अंग्रेजी अधिनियमों की नकल के साथ दूसरे देशों के संविधानों की नकल है। खुद अम्बेडकर ने भारत के संविधान को दुनिया का सबसे घटिया संविधान बताया है। यही वजह है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है। दलित, आदिवासी अभी भी सत्ता से कोसों दूर हैं। कुछ परिवार रिजर्वेशन का फायदा उठा रहे हैं। संघ की चंडान चौकड़ी संविधान की धज्जियां उड़ा रही है। लेकिन संविधान कुछ नहीं कर सकता। ऐसा संविधान किस काम का?''
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 9875066111, 25092017

Monday, September 11, 2017

थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में बाधक

थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में बाधक



1. हम सब को अभिव्यक्ति की आजादी है, लेकिन जमीनी सच्चाई को नकारना मेरी दृष्टि में बुद्धिमता नहीं। यद्यपि विचारणीय तथ्य यह है कि केवल और *केवल डिग्रीधारी या उच्च पद दिलाने वाली शिक्षा के अहंकार से संचालित लोगों की शैक्षिक ईगो (अहंकार) जीवन और समाज को दिशा देने के मामले में खतरनाक सिद्ध हो सकती है। बल्कि खतरनाक सिद्ध हो ही रही है।* मानव व्यवहार शास्त्र और मानव मनोविज्ञान का ज्ञान रखने वाले विश्वस्तरीय विद्वान्/मनीषी इस बात को जानते और मानते हैं कि *दुनिया केवल कानून, तर्क और तथ्यों से न कभी चली है और न कभी चल सकती। जीवन मानव के अवचेतन मन के गहरे तल पर हजारों सालों से स्थापित अच्छे-बुरे संस्कार, ज्ञान, अवधारणाओं, परम्पराओं और अनचाही आदतों से संचालित होता है।*

2. भारत के मोस्ट वर्ग में एक छोटा सा, बल्कि *मुठ्ठीभर लोगों का ऐसा समुदाय है, जो धर्म, अध्यात्म आदि को सीधे-सीधे ढोंग तथा अवैज्ञानिक करार देता है। ऐसे लोगों के समर्थन में भारत की एक फीसदी आबादी भी नहीं है।* जबकि यह वैज्ञानिक सत्य है कि अध्यात्म, प्रार्थना और मैडीटेशन का अवचेतन मन की शक्ति से सीधा जुड़ाव है। जिसे जाने और समझे बिना *अधिकतर आम आस्तिक लोग परमेश्वर, दैवीय शक्ति या अपने आराध्य की प्रार्थना करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से उनको, उनकी प्रार्थनाओं के परिणाम भी मिलते हैं। जिसे मनोवैज्ञानिकों ने संसार के अनेक देशों, धर्मों और नस्लों के लोगों में बार-बार सत्य पाया है। यह अलग बात है कि प्रार्थनाओं से मिलने वाले परिणाम दैवीय शक्ति या आराध्य के ही कारण ही मिलते हैं, इसका आज तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन जिन आस्तिक लोगों को परिणाम मिलते हैं। उनकी आस्था को झुठलाना वैज्ञानिक रूप से इतना सरल नहीं है, जितना कि कुछ कथित कट्टरपंथी नास्तिक समझते हैं।*

