Monday, August 14, 2017

कौन जिन्दाबाद और कौन मुर्दाबाद?

कौन जिन्दाबाद और कौन मुर्दाबाद?
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
15 अगस्त, 1947 को भारत अन्तिम बार अंग्रेजी सत्ता से आजाद हुआ था। अन्तिम बार इसलिये लिखा, क्योंकि भारत की जनता हजारों बार आजाद और गुलाम होती रही है। अबोध तथा मासूम बच्चों से इस दिन जिन्दाबाद के नारे लगवाये जाते हैं, लेकिन विद्यालयों में मुर्दाबाद के नारे लगवाने की परम्परा विकसित ही नहीं होने दी गयी!। आखिर क्यों? जबकि अभिव्यक्ति के अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार के तहत हर व्यक्ति को यह जानने का हक तो होना ही चाहिये कि झूठ और सच क्या है?
1. जातीय तथा साम्प्रदायिक हिंसा, फासिस्टवाद, मनुवाद तथा जन्मजातीय विभेद की पाठशाला संचालित करने वाले, लेकिन राष्ट्रभक्ति का लाईसेंस बांटने वाले संघ, संघ के विद्यार्थी गोडसे तथा गोडसे के वंशजों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
2. हजारों सालों से शोषित और प्रताड़ित अछूतों को अंग्रेजी सत्ता से मिले दो वोट तथा पृथक निर्वाचन के हक को छीनने वाले, लेकिन अहिंसा के पुजारी कहलवाने वाले एमके गांधी को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
3. अंग्रेजों की गुलामी करके आजादी के परवानों के खिलाफ गवाही देने वालों द्वारा वर्तमान में राष्ट्रभक्ति के लाईसेंस बांटने की राजनीति को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
4. सामाजिक न्याय के नाम पर वंचितों को गुमराह करके उच्च जातीय आर्यों को संविधान के विरुद्ध आरक्षण की मांग करने वालों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
5. गौ-रक्षा के नाम पर अछूतों तथा मुसलमानों का कत्लेआम करने और इन कत्लेआम पर मगरमच्छी आंसु बहाने वाले प्रधान सेवक को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
6. जातिवाद तथा अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष करने वाले, लेकिन संविधान से आदिवासी का नामोनिशान मिटाने वाले डॉ. बीआर अम्बेड़कर को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
7. अजा एवं अजजा के नाम पर संगठन बनाकर संगठनों के नीति-नियन्तों पदों से अजजा को 70 साल से वंचित रखने वाले अजा नेतृत्व को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
8. अजा एवं अजजा के लिये आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित होकर भी अजा एवं अजजा के मुद्दों पर मौन रहने वाले सांसदों और विधायकों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
9. आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी हासिल करने वाले लोक सेवकों के दारू, धन/दहेज (भ्रष्टाचार) और धर्मान्धता को बढावा देने वाले कार्यों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
10. नारियों की पूजा करने की खोखली गाथाओं का बखान करके, लैंगिक विभेद को जिन्दा रखने वाले तथा कन्याभ्रूण हत्यारों को संरक्षण देने वालों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
11. मुसलमानों के विरुद्ध घृणा फैलाने के लिये गुलाबी क्रान्ति (गोमांस) का विरोध करके, सत्ता हासिल करके गोमांस निर्यात को बढावा देने वालों को क्या बोलें जिन्दाबाद या मुर्दाबाद?
नोट: विद्वजन इस लिस्ट को बढा सकते हैं!
जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/15.08.2017

Wednesday, August 9, 2017

‘हम आदिवासियों के साथ हैं'-संयुक्त राष्ट्र संघ! ‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं'-भारत सरकार!! 'आदिवासी नहीं, मूलनिवासी दिवस'-आर्यवंशी शूद्र!!!

*‘हम आदिवासियों के साथ हैं'-संयुक्त राष्ट्र संघ*
*‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं'-भारत सरकार!! *
*'आदिवासी नहीं, मूलनिवासी दिवस'-आर्यवंशी शूद्र!*


*डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’*
9 अगस्त को विश्‍व आदिवासी दिवस है। कितने आदिवासी जानते हैं कि यह दिन कब से और क्यों मनाया जाता है? विश्‍व आदिवासी दिवस के प्रति सरकार और खुद आदिवासियों के क्या दायित्व है? आदिवासियों के निर्वाचित जन प्रतिनिधि और आदिवासी कोटे में नियुक्त लोक सेवक विश्‍व आदिवासी दिवस के मकसद को पूरा करने के लिये अपने आदिवासियों के प्रति कितने संवेदनशील, समर्पित और निष्ठावान हैं?




*विश्‍व आदिवासी दिवस का संक्षिप्त इतिहास:*

द वर्डस इंडीजिनियश The world's Indigenous अर्थात् विश्व के इंडीजिनियश पीपुल अर्थात् विश्‍व के आदिवासियों के हकों और मानव अधिकारों को विश्‍वभर में क्रियान्वित करने और उनके संरक्षण के लिए अब से 35 वर्ष पूर्व अर्थात् वर्ष-1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) द्वारा एक UNWGEP नामक कार्यदल उप आयोग का गठन किया गया। जिसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को सम्पन्न हुई थी।

उक्त कार्यदल ने आदिवासियों की समस्याओं के निराकरण हेतु विश्‍व के तमाम देशों के ध्यानाकर्षण के लिए सबसे पहले विश्‍व पृथ्वी दिवस 3 जून 1992 के अवसर पर होने वाले सम्मेलन के एजेंडे में 'रिओ-डी-जनेरो (ब्राजील) सम्मेलन में विश्‍व के आदिवासियों की स्थिति की समीक्षा और चर्चा का एक प्रस्ताव पारित किया गया। ऐसा विश्‍व में पहली बार हुआ जब कि आदिवासियों के हालातों के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर प्रस्ताव पारित किया गया।

संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अपने गठन के 50वें वर्ष में यह महसूस किया कि 21वीं सदी में भी विश्‍व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासी लोग अपनी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, बेरोजगारी एवं बन्धुआ तथा बाल मजदूरी जैसी समस्याओं से ग्रसित हैं। अतः 1993 में UNWGEP कार्यदल के 11वें अधिवेशन में आदिवासी अधिकार घोषणा प्रारूप को मान्यता मिलने पर 1993 को पहली बार विश्‍व आदिवासी वर्ष एवं आगे हमेशा के लिये 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया गया।

आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास आदि के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 में जेनेवा शहर में विश्‍व के आदिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्‍व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया।

9 अगस्त, 1994 को विश्‍वभर के आदिवासियों की संस्कृति, भाषा, मूलभूत हक को सभी ने एक मत से स्वीकार किया और आदिवासियों के सभी हक बरकरार हैं, इस बात की पुष्टि कर दी गई। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने यह कहकर आदिवासियों को वचन दिया कि-‘हम आपके साथ है|’

संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) की जनरल असेम्बली (महासभा) ने व्यापक चर्चा के बाद 21 दिसम्बर, 1993 से 20 दिसम्बर, 2004 तक आदिवासी दशक और 9 अगस्त को International Day of the world's Indigenous people (विश्‍व आदिवासी दिवस) मनाने का फैसला लेकर विश्‍व के सभी सदस्य देशों को विश्‍व आदिवासी दिवस मनाने के निर्देश दिये।

इसके बाद विश्‍व के सभी देशों में इस दिवस को मनाया जाने लगा, पर अफसोस भारत की आर्यों के वर्चस्व वाली मनुवादी सरकारों ने आदिवासियों के साथ निर्ममतापूर्वक धोखा किया। आदिवासियों को न तो इस बारे में कुछ बताया गया और ना ही भारत में आधिकारिक रूप से विश्‍व आदिवासी दिवस मनाया गया। आदिवासियों के हालातों में कोई सुधार नहीं होने पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 16.12.2005 से 15.12.2014 को दूसरी बार फिर से आदिवासी दशक घोषित किया गया।

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर यह लिखते हुए गहरा दुख और अफसोस होता है कि *विधायिका में आदिवासियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और लोक सेवाओं में चयनित प्रशासनिक प्रतिनिधियों के होते हुए भारत की सभी सरकारें आदिवासियों के प्रति संयुक्त राष्ट्र संघ के स्पष्ट प्रस्ताव के बावजूद भी आज तक हृदयहीन, धोखेबाज और निष्ठुर बनी रही हैं। आखिर ऐसा क्यों? प्रत्येक आदिवासी को इस सवाल का जवाब जानना होगा।* लेकिन यह जानकर पाठकों को घोर आश्चर्य होगा कि 23 साल पहले जब प्रथम आदिवासी दिवस सम्मेलन 1994 में जेनेवा में यूएनओ द्वारा आयोजित हुआ। जिसमें विश्‍व के सभी सदस्य देशों से प्रतिनिधि बुलाये गये थे। भारत सरकार की तरफ से तत्कालीन केन्द्रीय राज्य मंत्री के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने जिनेवा सम्मेलन में भाग लिया था।

इस सम्मेलन में भारत सरकार के प्रतिनिधि द्वारा सँयुक्त राष्ट्र संघ को अवगत कराया था कि *‘संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिभाषित आदिवासी लोग भारत में हैं ही नहीं।’* बल्कि इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र संघ को यह बताया गया कि *‘भारत के सभी लोग भारत के आदिवासी हैं और भारत की जन जातियां किसी प्रकार के सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक पक्षपात या भेदभाव की शिकार नहीं हो रहे हैं।'* सोचिये इससे बड़ा सरकारी झूठ और षड़यंत्र क्या हो सकता है? लेकिन दु:खद आदिवासी प्रतिनिधि मौन हैं?