3. कड़वा सच तो यह है कि *खुद को नास्तिक कहने और बोलने वाले सबसे बड़े/कट्टर आस्तिक होते हैं। इस विषय में, मेरी ओर से 23 अक्टूबर, 2016 को ''नास्तिकता और आस्तिकता दोनों ही मनोवैज्ञानिक और मानव व्यवहारशास्त्र से जुड़ी अवधारणाएं हैं'' शीर्षक से एक आलेख लिखा था। जिसमें मूलत: स्पष्ट किया गया था कि-
  • (1) मैं अनेक बार चाहकर भी अनेक (नास्तिकता और आस्तिकता से जुड़े) विषयों पर इस कारण से नहीं लिखता, क्योंकि अधिकांश लोग अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त हुए बिना किसी बात को महामानव बुद्ध की दृष्टि से समझने को सहमत ही नहीं होते हैं। ऐसे लोगों के पास अपना खुद का कोई चिन्तन, शोधन या परिष्कार नहीं होता है, बल्कि तोतारटन्त ज्ञान को अन्तिम ज्ञान मानकर विचार व्यक्त करते रहते हैं।
  • (2) नास्तिक और आस्तिक दोनों शब्द भी इसी कारण से समझने में दिक्कत पैदा करते हैं। हमारे यहां पर अधिसंख्य लोग और विशेषकर वे लोग जिनको मनुवादी कारणों से अस्पृश्यता और विभेद का दंश झेलना पड़ा है या झेल रहे हैं, जिनमें मैं भी एक हूं, उन में से अधिकाँश को हर एक बात धार्मिक चश्मे से ही दिखाई देती है।
  • (3) जबकि नास्तिकता और आस्तिकता दोनों ही मनोवैज्ञानिक और मानव व्यवहारशास्त्र से जुड़ी अवधारणाएं हैं, लेकिन मनुवाद विरोधी धर्म के चश्मे से देखने की उनकी आदत निष्पक्षता को छीन चुकी है।
  • (4) उदाहरण: एक भगवान को नहीं मानने वाला भारतीय व्यक्ति बेशक अपने आप को नास्तिक कहता रहे, लेकिन बीमार होने पर वह अपना उपचार उसी चिकित्सा पद्धति और उसी डॉक्टर से करवाता है। जिसके प्रति उसके मन में अनुराग, आस्था अर्थात् आस्तिकता होती है। इसी प्रकार रिश्तों, जाति, रंग, पूंजीवाद, समाजवाद या साम्यवाद आदि के प्रति अनुराग या आस्था होना भी मनोव्यवहारीय (मनोवैज्ञानिक) दृष्टिकोण से आस्तिकता का वैज्ञानिक प्रमाण है। मुझे पता है कि मनुवाद विरोधी चश्में से इन अवधारणाओं पर चिन्तन असम्भव है। अत: अनेक लोग कुतर्क और बहस कर सकते हैं, जबकि यह गहन चिन्तन और चर्चा का विषय है।
12 जुलाई, 2017 को लिखे लेख में मैंने आगे लिखा था कि-

4. जानने और समझने वाली बात यह है कि *इस संसार में ऐसी बहुत सी अज्ञात शक्तियां और ज्ञान की शाखाएं हैं, जिनके बारे में जाने बिना, उन विषयों पर (अन्तिम) निर्णय सुनाने वाले वास्तव में सबसे बड़े अमानवीय और अन्यायी हैं। वंचित/मोस्ट वर्ग में एक समुदाय ऐसे अन्यायी और नास्तिक लोगों की कट्टरपंथी फौज तैयार कर रहा है। जिसकी प्रतिक्रिया में वंचित वर्ग के एक तबके पर लगातार अत्याचार, व्यभिचार और अन्याय बढ़ते जा रहे हैं। जिसकी कीमत सम्पूर्ण मोस्ट वर्ग को चुकानी पड़ रही है। इस विषय में भी, मैं अनेक बार विस्तार से लिख चुका हूँ। फिर भी ऐसे लोगों की पूर्वाग्रही धारणाएं शिथिल नहीं हो रही हैं। जो मोस्ट वर्ग की एकता के लिये सबसे खतरनाक तथा भयावह स्थिति है।*

5. जिन लोगों को अवचेतन मन की शक्ति, मैडिटेशन (ध्यान की निश्छल नीरवता) और लॉ ऑफ़ अट्रेक्शन का प्राथमिक ज्ञान भी रहा होता है, उनके द्वारा कभी भी धर्म, आध्यात्म और आस्तिकता का विरोध नहीं किया जा सकता। लेकिन *कट्टरपंथियों द्वारा ब्रेन वाश किया हुआ पूर्वाग्रही विचारों से ओतप्रोत तथा शाब्दिक ज्ञान की धारा पर तरंगित मन-अवचेतन मन की शक्ति, आकर्षण, न्याय, युक्तियुक्तता, ऋजु इत्यादि अवधारणाओं को न तो जान सकता है और न ही उसे दूसरों की आस्थाओं, विश्वासों, संवेदनाओं तथा सिद्धांतों की परवाह होती है।

6. वजह साफ है, क्योंकि ऐसे ब्रेन वाश किये हुए कट्टरपंथी लोगों और आतंकवादियों के मानसिक स्तर में कोई अंतर नहीं होता। बल्कि दोनों में मौलिक समानता होती है। वजह वैचारिक रूप से दोनों ही कट्टरपंथी होते हैं। कट्टरपंथियों और आतंकियों के अवचेतन मन में मौलिक रूप से एक बात बिठायी जाती है- *मैं जो जानता हूँ, जो करता हूँ, जो बोलता हूँ, वही सच है। अतः इस सच को सारी दुनिया को जानना और मानना चाहिए। जो नहीं मानते वे मूर्ख, गद्दार, देशद्रोही और असामाजिक हैं। अतः ऐसे लोगों को बहिष्कृत किया जाए या तुरंत रास्ते से हटा दिया जाए। दुष्परिणाम हर दिन हत्याएं और बलात्कार हो रहे हैं!*

7. भारत 1947 में आजाद हुआ। भारत में 1950 से लोकतंत्र की गणतंत्रीय व्यवस्था का संचालक संविधान लागू हुआ। इसके बावजूद भी सामाजिक न्याय से वंचित लोगों को संविधान के प्रावधानों के होते हुए न्याय नहीं मिल रहा है। अन्याय और अत्याचार यथावत जारी रहे हैं। वंचित-मोस्ट वर्ग संख्यात्मक दृष्टि से बहुसंख्यक एवं सशक्त होते हुए भी सात दशक बाद भी बिखरा हुआ है और हर मुकाम पर अपमानित तथा शोषित होने को विवश है। *जिसका मूल कारण है-आपसी एकता का अभाव है। मोस्ट वर्ग की एकता में बाधक वही लोग हैं, जिनके हाथ में मोस्ट वर्ग की लगाम रही है। उनको इतनी समझ तक नहीं कि लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करके, उनका स्नेह, अपनापन, सम्मान, मत और समर्थन हासिल नहीं किया जा सकता।*

8. ऐसे लोग इस देश की सत्ता को किसी न किसी बहाने अपने कब्जे में लेने के सपने तो देखते रहते हैं, लेकिन मतदाता के मनोभाव को नहीं समझना चाहते। अत: इनके सपने पूरे होना कभी भी सम्भव नहीं है। जो कोई भी व्यक्ति आम लोगों की सुन नहीं सकता, वह कभी भी अच्छा वक्ता नहीं बन सकता। क्योंकि वक्ता होने के लिए श्रोताओं की जरूरत होती है और श्रोता उसी को सुनते हैं, जो उनकी आस्थाओं, विश्वासों, भावनाओं, आकांक्षाओं, इच्छाओं और जरूरतों का आदर करता हो। *क्या कोई नास्तिक कभी भारत में 99 फीसदी से अधिक आस्तिक मोस्ट वर्ग के लोगों की भावनाओं को धुत्कार कर, उनका चहेता बन सकता है? मेरी राय में कभी नहीं।*

9. याद रहे-*पाखण्ड और आस्थाओं में अंतर होता है। कोई भी व्यक्ति एक बार पाखण्ड को छोड़ने या त्यागने को सहमत किया भी जा सकता है, लेकिन वही व्यक्ति यकायक अपनी आस्थाओं और विश्वासों को नहीं त्याग सकता।* हमें इस बात को स्वीकारना होगा कि परिवर्तन सतत प्रक्रिया है। जिसमें समय लगता है। पीढियां गुजर जाती हैं। तब कहीं थोड़े-बहुत बदलाव दिखने लगते हैं। इस बात को जाने बिना कुछ लोग डंडे के बल पर लोगों को बदलना चाहते हैं। ऐसे लोग मोस्ट वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं। *दुःखद स्थिति यह कि मोस्ट की कमान ऐसे ही लोगों के ही हाथों में है। इससे भी दुःखद यह कि इन लोगों में भी अधिकाँश लोग ढोंगी हैं।*

उपरोक्त लेख का देश के अधिसंख्य अपूर्वाग्रही विद्वानों ने समर्थन किया जो लेख की मूल भावना तथा लेखक का सम्मान है। इसी विषय में मुझे आगे यह और कहना है कि-

10. नास्तिकता और आस्तिकता जैसे विषयों पर सोशल मीडिया पर या वाट्सएप पर चैटिंग के मार्फ़त वांछित परिणाम मिलना तो संदिग्ध है ही, साथ ही साथ, इस कारण नजदीकी लोगों में आपसी दूरियाँ भी बढ़ रही हैं। अतः नास्तिकता समर्थक विद्वानों को कम से कम वंचित/मोस्ट वर्ग के विद्वानों को इस विषय पर समसामयिक हालातों के अनुसार समग्र समाज के हित और अहित को ध्यान में रखकर चिंतन करना होगा। अन्यथा बाद में पछतावे के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।