भारत की जो सरकारें संसार के सबसे बड़े मंच पर इतना बड़ा झूठ बोल सकती हैं। उनकी ओर से अपने हकों की मांग करने वाले आदिवासियों को नक्सलवादी घोषित करना कौनसी बड़ी बात है? ऐसी सरकारें आदिवासियों को समाप्त करने के लिये कुछ भी कर सकती हैं। *'भारत में आदिवासी हैं ही नहीं और भारत के सभी लोग आदिवासी हैं।'* यह झूठ क्यों बोला गया? इसके पीछे सरकार की गहरी साजिश है! जिसका उत्तर जानने के लिये प्रत्येक आदिवासी को भारत की व्यवस्था पर काबिज बकवास वर्ग के षड़यंत्रों को तो समझना ही होगा।

इसके साथ-साथ दो बातें वर्तमान में विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। *भारत के आदिवासी को नेस्तनाबूद करने के लिये वर्तमान में आर्यों के चारों वर्ण सक्रिय हैं! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की श्रेृष्ठता कायम रखने के लिये संचालित आरएसएस भारत का इतिहास नये सिरे से लिखवाकर यह सिद्ध करने में लगा हुआ है कि आर्य यूरेशिया से भारत आने से पहले भारत के निवासी थे। आर्य भारत से यूरेशिया गये ​थे। वहीं दूसरी ओर आर्य ब्राह्मणों द्वारा उपनयन अर्थात जनेऊ संस्कार बंद करके आर्यों का चौथा शूद्र वर्ण घोषित (लेकिन सम्पूर्ण अनुसूचित जातियां शूद्र नहीं) लोगों के वर्तमान वंशज प्रायोजित डीएनए रिपोर्ट की मनमानी तथा भ्रामक व्याख्या करके आर्यवंशी शूद्रों को मूलनिवासी शब्द की आड़ में भारत के मूल मालिक सिद्ध करने में लगा हुआ है। इस प्रकार आर्यों के चारों वर्ण आदिवासी अस्तित्व को नेस्तनाबूद करके अपने आप को भारत के मूलनिवासी घोषित करने के षड़यंत्र में अन्दरखाने संलिप्त और सहभागी लगते हैं। लेकिन दु:खद आश्चर्य आर्यों के चारों वर्णों में से किसी में इतना साहस नहीं कि वे 'विश्व आदिवासी दिवस' के दिन अपने आप को भारत के आदिवासी कह सकें!* (नोट: 04 अगस्त, 2015 को—— *संयुक्त राष्ट्र संघ ने कहा-‘हम आदिवासियों के साथ हैं|’ भारत सरकार ने कहा-‘भारत में आदिवासी हैं ही नहीं|’* ———शीर्षक से लिखा आलेख आंशिक संपादन के साथ पुन: प्रस्तुत है।)

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/09.08.2017

Friday, July 28, 2017

दीपा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद के मौन के मायने?

दीपा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद के मौन के मायने?
मोस्ट वॉइस: अंक-2 28 जुलाई, 2017
लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

दीपा ईवी बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया प्रकरण में ओबीसी के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रेल, 2017 जो निर्णय सुनाया है, उसका तत्परता से क्रियान्वयन शुरू हो चुका है। जिसके तहत केन्द्र और सभी राज्य सरकारों द्वारा प्रशासनिक आदेश/सर्क्यूलर जारी किये जा चुके हैं/जा रहे हैं।
इस प्रकरण में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस पर लम्बी-चौड़ी चर्चा, बहस और विवेचना की गुंजाइश हो। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में आदेश दिये हैं कि आरक्षित वर्ग के आवेदक/प्रत्याशी द्वारा यदि शुल्क छूट के अलावा किसी भी प्रकार की छूट प्राप्त की गयी है तो वह अनारक्षित बौद्धिक कोटे की मेरिट में नहीं गिना जायेगा, बेशक वह मेरिट में टॉपर ही क्यों न रहा हो? इसका सीधा और साफ अभिप्राय यही है कि यदि आरक्षित वर्ग के आवेदक अनारक्षित मेरिट में प्रवेश, नियुक्ति/चयन चाहते हैं तो उनके पास दो विकल्प हैं:-

पहला: किसी भी चयन के लिये बेशक साथ में जाति प्रमाण पत्र संलग्न करें। लेकिन चयन के प्रारंभिक चरण से ही अनारक्षित आवेदकों के समान पात्रता अर्जित करके आवेदन करें। यद्यपि बहुत ही कम संख्या में ऐसे आवेदक होंगे जो अर्हता और पात्रता में किसी भी प्रकार की छूट प्राप्त किये बिना पहले चरण से आवेदन करने के लिये पात्र हों और यदि पहले चरण तक पात्र हों भी तो चयन के अन्तिम चरण तक किसी भी प्रकार की छूट हासिल करने के लिये विवश नहीं हों। यदि लिखित प्रतियोगिताओं में बिना छूट के अनारक्षित बौद्धिक कोटे में मेरिट हासिल कर भी ली तो अन्त में साक्षात्कार में इतने कम अंक दिये जाते हैं कि उनका अनारक्षित बौद्धिक कोटे से बाहर होना तय है।

दूसरा: उन्हें अनारक्षित आवेदक के रूप में आवेदन करना होगा।

उक्त दोनों स्थितियों में मूल अंतर यह है कि पहली में आवेदक के पास दोनों विकल्प उपलब्ध हैं। जबकि दूसरे विकल्प में आरक्षित वर्ग के आवेदकों को केवल बौद्धिक कोटे में ही मेरिट अर्जित करके चयनित होने का एक मात्र विकल्प है। सामान्यतया आरक्षित वर्ग के आवेदकों से ऐसा रिस्क लेने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

निश्चय ही यह निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु प्रतिपादित उस पवित्र सिद्धान्त के विपरीत है, जिसमें सरकार से साफ शब्दों में यह अपेक्षा की गयी है कि समानता का तात्पर्य आंख बंद करके लोगों के बीच एक जैसा व्यवहार करना कतई भी समानता नहीं है, बल्कि समानता का तात्पर्य जन्मजातीय विभेद का दंश झेलने वाले एक जैसी सामाजिक एवं शैक्षणिक परिस्थितियों और पृष्ठभूमि की जातियों में जन्मने वाले लोगों के बीच एक जैसा व्यवहार करना है। इसी के मूल सिद्धान्त के तहत संविधान में वर्गीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है।

प्रतियोगिताओं में वंचित वर्गों को निर्धारित अर्हताओं में छूट प्रदान करना भी इसी सिद्धान्त में शामिल है। जबकि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस सिद्धान्त का खुला उल्लंघन करने के साथ-साथ, सुप्रीम कोर्ट के अनेक पूर्ववर्ती निर्णयों के भी विपरीत है। जिनमें यह कहा गया है कि-'आरक्षण का बिलकुल भी यह अर्थ नहीं है कि आरक्षित वर्गों को निर्धारित आरक्षण प्रतिशत से अधिक प्रवेश/नियुक्तियां नहीं दी जावें, बल्कि निर्धारित आरक्षण प्रतिशत तो आरक्षित वर्गों का न्यूनतम प्रतिनिधित्व है।'

यहां यह उल्लेखनीय है कि आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों की संकीर्ण व्याख्या के जरिये, आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने का यह सिलसिला 1950 से दोराईराजन के प्रकरण से जारी है। मेरा मानना है कि अब आरक्षण व्यवस्था के प्रावधानों को कमजोर करने के लिये सुप्रीम कोर्ट के पास अधिक कुछ शेष बचा नहीं है। फिर भी आने वाले समय में आरक्षण के सिद्धान्तों की और अधिक संकीर्ण व्याख्या करने वाले निर्णय आ सकते हैं।

उपरोक्त निर्णय के अलावा नीट मामला सबके सामने है। इसके साथ ही साथ यह भी तय हो चुका है कि जिस किसी ने सरकारी सेवा में प्रवेश के लिये कभी भी एक बार यदि आरक्षण का लाभ ले लिया तो ऐसे लोक सेवक को भविष्य में अनारक्षित कोटे का लाभ नहीं मिलेगा। मतलब साफ है कि बैक लोग खाली रहेगा तथा उच्च और नीतिनियन्ता प्रशासनिक पदों पर आरक्षित वर्ग के लोगों को नहीं पहुंचने देने की सम्पूर्ण तैयारी की जा चुकी है। इसीलिये मैंने संविधान की व्याख्या के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश गुलामी की गाथा लिखने वाले श्लोक सिद्ध होंगे। शीर्षक से प्रकाशित लेख में वंचित मोस्ट वर्ग को आगाह किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी अनेक बार संविधान की संकीर्ण व्याख्या करने वाले निर्णय सुनाये थे, जिन्हें तत्कालीन संसद द्वारा संविधान संशोधन के जरिये निष्प्रभावी कर दिया गया था। लेकिन वर्तमान में सभी सांसद, अर्थात संसद मौन है। कारण बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिये। हम सभी जानते हैं कि देश के लोगों ने केन्द्र और अनेक राज्यों में ऐसी विचारधारा की सरकार को बहुमत प्रदान किया है, जो पण्डित दीनदयान उपाध्याय के मानव एकात्ववाद के सिद्धान्त को लागू करने को प्रतिबद्ध है। जो नहीं जानते, उन्हें एक पंक्ति में जान लेना चाहिये कि पण्डित दीनदयान उपाध्याय का एकात्म मानववाद और कुछ नहीं, सीधे शब्दों में मनुवाद ही है। जिसका पूर्व में एम के गांधी ने भी खुलकर समर्थन किया है।

वर्तमान में भाजपा के माध्यम से जिस किसी भी वर्ग के जो भी सांसद और विधायक या अन्य जनप्रतिनिधि हैं या अन्य जो चाहे किसी भी दल में हों या निर्दलीय हो, यदि वे संघ के प्रति निष्ठावान हैं तो उनका सीधा लक्ष्य एकात्म मानववाद के मार्फत भारत में मनुवादी व्यवस्था को लागू करना है। अत: वर्तमान में कार्यपालिका, व्यवस्थापालिका और न्यायपालिका तीनों के मार्फत पण्डित दीनदयान उपाध्याय के एकात्म मानववाद को लागू किया जा रहा है। जिसको प्रेसपालिका अर्थात मीडिया का भी खुलकर समर्थन मिल रहा है।

दीपा प्रकरण में परोक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 50.50 फीसदी बौद्धिक कोटे को आरक्षित वर्ग के टॉपर्स से मुक्त रखते हुए, अनारक्षित वर्ग के लिये आरक्षित करने के समान है। जिसका स्थायी, संवैधानिक और न्यायसंगत समाधान यही है कि जाति आधारित जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक किये जावें। आरक्षित वंचित वर्ग की जातियों की वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का न्यूनतम कोटा निर्धारित किया जावे। यह सब करने का संवैधानिक अधिकार संसद के पास है, लेकिन संसद मौन है।

आरक्षित वंचित मोस्ट वर्ग के जो भी लोग, संगठन या राजनैतिक दल वंचित वर्ग के प्रतिनिधि या हितैषी होने की बात करते या कहते हैं, उनका लक्ष्य वंचित वर्ग को गुमराह करके येन-केन-प्रकारेण, कैसे भी सत्ता प्राप्ति रसमलाई का रसास्वादन करना रहा है। अत: उनसे किसी प्रकार की उम्मीद करना वंचित वर्ग को खुद को धोखा देने के समान है।

अत: अन्तिम बात वंचित मोस्ट वर्ग को संयुक्त विचार और संयुक्त नेतृत्व के सिद्धान्त को स्वीकार करना होगा। संयुक्त नेतृत्व में देशव्यापी आन्दोलन चलाना होगा। जिसके बारे में 'बकवास वर्ग के अत्याचारों के विरुद्ध मोस्ट वंचित वर्ग की रणनीति?' शीर्षक से पूर्व प्रकाशित लेख में प्रकाश डाला जा चुका है।

Note: जो भी कोई अपने वाट्सएप इन बॉक्स में मोस्ट वॉइस तथा मेरे समसामयिक आलेख ब्रॉड कॉस्ट सिस्टम के जरिये प्राप्त करने के इच्छुक हैं, वे मेरे वाट्सएप नम्बर: 9875066111 पर सहमति भेज सकते हैं। उनका परिचय प्राप्त करके उन्हें नियमित सामग्री भेजी जाती रहेगी।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, Mobile & Whatsapp No.: 9875066111, 28.07.2017

Tuesday, July 25, 2017

वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा

वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा
मोस्ट वॉइस : अंकः 1, 25 जुलाई, 2017
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
मैंने अनुभव से सीखा है कि जब आप नेतृत्व कर रहे होते हैं तो आप पर असंख्य लोगों की नजरें होती हैं, जिनमें अनेक निर्मल-हृदयी होते हैं। जिन्हें सिर्फ आपकी अच्छाई और सच्चाई ही दिखती है। ऐसे लोग आपको प्रोत्साहित करते हैं। कुछ तटस्थ और निष्पक्ष लोग होते हैं जो सब कुछ सच-सच कहते, लिखते और बोलते हैं। उनको इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि इससे नेतृत्व को, पढ़ने-सुनने वालों या नेतृत्व के अनुयाईयों या समाज को कैसा लगेगा या क्या प्रभाव होने वाले हैं।
जबकि समाज में कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो सिर्फ नेतृत्व की कमियों, कमजोरियों और जुबान फिसलने को मुद्दा बनाने का इन्तजार करते रहते हैं, ताकि नेतृत्व को दुनिया के सामने कमजोर, मूर्ख और नालायक सिद्ध किया जा सके! जिसके पीछे अनेक बार उनका कोई मकसद नहीं होता। मनोवैज्ञानिक कहते हैं, ऐसा करने में इन लोगों को मजा आता है। उनको आनंद की अनुभूति होती है, क्योंकि उनको इस बात से सन्तुष्टि मिलती है कि उन्होंने कितने बड़े व्यक्ति को निशाना बनाया। कुछ मामलों में ऐसी आलोचना करने के पीछे, आलोचना करने वालों की सस्ती प्रसिद्धि पाने की रुग्ण मनोविकृति भी होती है।
इन सब से अलग एक और भी प्रकार के लोग होते हैं, जो मीठी- मीठी बातें करते हैं। नेतृत्व के प्रति वफादारी दिखाने के लिए कसमें खाते हैं, हर कदम पर साथ निभाने की बातें करते हैं, लेकिन वक्त जरूरत पड़ने पर वे कभी भी सामने नहीं आते। जब भी उनके सहयोग की जरूरत होती है, उनके पास बहुत अच्छे बहाने और अजीब से तर्क होते हैं। ऐसे लोग अकसर अपने ही नेतृत्व की कमजोरियों को नोट करते रहते हैं या नेतृत्व की भलमनसाहत को ही कमजोरी मानकर भितरघात के लिए अवसर की तलाश और इंतजार में रहते हैं।
इस प्रकार के लोग दूसरों के मार्फत अपने आप का गुणगान करवाते हैं। वास्तव में ऐसे लोग अब्बल दर्जे के मूर्ख और कुख्यात धूर्त होते हैं, जो अनुभवी लोगों को खुद से कमजोर मानकर अपना और अपने ही संगठन का अत्यधिक नुकसान कर देते हैं। अनेक भले और अच्छे लोग भी इन धूर्तों के कुचक्र में फंसकर अपना सार्वजनिक जीवन बर्बाद कर चुके होते हैं, जबकि अनेक बार आश्चर्यजनक रूप से ऐसे धूर्त लोग खुद की नजरों में और अनेक भोले लोगों की नजरों में खुद को बचा लेने में कामयाब हो जाते हैं!
इस प्रकार सार्वजनिक जीवन में काम करते वक्त अनेक प्रकार के लोगों के बीच रहकर रास्ता तय करना होता। नेतृत्व की हर पल परीक्षा होती रहती है। ऐसे समय में यह निर्णय करना भी नेतृत्व की सफलता या असफलता हेतु निर्णायक साबित होता है कि किसको कब और क्या जवाब देना है और किसकी बात की अनसुनी करनी है।
ऐसे समय में सहयोगी नेतृत्व, मित्रों और शुभचिंतकों की भी परीक्षा हो ही जाती है। इस माने में नेतृत्व के लिए ऐसा चुनौतीपूर्ण समय अपने लोगों की परीक्षा करने का सुअवसर भी होता है और साथ ही नये शुभचिंतकों के लिए भी ऐसे वक्त ही दरवाजे खुलते हैं। अनेक आस्तीन के सांप भी ऐसे समय में डसने के लिए बिलों से बाहर निकल आते हैं तो वहीं इन साँपों के फनों को कुचलने वाले नये साहसी और सच्चे मित्र तथा शुभ चिंतक भी नेतृत्व के साथ आ खड़े होते हैं।
ऐसे समय में यह भी ज्ञात हो जाता है कि नेतृत्व के पास कैसे और कितने सच्चे और कच्चे दोस्त तथा दुश्मन हैं? कितने सच्चे हितचिंतक और कितने शुभचिंतक हैं? कितने दगाबाज और कितने गद्दार हैं? कितनों का आपके पक्ष या विपक्ष में हृदय परिवर्तन होता है?
इन सब हालातों में आज के असहज और अन्यायपूर्ण चुनौतियों से भरे समाज में किसी भी नेतृत्व को सच्चाई की लड़ाई जीतने या अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल सच्ची बात कहने, सच बोलने या सच का साथ देने से ही काम नहीं चलता है, बल्कि सच्ची लड़ाई को जीतने के लिए कम से कम दो प्रकार के दोस्तों की अत्यधिक जरूरत होती हैः-
1. पहले कृष्ण जैसे सच्चे-सद्भावी मित्र और सारथी साथ होने चाहिए, जो बेशक सामने आकर आपके लिए युद्ध न भी लड़ सकें, लेकिन हर कदम पर आपके सच्चे और विश्वसनीय मार्गदर्शक अवश्य बने रहें।
और
2. दूसरे कर्ण जैसे वीर और निस्वार्थी दोस्त भी जरूर साथ होने चाहिए, जो दुनिया की नजर में तुम्हारे गलत होने की परवाह नहीं करते हुए सिर्फ और सिर्फ अपनी दोस्ती और दोस्ती के फर्ज को निभाने के लिए आगे आकर लड़ें और अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहें।
अंत में एक बात और यह कि कठिन समय में सच्चे मित्र सही और सुगम रास्ता खोजते हैं। हर पल आपका मार्गदर्शन करते हैं, जबकि झूठे और मक्कार लोग आपको भटकाते हैं। बहाने बनाते हैं और आपको गलत सिद्ध करने के लिए किसी भी हद को पार कर जाते हैं।
मगर यही तो जीवन है। मुश्किलों को चुनौती मानकर स्वीकार करने में ही तो हमारी खुद की और हमारे अपनों की सच्ची परीक्षा होती है।
शुक्रिया उन धूर्त, मूर्ख और नकाबपोशों का जिनकी रुग्ण मानसिकता के कारण मैंने अपने जीवन में बहुत-कुछ पाया है। क्योंकि ऐसे लोगों के कारण गद्दारों की नकाब उतर गयी और सच्चे वफादारों को अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करने का समय से पूर्व अवसर मिल गया।
यदि सामाजिक जीवन में काम करने वाले हम सभी लोग उपरोक्त वर्णित हालातों और घटनाओं का अवलोकन करते हुए आगे बढें तो यह तय है कि असफलता भी वरदान सिद्ध हो सकती है।
भारत की कुल आबादी में 90 फीसदी होकर भी वंचित-मोस्ट वर्ग अपने हकों से वंचित है। अतः मोस्ट आन्दोलन के सहभागियों, नेतृत्वकर्ताओं और समर्थकों को पूर्वाग्रही और संकीर्ण सोच को त्यागकर सामूहिक, उदार और सूझबूझ से परिपूर्ण संयुक्त विचारधारा को अपनाने की जरूरत है। मेरी राय में वंचित मोस्ट वर्ग की सफलता के लिये संयुक्त विचारधारा का रास्ता संविधान के गर्भ से ही निकलेगा।
नोटः उक्त लेख 03 फरवरी, 2015 को ‘शुक्रिया उन धूर्त, मूर्ख और नकाबपोशों का जिनकी समय से पूर्व नकाब उतर गयी!’’ शीर्षक से प्रकाशित मेरे खुद के एक आलेख को आंशिक रूप से संपादित करके प्रस्तुत किया गया है।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, मो. वाअ: 9875066111, 25.07.2017