11. मैं निजी तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 21 एवं 25 के प्रकाश में धार्मिक मामलों को भारत के लोगों का निजी विषय मानकर, इन पर किसी के भी द्वारा, किसी पर भी अपने नास्तिकता के विचार थोपने या आस्तिकता का मजाक उड़ाने या नास्तिकता को स्थापित करने के लिये आस्तिकों को अपमानित करने के समर्थन में नहीं हूँ। हाँ पाखण्ड, ढोंग, अंधविश्वास आदि का आमजन के धार्मिक विश्वास और उस विश्वास के दैनिक जीवन में पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभावों का निष्पक्ष अध्ययन करने के बाद, इन पर अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ काम करने की जरूरत है। जिससे कि लोगों की भावनाओं को आहत किये बिना, उनको स्वेच्छा से इन्हें छोड़ने के लिए सहमत किया जा सके।

12. निःसन्देह धर्मांधता वंचित वर्गों के समग्र विकास में बाधक है, लेकिन थोपी हुई नास्तिकता वंचित वर्गों की एकजुटता में सबसे बड़ी बाधा है! नास्तिकता का आरोपण करोड़ों लोगों के जीवन जीने के आधार धर्म, आस्था तथा विश्वास को कुचलने के समान है। हम जिन वंचित लोगों को आगे बढाने के लिये काम करना चाहते हैं। हम जिन वंचित लोगों के समर्थन से राजनीतिक सत्ता पाना चाहते हैं। यदि वही लोग असहज या नाखुश अनुभव करके, हम से दूर जाने लगें तो ऐसी नास्तिकता किस काम की? समझने वाली महत्वूपर्ण बात यह है कि जैसे-जैसे लोगों को सत्य के ज्ञान के साथ-साथ, सत्य का अनुभव भी होगा, स्वत: ही बदलाव की बयार बहने लगेगी।

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 9875066111, 11092017

Sunday, September 10, 2017

14 फर्जी बाबाओं की सूची की आधिकारिकता पर सवाल?

14 फर्जी बाबाओं की सूची की आधिकारिकता पर सवाल?

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने आज 10 सितम्बर, 2017 को संगमनगरी इलाहाबाद में विशेष बैठक करके 14 फर्जी बाबाओं की सूची जारी की है। इलाहाबाद के बाघंबरी मठ में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की विशेष बैठक में 13 अखाड़ा के 26 संत शामिल हुए। इस बैठक में 14 फर्जी बाबाओं के सामूहिक बहिष्कार का भी फैसला किया गया। बैठक के बाद परिषद अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि का कहना है कि फर्जी धर्मगुरुओं से सनातन धर्म के स्वरूप को काफी नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा सोशल मीडिया में संतों व प्रमुख नेताओं के खिलाफ हो रहे गलत शब्दों के प्रयोग पर भी नाराजगी व्यक्त कर प्रशासन से अंकुश लगाने की मांग की गयी है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की ओर से जारी बयान के अनुसार फर्जी बाबा की सूची इस प्रकार है:—

1- आसाराम बापू उर्फ आशुमल शिरमलानी
2- सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां
3- सच्चिदानंद गिरि उर्फ सचिन दत्ता
4- गुरमीत सिंह राम रहीम सच्चा डेरा, सिरसा।
5- ओम बाबा उर्फ विवेकानंद झा।
6- निर्मल बाबा उर्फ निर्मलप्रीत सिंह।
7- इच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी।
8- स्वामी असीमानंद।
9- ऊं नम: शिवाय।
10- नारायण साईं।
11 राम पाल।
12- आचार्य कुशमुनि
13- बृहस्पति गिरि
14- मलखान गिरि।

उपरोक्त बयान जारी किये जाने पर कुछ सवाल जो आमजन के मन में उठ सकते हैं और उठने भी चाहिये:—

1. बेशक अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का सनातन धर्म से वास्ता है, लेकिन भारत में कथित रूप से इन्हीं सनातन धर्मियों का बाहुल्य बताया जाता है। अत: बयान जारी करने में इनको इतना लम्बा समय क्यों लगा?
2. केवल 14 फर्जी बाबाओं को फर्जी बताने की सूची जारी की गयी है। इसका अभिप्राय क्या यह नहीं है कि इनके अलावा क्या शेष सभी बाबा असली हैं? आगे चलकर 14 की सूची में शामिल फर्जी बाबाओं के अलावा यदि किसी सनातनधर्मी बाबा ने अशोभनीय कुकृत्य किया तो क्या उसके लिये अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद जिम्मेदार होगी?
देश के आम लोगों के उपरोक्त और बहुत सारे संदेहों को दूर करने के लिये अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को देशभर में स्थिति साफ करनी चाहिये? साथ में देश और दुनिया को यह भी बताया जाना चाहिये कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को इस प्रकार के प्रमाण-पत्र जारी करने की आधिकारिकता कहां से मिली?
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल
(HRD Mission-90 For MOST) 9875066111, 10092017