Saturday, July 22, 2017

जन्मजातीय विभेद से पीड़ित भारतीय समाज में मूलनिवासी और विदेशी के जरिये वंचित वर्गों की एकता को छिन्नभिन्न करने वाला मूलवंश या नस्लीय विभेद का काल्पनिक आन्दोलन क्यों?—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

*जन्मजातीय विभेद से पीड़ित भारतीय समाज में मूलनिवासी और विदेशी के जरिये वंचित वर्गों की एकता को छिन्नभिन्न करने वाला मूलवंश या नस्लीय विभेद का काल्पनिक आन्दोलन क्यों?—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'*
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मैं एक गरीब और संघर्ष झेलने को विवश आदिवासी मीणा परिवार में जन्मने के बाद 1978—1979 से सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ हूं। 4 साल 2 माह 26 दिन 4 जेलों में रहा। 20 साल 9 माह 5 दिन तक 3 रेलवेज में रेलवे सेवा की और पत्रकारिता तथा लेखन क्षेत्र से जुड़ा रहा हूं। लम्बे समय तक रेलवे में कर्मचारी प्रतिनिधि भी रहा। 22 राज्यों में सेवारत भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान बास का 1993 से राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं। इसके अलावा भी दैनिक जीवन में अनेकानेक प्रकार के लोगों से वास्ता पड़ता रहा है।

*इस दौरान मुझे व्यक्तिगत तौर पर तथा अपने नजदीकियों, सहयोगियों, मित्रों आदि के मामलों में जातिगत और वर्गगत आधार पर तो सैकड़ों बार कुटिल विभेद, तिरस्कार, शोषण, अधिकार हनन, अपमान जैसे वाकयों से दो-चार होना पड़ा। मगर मुझे कभी भी मूलवंश या नस्ल के आधार पर किसी अप्रिय या अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा! यही कारण है कि भारत में 90 फीसदी से अधिक लोग विदेशी मूल के होने के बावजूद भी किसी प्रकार का कोई नस्लीय विभेद देखने को नहीं मिलता है। परिणामत: भारत में नस्ल और मूलवंश के आधार पर विभेद के आपराधिक मामले लगभग शून्य हैं।*

इसके बावजूद जन्म आधारित जातिगत विभेद को दरकिनार करके विदेशी मूल के आर्यवंशी शूद्रों *(कृपया इस तथ्य की पुष्टि हेतु नीचे दिये गये नोट को भी पढें)* के वर्तमान वंशजों के नेतृत्व में *मूलनिवासी* और विदेशी जैसी शब्दावली के जरिये भारत को विभाजित करके लोगों में *वैमनस्यता पैदा करने तथा वंचित वर्गों की एकता को छिन्नभिन्न करने वाला अभियान संचालित करने का औचित्य क्या है?* 
*नोट:*
*एक महत्वूपर्ण तथ्य* डॉ. अम्बेड़कर *'शूद्र कौन थे'* पुस्तक में शोधपूर्ण सत्य लेखन के जरिये प्रमाणित कर चुके हैं कि—
*शूरवीर सूर्यवंशी आर्य क्षत्रियों द्वारा* लगातार ब्राह्मणों पर अत्याचार किये जाने के कारण, *ब्राह्मणों ने सूर्यवंशी आर्य क्षत्रियों का उपनयन संस्कार प्रतिबन्धित करके* उन्हें क्षत्रिण वर्ण से नये चौथे शूद्र वर्ण में डाल दिया। इस प्रकार *शूद्र आर्यवंशी सवर्ण हैं।*

*दूसरा महत्वूपर्ण तथ्य* डॉ. अम्बेड़कर *'अछूत कौन हैं...'* पुस्तक में शोधपूर्ण सत्य लेखन के जरिये प्रमाणित कर चुके हैं कि—

अछूत घोषित जातियों की अग्रेजों द्वारा विभिन्न समयों पर अनेक सूचियां जारी की गयी। जिनकी *कुल संख्या 429 बतायी गयी। जिनमें से 427 को डॉ. अम्बेड़कर ने गैर शूद्र अछूत जाति माना है।*

तदनुसार वर्तमान में *अजा वर्ग में शामिल सभी जातियां आर्यवंशी सवर्ण शूद्र नहीं हैं।*

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 9875066111, 22.07.2017
https://www.facebook.com/NirankushWriter/posts/456401324719637

Wednesday, July 19, 2017

मोस्ट वर्ग की एकता हेतु संयुक्त विचारधारा और संयुक्त नेतृत्व सबसे पहली जरूरत!

मोस्ट वर्ग की एकता हेतु संयुक्त विचारधारा और संयुक्त नेतृत्व सबसे पहली जरूरत!

आजादी के बाद से भारत में सामाजिक न्याय का मिशन अजा वर्ग के लोगों के नेतृत्व में संचालित होता रहा है। जिसमें आदिवासियों का सहयोगी के रूप में सक्रिय योगदान रहा है। लेकिन अजा वर्ग ने संयुक्त संगठनों में आदिवासी को कभी भी नेतृत्व नहीं करने दिया। इस कारण आपसी रिश्तों में अभी तक मजबूती का अभाव है। लेकिन पिछले 70 साल से जारी विचारधारा और नेतृत्व पूरी तरह से असफल, अनुदार और नाकारा सिद्ध हो चुके हैं। अत: वर्तमान हालातों में वंचित मोस्ट वर्ग को यदि एक होकर सामाजिक न्याय के मिशन को आगे बढाना ना है तो-

1. मोस्ट वर्ग की एकता के लिये संयुक्त विचारधारा और संयुक्त नेतृत्व को सबसे पहली जरूरत और अनिवार्यता मानकर आगे बढना होगा।

2. अभी तक अजा वर्ग के नेतृत्व द्वारा सामाजिक न्याय हेतु जारी रखी गयी, लेकिन असफल सिद्ध हो चुकी विचारधारा का मोस्ट वर्ग के विद्वानों की संयुक्त टीम द्वारा परीक्षण तथा पुनरावलोकन करना। जिससे कि मोस्ट वर्ग की एकता में बाधक तत्वों को चिह्नित करके निरसित/रिपील अर्थात डिलीट किया जा सके। साफ शब्दों में ओबीसी, मायनोरिटी और आदिवासी वर्गों को अस्वीकार्य विचारों तथा धारणाओं को हर हासल में त्यागना ही होगा।

3. सामाजिक न्याय के मिशन को भटकाने वाले अजा वर्ग के अग्रणी नेतृत्व को अपनी 70 साल से जारी गलतियों तथा असफलताओं को खुले मन से और सार्वजनिक रूप से स्वीकार करके ओबीसी, मायनोरिटी और आदिवासी नेतृत्व के सहयोगी के रूप में काम करना होगा।

उपरोक्त विचारों में सुधार, परिवर्तन, संशोधन सुझाने वाले पूर्वाग्रह से मुक्त विद्वान विश्लेष्कों के विचारों का स्वागत है।

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
W & M No. 9875066111, 19072017

Tuesday, July 18, 2017

अफसर मोबाईल रखते हैं, लेकिन सिपाही मोबाईल नहीं रख सकता! मोबाईल उपयोग नहीं करने देने पर सिपाही ने की मेजर की हत्या!!

अफसर मोबाईल रखते हैं, लेकिन सिपाही मोबाईल नहीं रख सकता!
मोबाईल उपयोग नहीं करने देने पर सिपाही ने की मेजर की हत्या!!

लेखक: डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

सोमवार, 17 जुलाई, 2017 को रात करीब सवा बारह बजे उत्तरी कश्मीर के उड़ी सेक्टर में एलओसी के अग्रिम छोर पर स्थित बुचर चौकी के पास एक सिपाही ने मेजर की हत्या कर दी। हत्या का कारण सिपाही को मोबाईल रखने की अनुमति नहीं होने के बावजूद सिपाही को मोबाईल का इस्तेमाल करते हुए पकड़ा जाना। इस कारण 71 आर्मर्ड रेजिमेंट के मेजर शिखर थापा ने 9 मद्रास रेजिमेंट के नायक काठी रीसन से मोबाइल फोन छीन लिया। दोनों के बीच कथित तौर पर हाथापाई हुइ। जिसमें सिपाही का मोबाइल क्षतिग्रस्त हो गया।

इसके बाद मेजर ने कमांडिंग ऑफिसर को रिपोर्ट करके सिपाही के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करवाने की धमकी दी। इस पर सिपाही काठी रीसन ने मेजर पर अपनी एसाल्ट राइफल से गोलियों की बौछार कर दी। इससे मेजर की मौके पर ही मौत हो गई।

सबसे पहले तो यह घटना देश और सेना के लिये अत्यन्त दु:खद और चिन्ताजनक है। दिवंगत मेजर की मौत उसके परिवार और सेना के लिये बड़ी क्षति है। वहीं सिपाही का इस प्रकार का व्यवहार अनेक सवालों को जन्म देता है।

सामान्यत: फौजी अफसर सुविधा-सम्पन्न दफ्तरों, स्थानों और, या शहरों में पदस्थ रहते हैं। आम तौर पर फौजी अफसरों के परिवार भी उनके साथ ही रहते हैं। इसके बावजूद भी उन्हें मोबाईल सहित संचार के सभी साधन चौबीसों घंटे सरकारी खर्चे पर उपयोग करने की अनुमति होती है। इसके विपरीत एक सिपाही, सीमा पर मौसम की मार झेलते हुए, अनेक प्रकार के तनावों और परेशानियों में अपनी सेवाएं देता है। हर समय उसके सिर पर दुश्मन की गोली का खतरा मंडराता रहता है। लम्बे समय तक उसे अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ-साथ शहरी जीवन की सुविधाओं से बहुत दूर रहना पड़ता है। इस कारण सिपाही को अनेक प्रकार के तनाव और विषाद झेलने होते हैं। ऐसे में सिपाही को अपने परिवार, दफ्तर और देश-दुनियां से जुड़े रहने के लिये संचार सुविधाओं की तुलनात्मक रूप से अफसरों से अधिक जरूरत होती है। बल्कि इन हालातों में वर्तमान समय में एक सिपाही के लिये इंटरनेटयुक्त मोबाईल अनिवार्य है।

सु्प्रीम कोर्ट ने एक मामले में संचार सुविधाओं को अनुच्छेद 21 के तहत वर्णित जीवन के मूल अधिकार का अपरिहार्य हिस्सा घोषित किया हुआ है। ऐसे में सिपाही को ड्यूटी के दौरान मोबाईल का इस्तेमाल करने का हक नहीं देने वाला कोई भी सैनिक आदेश या नियम मूल अधिकारों को छीनने और हनन करने वाला होने के कारण अनुच्छेद 13 (2) के प्रकाश में कानूनी दृष्टि से शून्य है।

इसके बावजूद भी सिपाही को मोबाईल इस्तेमाल नहीं करने देना और मोबाईल को छीनना, सिपाही के साथ मारपीट करते हुए कानूनी कार्यवाही की धमकी देना, अपने आप में भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध है। ऐसे में देश की रक्षा के लिये तैनात सिपाही के संवैधानिक मूल अधिकारों को छीनकर, उसके आत्मस्वाभिमान को कुचलने का आपराधिक कुकृत्य भी उतना ही निन्दनीय, गलत, अक्षम्य और चिन्ताजनक है, जितना कि देश सेवा के लिये तैनात एक मेजर की मौत।

हत्या नहीं मानव वध: निश्चय ही यह हत्या का अपराध नहीं है, क्योंकि मेजर की हत्या के पीछे सिपाही का कोई मोटिव या इंटेशन प्रकट नहीं होता है। अत: मेजर की मौत को हत्या नहीं, बल्कि मानव वध की श्रेणी का अपराध है।

अन्तिम बात: वास्तव में यह घटना अन्याय, विभेद और मनमानी व्यवस्था के विरुद्ध, वंचित-शोषित तथा आक्रोशित मानव मन की अति-आपराधिक प्रतिक्रिया है। जिसे व्यवस्था पर काबिज लोगों द्वारा रोका जा सकता था, बशर्ते सिपाही के मूल अधिकारों का हनन नहीं किया गया होता। इस घटना से सबक लेकर भविष्य में हो सकने वाली ऐसी घटनाओं को रोकना सम्भव है। यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि मूल अधिकारों के हनन को संविधान में ही दण्डनीय आपराधिक कृत्य घोषित कर दिया गया होता तो आम व्यक्ति और निम्न स्तर पर सेवारत लोक सेवकों के मूल अधिकारों को छीनने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता था। मगर खेद है कि संविधान निर्माताओं ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। 
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/18.07.2017

Sunday, July 16, 2017

अजा द्वारा आदिवासी एवं ओबीसी को हैसियत देकर टरकाना अनुचित! मोस्ट वर्ग को अविलम्ब एक होना होगा, अन्यथा मिटा दिया जायेगा!!

अजा द्वारा आदिवासी एवं ओबीसी को हैसियत देकर टरकाना अनुचित!
मोस्ट वर्ग को अविलम्ब एक होना होगा, अन्यथा मिटा दिया जायेगा!!
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वर्तमान भारत में मोस्ट वर्ग को अविलम्ब, बल्कि तत्काल बकवास वर्ग से बचाव हेतु उपाय करने होंगे। अन्यथा बाद में कुछ भी शेष नहीं बचने वाला है। क्योंकि भारत में संविधान लागू होने के बाद पहली बार मनुवादी शक्तियों का सम्पूर्ण प्रभुत्व कायम हो चुका है। न्यायपालिका तो दोराईराजन प्रकरण (1950) से नीट प्रकरण (2017) तक सामाजिक न्याय की संकीर्ण व्याख्या करके मोस्ट वर्ग को अपना असली रूप दिखा ही चुकी है। जिसके कारण अनेक संवैधानिक संशोधनों के बावजूद भी 90 फीसदी लोगों को मात्र 49.5 फीसदी आरक्षण है। प्रशासन में नीति-नियन्ता-शक्ति-सम्पन्न पदों पर मोस्ट वर्ग का वास्तविक प्रतिनिधित्व 10 फीसदी भी नहीं है। जिसके कारण 10 फीसदी आबादी का 90 फीसदी पदों पर काबिज है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनारक्षित 50.5 फीसदी पदों पर आरक्षित वर्ग को लगभग प्रतिबन्धित करके और सरकार द्वारा उच्च प्रशासनिक सेवाओं में सीधी भर्ती की योजना बनाकर मोस्ट वर्ग को सीधे संकेत दिये जा चुके हैं कि बकवास वर्ग की नजर में मोस्ट वर्ग की कोई लोकतांत्रिक औकात नहीं है। इसके उपरान्त भी मोस्ट वर्ग एक नहीं हो रहा है। अकेला अजा वर्ग अपने हिसाब से सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढा रहा है। जिससे ओबीसी और आदिवासी सहमत नहीं। दूसरी ओर अधिसंख्य मोस्ट वर्ग हिन्दुत्व, अंधश्रृद्धा, अंधभक्ति, पाखण्ड, निजी स्वार्थ, भ्रष्टाचार तथा स्वर्ग और नर्क के मोहपाश में जकड़ा हुआ है। मोस्ट वर्ग के सम्पन्न लोग, जमीनी नेतृत्व को उभरने नहीं देना चाहते। अजा वर्ग उदारता का परिचय देकर अपनी विचारधारा तथा नीतियों में आदिवासी तथा ओबीसी के दृष्टिकोंण से बदलाव लाने को राजी नहीं है। यही नहीं अजा वर्ग सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व में साझेदारी के बजाय, आदिवासी तथा ओबीसी को पोजीशन नहीं, बल्कि केवल हैसियत देकर टरकाता रहता है और ओबीसी तथा आदिवासी को अपनी नीतियों और विचारधारा के अनुसार ही हांकना चाहता है। जो आदिवासी और ओबीसी के स्वाभिमान के विरुद्ध और अलोकत़ांत्रिक होने के कारण 100 फीसदी असम्भव है। ऐसे में मोस्ट वर्ग की एकता भी असम्भव है। मेरी राय में इसका मूल कारण समग्र वंचित मोस्ट वर्ग की संयुक्त परिपक्व विधारधारा का अभाव और योग्य संयुक्त नेतृत्व का नहीं पनपना है। याद रहे अजा या कोई भी एक वर्ग भारत की 90 फीसदी वंचित आबादी का वैचारिक तथा नैसर्गिक प्रतिनिधि कभी नहीं हो सकता। अत: संयुक्त विचारधारा के साथ मोस्ट वर्ग को अविलम्ब एक होना होगा, अन्यथा मिटा दिया जायेगा!

जय भारत! जय संविधान!
नर-नारी, सब एक समान!

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
W & M No. 9875066111, 16072017

Saturday, July 15, 2017

हिंदुत्व समर्थक आदिवासी मीणा जाति के लोग आत्मालोचन करें

हिंदुत्व समर्थक आदिवासी मीणा जाति के लोग आत्मालोचन करें


जैन जिनकी संख्या नगण्य है, अपना पृथक धर्म कोड हासिल करके अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल कर चुके हैं। इसके विपरीत भारत के मूलबीज_मूलवासी_आदिवासी को अपना पृथक धर्म कोड हासिल नहीं है। बेशक देशभर के आदिवासी इस दिशा में संघर्षरत है, सिवाय राजस्थान की आदिवासी मीणा जाति के, जिनको हिन्दू धर्मानुयायी होने में गर्व की अनुभूति होती है। इसके विपरीत मीणा जाति द्वारा वैवाहिक विवादों के निर्धारण में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 (2) के तहत अपनी जाति को हिन्दू नहीं, बल्कि आदिवासी मानकर अपनी पंचायतों में विवादों का निपटान कर लिया जाता है! यह दोहरा चरित्र अत्यंत दुःखद और शर्मनाक स्थिति का परिचायक है। यही नहीं मीणाओं द्वारा संघी पृष्ठभूमि के कट्टर हिंदुत्व और छुआछुत समर्थक सांप्रदायिक राजनेताओं की अंधभक्ति भी जगजाहिर है। ऐसे में मीणा जाति के लिये आत्मालोचना का समय है। अन्यथा बहुत जल्दी सब कुछ खो देने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता!-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख-HRD, 9875066111, 14.07.17

Thursday, July 13, 2017

अनुच्छेद 147 के बहाने भारत को ब्रिटिश गुलाम बताने वाले लेख का प्रकाशन कितना सही?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

अनुच्छेद 147 के बहाने भारत को ब्रिटिश गुलाम बताने वाले लेख का प्रकाशन कितना सही?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 

आल इण्डिया पोस्ट (http://allindiapost.com/) नामक न्यूज पोर्टल पर संविधान के अनुच्छेद 147 के बहाने भारत को ब्रिटिश गुलाम बताने वाला लेख प्रकाशित किया गया है। इस लेख का शीर्षक है—'संविधान का आर्टिकल 147, भारत आज भी ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश महारानी का गुलाम' (http://allindiapost.com/janiye-kya-bharat-aj-bhi-british-ka-gulam-hai-samvidhan-ke-anusar/) किन्तु आश्चर्यजनक रूप से लेख में लेखक का नाम गायब है! लेख में अनाम लेखक की ओर से किया गया विश्लेषण किन स्रोतों पर आधारित है, इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है।

इसके बावजूद लेख में उन गोपनीय दस्तावेजों का हवाला दिया गया है, जिनके बारे में लेख में दावा किया गया है कि उन दस्तावेजों को प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति के अलावा किसी ने नहीं देखा है। ऐसे में लेखक द्वारा कैसे उन दस्तावेजों को देखा और पढा गया? इस सवाल का जवाब लेख में नहीं दिया गया है।

उक्त लेख में दावा किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 147 के अनुसार भारत आज भी ब्रिटिश महारानी का गुलाम है। जिसके लिये स्तरहीन भाषा में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद तथा एम के गांधी को उत्तरदायी ठहराया गया है।

इस लेख में अनुच्छेद 147 के ​मनमाने अर्थ निकाले गये हैं, लेकिन कहीं भी उन अर्थों का आधार उल्लेखित नहीं किया गया है। इसके बावजूद भी इस लेख को अनेकों लोगों द्वारा प्रचारित एवं प्रसारित किया जा रहा है।

इस सम्बन्ध में उक्त लेख को प्रकाशित करने वाले न्यूज पोर्टल और इस लेख को प्रचारित करने वाले विद्वानों से जानना चाहता हूं कि संविधान के निर्वचन के लिये भारत सरकार अधिनियम, 1935 का उल्लेख होने मात्र से हम या हमारा देश क्यों ब्रिटेन का गुलाम हो जाता है? यहां पर यह भी उल्लेखनीय और स्मरणीय है कि भारत में सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 का और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 का लागू है। इनके अलावा भी अनेकानेक कानून भारत में ब्रिटिश जमाने के लागू हैं।

भारत के संविधान का अधिकतर हिस्सा भारत सरकार अधिनियम, 1935 सहित अनेक ब्रिटिश प्रावधानों पर आधारित है। इनके अलावा भी अनेक देशों के संविधानों के प्रावधानों को भी संविधान में ज्यों का त्यों शामिल किया गया है। जिसका एकतरफा अर्थ निकालना कि भारत सार्वभौमिक देश नहीं, बल्कि आज ब्रिटेन का गुलाम है, यह तब तक उचित नहीं, जब तक कि इसके समर्थन में कोई पुख्ता आधार पेश नहीं किया जा सके! ऐसा लिखने वालों को संविधान सभा की चर्चाओं का अध्ययन करना चाहिये और उन चर्चाओं के आधार पर देश के लोगों को यह बताना चाहिये कि अनुच्छेद 147 पर डॉ. बीआर अम्बेड़कर सहित संविधान सभा के सदस्यों की क्या राय थी?

उक्त लेख में जिन प्रावधानों की बात की गयी है, उन्हें लेखक द्वारा गोपनीय बताया जाता है। सवाल यह है कि जब प्रावधान गोपनीय हैं तो उनमें क्या लिखा है और क्या नहीं, इस बात को जाने बिना लेखक और न्यूज पोर्टल द्वारा देश के लोगों को मनमानी व्याख्या करके गुमराह करना क्या उचित है? विशेषकर तब जबकि भारत के संविधान के अनुच्छे 13 (1) में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि संविधान लागू होने से पहले से भारत में लागू ऐसी सभी विधियां जो संविधान के भाग तीन में वर्णित मूल अधिकारों का हनन करती हैं, संविधान लागू होते ही स्वत: शून्य हो जायेंगी। जिसके तहत भारत सरकार अधिनियम, 1935 के प्रावधान भी शामिल हैं।

इसके अलावा यह बात भी ध्यान देने की है कि संविधान में कहीं भी ऐसा कोई उपबन्ध नहीं है, जिसमें यह उल्लेख किया गया हो कि अनुच्छेद 147 को भारत की संसद के द्वारा अनुच्छेद 368 के तहत संशोधित नहीं किया जा सकेगा। बल्कि अनुच्छेद 368 के उप अनुच्छेद 5 में साफ शब्दों में उपबन्ध किया गया हैं कि ''शंकाओं को दूर करने के लिये यह घोषित किया जाता है कि इस अनुच्छेद के अधीन इस संविधान के उपबन्धों का, परिवर्धन (Addition), परिवर्तन (Variation) या निरसन (Repeal) के रूप में संशोधन (Amend) करने के लिये संसद की संविधायी शक्ति पर किसी प्रकार का निर्बंधन (Limitation) नहीं होगा।'' इस उपबन्ध के तहत प्रदत्त शक्तियों के अनुसार संसद सम्पूर्ण संविधान के किसी भी अनुच्छेद या उप अनुच्छेद को बदलने में सक्षम है।

जहां तक अनुच्छेद 147 के तहत संविधान के प्रावधानों के निर्वचन अर्थात् व्याख्या की बात की जाती है तो अनुच्छेद 367 के तहत संविधान के प्रावधानों के निर्वचन के प्रावधानों की क्यों अनदेखी की जाती है? जिसमें साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 का उल्लेख किया गया है।

अत: किसी अनाम लेखक के बहाने लेख प्रकाशित करके अनुच्छेद 147 की मनमानी व्याख्या करके देश के नागरिकों को गुमराह करना कहां तक उचित है? इस विषय पर भारत के जागरूक नागरिकों और न्यायविदों को गम्भीरता पूर्वक विचार करने की जरूरत है! क्योंकि इस प्रकार के छद्म लेखों के जरिये संविधान निर्माताओं, भारत की स्वतंत्रता, भारत के संविधान और भारत की सार्वभौमिकता पर सवाल खड़े करके संविधान को निरस्त करने के षड़यंत्र के संचालन से इनकार नहीं किया जा सकता!

*जय भारत! जय संविधान!*
*नर—नारी, सब एक समान!*
*विशेष नोट: मेरी ओर से ब्रॉड कास्टिंग सिस्टम के जरिये भेजी जाने वाली सामग्री से यदि आपके निजी जीवन में किसी भी प्रकार का दखल या व्यवधान होता हो तो, अग्रिम खेद, कृपया अवगत करावें। आगे से कोई सामग्री नहीं भेजी जाएगी।*
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111, 13072017, 21.52 Hrs.

Wednesday, July 12, 2017

कुछ लोग डंडे के बल पर लोगों को बदलना चाहते हैं। ऐसे लोग मोस्ट वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं।—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

कुछ लोग डंडे के बल पर लोगों को बदलना चाहते हैं। ऐसे लोग मोस्ट वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं।—डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

हम सब को अभिव्यक्ति की आजादी है, लेकिन जमीनी सच्चाई को नकारना मेरी दृष्टि में बुद्धिमता नहीं। यद्यपि विचारणीय तथ्य यह है कि केवल और *केवल डिग्रीधारी या उच्च पद दिलाने वाली शिक्षा के अहंकार से संचालित लोगों की शैक्षिक ईगो जीवन और समाज को दिशा देने के मामले में खतरनाक सिद्ध हो सकती है। बल्कि खतरनाक सिद्ध हो रही है।* मानव व्यवहार शास्त्र और मानव मनोविज्ञान का ज्ञान रखने वाले विश्वस्तरीय विद्वान्/मनीषी इस बात को जानते हैं कि *दुनिया केवल कानून, तर्क और तथ्यों से न कभी चली है और न कभी चल सकती। जीवन मानव के अवचेतन मन के गहरे तल पर हजारों सालों से स्थापित अच्छे—बुरे संस्कार, ज्ञान, अवधारणाओं, परम्पराओं और अनचाही आदतों से संचालित होता है।*


भारत के मोस्ट वर्ग में एक छोटा सा, बल्कि *मुठ्ठीभर लोगों का ऐसा समुदाय है, जो धर्म, अध्यात्म आदि को सीधे-सीधे ढोंग तथा अवैज्ञानिक करार देता है। ऐसे लोगों के समर्थन में भारत की एक फीसदी आबादी भी नहीं है।* जबकि यह वैज्ञानिक सत्य है कि अध्यात्म, प्रार्थना और मैडीटेशन का अवचेतन मन की शक्ति से सीधा जुड़ाव है। जिसे जाने और समझे बिना *अधिकतर आम आस्तिक लोग परमेश्वर, दैवीय शक्ति या अपने आराध्य की प्रार्थना करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से उनको, उनकी प्रार्थनाओं के परिणाम भी मिलते हैं। जिसे मनोवैज्ञानिकों ने संसार के अनेक देशों, धर्मों और नस्लों के लोगों में बार-बार सत्य पाया है। यह अलग बात है कि प्रार्थनाओं से मिलने वाले परिणाम दैवीय शक्ति या आराध्य के ही कारण मिलते हैं, इसका आज तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन जिन आस्तिक लोगों को परिणाम मिलते हैं। उनकी आस्था को झुठलाना वैज्ञानिक रूप से इतना सरल नहीं है, जितना कि कुछ कथित कट्टरपंथी नास्तिक समझते हैं।*

बल्कि कड़वा सच तो यह है कि *खुद को नास्तिक कहने और बोलने वाले सबसे बड़े आस्तिक होते हैं। इस विषय में, मेरी ओर से 23 अक्टूबर, 2016 को ''नास्तिकता और आस्तिकता दोनों ही मनोवैज्ञानिक और मानव व्यवहारशास्त्र से जुड़ी अवधारणाएं हैं'' शीर्षक से एक आलेख लिखा जा चुका है। जिन मित्रों ने पढ़ा होगा, उनको उसकी जानकारी रही होगी।*

अतः जानने और समझने वाली बात यह है कि *इस संसार में ऐसी बहुत सी अज्ञात शक्तियां और ज्ञान की शाखाएं हैं, जिनके बारे में जाने बिना, उन विषयों पर निर्णय सुनाने वाले वास्तव में सबसे बड़े अमानवीय और अन्यायी हैं। मोस्ट वर्ग में एक समुदाय ऐसे अन्यायी और नास्तिक लोगों की कट्टरपंथी फौज तैयार कर रहा है। जिसकी प्रतिक्रिया में वंचित वर्ग के एक तबके पर लगातार अत्याचार, व्यभिचार और अन्याय बढ़ते जा रहे हैं। जिसकी कीमत सम्पूर्ण मोस्ट वर्ग को चुकानी पड़ रही है। इस विषय में भी मैं अनेक बार विस्तार से लिख चुका हूँ। फिर भी ऐसे लोगों की पूर्वाग्रही धारणाएं शिथिल नहीं हो रही हैं। जो मोस्ट वर्ग की एकता के लिये सबसे खतरनाक तथा भयावह स्थिति है।*

जिन लोगों को अवचेतन मन की शक्ति, मैडिटेशन (ध्यान की निश्छल नीरवता) और लॉ ऑफ़ अट्रेक्शन का प्राथमिक ज्ञान भी रहा होता है, उनके द्वारा कभी भी धर्म, आध्यात्म और आस्तिकता का विरोध नहीं किया जा सकता। लेकिन *कट्टरपंथियों द्वारा ब्रेन वाश किया हुआ पूर्वाग्रही विचारों से ओतप्रोत तथा शाब्दिक ज्ञान की धारा पर तरंगित मन-अवचेतन मन की शक्ति, आकर्षण, न्याय, युक्तियुक्तता, ऋजु, इत्यादि अवधारणाओं को न तो जान सकता है और न ही उसे दूसरों की आस्थाओं, विश्वासों, संवेदनाओं तथा सिद्धांतों की परवाह होती है।*

वजह साफ है, क्योंकि ऐसे ब्रेन वाश कट्टरपंथी लोगों और आतंकवादियों के मानसिक स्तर में कोई अंतर नहीं होता। बल्कि दोनों में मौलिक समानता होती है। वजह वैचारिक रूप से दोनों ही कट्टरपंथी होते हैं। कट्टरपंथियों और आतंकियों के अवचेतन मन में मौलिक रूप से एक बात बिठायी जाती है- *मैं जो जानता हूँ, जो करता हूँ, जो बोलता हूं, वही सच है। अतः इस सच को सारी दुनिया को जानना और मानना चाहिए। जो नहीं मानते वे मूर्ख, गद्दार, देशद्रोही और असामाजिक हैं। अतः ऐसे लोगों को बहिष्कृत किया जाए या तुरंत रास्ते से हटा दिया जाए। दुष्परिणाम हर दिन हत्याएं और बलात्कार हो रहे हैं!*

भारत 1947 में आजाद हुआ। भारत में 1950 से लोकतंत्र की गणतंत्रीय व्यवस्था का संचालक संविधान लागू हुआ। इसके बावजूद भी सामाजिक न्याय से वंचित लोगों को संविधान के प्रावधानों के होते हुए न्याय नहीं मिल रहा है। अन्याय और अत्याचार यथावत जारी रहे हैं। वंचित-मोस्ट वर्ग संख्यात्मक दृष्टि से बहुसंयख्क एवं सशक्त होते हुए भी सात दशक बाद भी बिखरा हुआ है और हर मुकाम पर अपमानित तथा शोषित होने को विवश है। *जिसका मूल कारण है? आपसी एकता का आभाव है। मोस्ट वर्ग की एकता में बाधक वही लोग हैं, जिनके हाथ में मोस्ट वर्ग की लगाम रही है। उनको इतनी समझ तक नहीं कि लोगों की भावनाओं को आहत करके, उनका स्नेह, अपनापन, सम्मान, मत और समर्थन हासिल नहीं किया जा सकता।*

ऐसे लोग इस देश की सत्ता को किसी न किसी बहाने अपने कब्जे में लेने के सपने तो देखते रहते हैं, लेकिन मतदाता के मनोभाव को नहीं समझना चाहते। अत: इनके सपने पूरे होना कभी भी सम्भव नहीं है। जो कोई भी व्यक्ति लोगों की सुन नहीं सकता, वह कभी भी अच्छा वक्ता नहीं बन सकता। क्योंकि वक्ता के लिए श्रोताओं की जरूरत होती है और श्रोता उसी को सुनते हैं, जो उनकी आस्थाओं, विश्वासों, भावनाओं, आकांक्षाओं, इच्छाओं और जरूरतों का आदर करता हो। *क्या कोई नास्तिक कभी भारत में 99 फीसदी से अधिक आस्तिक मोस्ट वर्ग के लोगों की भावनाओं को धुत्कार कर, उनका चहेता बन सकता है? मेरी राय में कभी नहीं।*

याद रहे-*पाखण्ड और आस्थाओं में अंतर होता है। कोई भी व्यक्ति एक बार पाखण्ड को छोड़ने या त्यागने को सहमत किया भी जा सकता है, लेकिन वही व्यक्ति यकायक अपनी आस्थाओं और विश्वासों को नहीं त्याग सकता।* हमें इस बात को स्वीकरना होगा कि परिवर्तन सतत प्रक्रिया है। जिसमें समय लगता है। पीढियां बीत जाती हैं। तब कहीं थोड़े-बहुत बदलाव दिखने लगते हैं। इस बात को जाने बिना कुछ लोग डंडे के बल पर लोगों को बदलना चाहते हैं। ऐसे लोग मोस्ट वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं। *दुःखद स्थिति यह कि मोस्ट की कमान ऐसे ही लोगों के ही हाथों में है। इससे भी दुःखद यह कि इन लोगों में भी अधिकाँश लोग ढोंगी हैं।*

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111, 12.07.17 , 23.11 बजे। 

Tuesday, July 11, 2017

मैं न तो थका हूं, न डरा हूं, न हारा हूं, न मायूस हूं, न घबराया हूं, न भागा हूं, न कायर हूं और न किसी ने धमकाया हूं।—डॉ. पुरुषोत्त्म मीणा 'निरंकुश'

मैं न तो थका हूं, न डरा हूं, न हारा हूं, न मायूस हूं, न घबराया हूं, न भागा हूं, न कायर हूं और न किसी ने धमकाया हूं।—डॉ. पुरुषोत्त्म मीणा 'निरंकुश'

मेरे सम्माननीय मित्रो,
—————————————————सादर नमस्कार।

सबसे पहले आप सभी को अवगत हो कि मैं न तो थका हूं, न डरा हूं, न हारा हूं, न मायूस हूं, न घबराया हूं, न भागा हूं, न कायर हूं और न किसी ने धमकाया हूं। जीते जी मृत्यु का साक्षात्कार कर लेने वाले व्यक्ति को डराना किसी के आसान भी नहीं हुआ करता है।

मेरी अपनी खुद की समस्या है कि असंवेदनशील दुनिया में, मैं भावुक और संवेदनशील इंसान हूं। सर्वविदित है कि इन दिनों जबकि बकवास वर्ग सत्ता के मद में मदमस्त होकर, मोस्ट वर्ग के विरुद्ध आक्रामक स्थिति में है। ऐसे नाजुक समय में मोस्ट वर्ग को बिना समय गंवाये एक होने की जरूरत है। इसके विपरीत मोस्ट वर्ग को, मोस्ट वर्ग के ही चालाक तथा धूर्त लोगों द्वारा सभाओं, कार्यशालाओं और धरनों के मार्फत निष्ठुरतापूर्वक गुमराह किया जा रहा है। इससे वंचित मोस्ट वर्ग को अपूर्णनीय क्षति हो रही है।

हमारे मोस्ट वर्ग में एक और बड़ी समस्या है। वो यह कि बेशक मोस्ट वर्ग को, मोस्ट वर्ग का कोई भी व्यक्ति कितना ही नुकसाना पहुंचा रहा हो, लेकिन उसके नाम को सामने लाने से मोस्ट वर्ग के लोग डरते और घबराते हैं। अकसर बहाना बनाया जाता है कि इससे विवाद पैदा होंगे और समाज की एकता टूटेगी। यह बात अभी तक मेरी समझ से परे है, क्योंकि जब हमें पता चल चुका है कि कोई व्यक्ति मोस्ट वर्ग का गद्दार और दुश्मन है। तो भी ऐसे व्यक्ति को सरेआम समाज का हितैषी बोलकर समाज को गुमराह करने का अवसर देना कहां की और कैसी बुद्धिमता है? मेरे जैसे व्यक्ति के लिये यह स्थिति असहनीय पीड़ादायक है।

मेरा स्पष्ट मत है कि हमारी इसी स्थिति या नासमझी का लाभ उठाकर, इन दिनों मोस्ट वर्ग के कुछ चतुर, चालाक और धूर्त लोग नेतृत्व के नाम पर मोस्ट वर्ग को रसातल में ले जा रहे हैं। यदि हम सभी जागरूक कहलवाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, ऐसे लोगों को नंगा नहीं कर सकते तो फिर समाज को दिशा दिखाने या समाज का मार्गदर्शन करने की बात कहना और करना मोस्ट वर्ग के साथ सबसे बड़ा धोखा है और होगा। इन हालातों में हम खुद ही मोस्ट वर्ग के सबसे बड़े दुश्मन हैं। ऐसे में हर एक संवेदनशील व्यक्ति का दु:खी होना लाजिमी है। कम से कम मैं तो व्यथित हूं। मैं विरोधियों तक की भावनाओं को सम्मान देता रहा हूं। ऐसे में समझ में नहीं आता कि सब कुछ जानते हुए मैं अपनी भावनाओं को कैसे कुचलूं? शायद यह मेरी कमजोरी है कि मैं अपनी भावनाओं को कुचलना अभी तक सीख नहीं पाया।

इसके अलावा भी सर्वज्ञात है कि इस समय देश में हालात बहुत नाजुक हैं, लेकिन मुझे लगता है कि शायद मैं मोस्ट वर्ग के लोगों को प्रेरित करने में असफल रहा हूं। अन्यथा क्या कारण है कि हम जन्तर—मन्तर पर जाकर तो विरोध प्रदर्शन की सांकेतिक औपचारिकता पूरी कर आते हैं, लेकिन आम लोगों को अपने साथ नहीं ला पा रहे हैं? क्या यह हमारी कमजोरी नहीं है? विशेषकर हम साधन—सम्पन्न लोगों द्वारा जन जागरण के क्षेत्र में कुछ नहीं किया जा रहा है। यही मूल वजह है कि आम लोग जिनके पास वोट की ताकत है, उसे बकवास वर्ग द्वारा बरगलाना आसान हो रहा है।

अत: उपरोक्त कारणों से मैं अत्यधिक व्यथित हूं। मुझे माननीय कांशीराम जी की मोस्ट के प्रति समर्पितता और पांच-पांच लोगों को एकत्रित करके घंटों जनजागरण करने की यादें और उनके श्रम का बेरहमी से बिखरना रुलाता है। मुझे महापुरुषों के सपनों के ध्वस्त होने की पीड़ा सालती है। इसके अलावा कुछ भी वजह नहीं है। यदि मैं कुछ कर नहीं सकता तो दु:खी तो हो ही सकता हूं। कम से कम अपने आप को उस जमात से अलग तो कर ही सकता हूं जो मोस्ट वर्ग को दिशा दिखाने की बात तो करती है, लेकिन अंधकूप में गिरते मोस्ट वर्ग को गिरते देखकर भी आंख बंद किये हुए रहती है। साथ ही समाज सेवा का नाटक भी जारी रहता है। पूरी तरह नहीं तो अस्थायी तौर पर ही सही, मैं अपने आप को ऐसे लोगों की जमात से अलग तो कर ही सकता हूं। फिर से दौहरा दूं कि मैं उक्त हालातों से केवल और केवल दु:खी हूं। इसके अलावा आप सब से दूर होने की कोई भी वजह नहीं है।

ऐसे विकट हालातों के समाधान हेतु व्यक्तिगत, जातिगत, वर्गगत और धर्मगत पूर्वाग्रहों से मुक्त कुछ समर्पित सहयोगियों के साथ-साथ, गहराई से चिन्तन और मनन करने के लिये गुणवत्तापूर्ण समय की जरूरत होती है। मैं इन्हीं सब की तलाश में हूं। देखते हैं आने वाला वक्त क्या करवा पाता है?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/11.07.2017

Monday, July 10, 2017

अब मुझे अहसास हो गया है कि मैं मोस्ट वर्ग की सेवा करने के योग्य नहीं हूँ। मोस्ट वर्ग के अधिकतर लोगों को मुझ जैसे व्यक्ति की जरूरत नहीं है।

*अब मुझे अहसास हो गया है कि मैं मोस्ट वर्ग की सेवा करने के योग्य नहीं हूँ। मोस्ट वर्ग के अधिकतर लोगों को मुझ जैसे व्यक्ति की जरूरत नहीं है।*
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मैं 2009 से ब्लॉग और न्यूज पोर्टल्स पर लिखता रहा हूँ। तकरीबन 3 साल पहले फेसबुक ज्वॉइन किया। सामाजिक न्याय के मुद्दे पर जनजागरण के प्रयास शुरू किया। इस दौरान जहां एक ओर देश के अनेक विद्वान और सुहृदयी मित्रों से जुड़ाव तथा परिचय हुआ। जिनसे बहुत कुछ सीखने और जानने को मिला। वहीं दूसरी ओर *हमारे एकजुट प्रयासों और जनजागरण को रोकने के लिये योजनाबद्ध तरीके से हमारे विरुद्ध और व्यक्तिगत रूप से मेरे विरुद्ध अभियान चलाया गया। जिसमें अनेक पेड राईटर तक शामिल रहे। अनेक बार मुझे जान से मारने की धमकियां दी गयी। जिनमें बकवास वर्ग की संघी मानसिकता के गुलाम मेरी ही मीणा जाति के लोग भी शामिल थे।* इसके बावजूद हम ने हार नहीं मानी।

*मैंने तय किया था कि मैं अपने जीवन के कम से कम 10 साल वंचित मोस्ट वर्ग के जनजागरण के लिए दूँगा और मेरी कोशिश होगी कि जो कुछ थोड़ा बहुत मैंने सीखा है, जो कुछ मैं जानता हूँ, उसे नयी पीढ़ी को सौंप कर जाऊँगा। इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में 70-80 सभाओं और कार्यशालाओं को संबोधित भी किया। 600 से अधिक आलेख लिखे। कई हजार महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की। मेरा एक मात्र लक्ष्य रहा- *वंचित वर्ग की एकता और बकवास वर्ग के अत्याचारों और अन्यायों से मोस्ट वर्ग की मुक्ति।*

~~~~~~लेकिन *अब मुझे अहसास हो गया है कि मैं मोस्ट वर्ग की सेवा करने के योग्य नहीं हूँ। मोस्ट वर्ग के अधिकतर लोगों को मुझ जैसे व्यक्ति की जरूरत नहीं है।*

~~~~~~अतः आज 10 जुलाई, 2017 से मेरा जो भी प्रयास या अभियान जारी था, वह बन्द नहीं, बल्कि तुरन्त प्रभाव से स्थगित किया जा रहा है। कल क्या होगा, मुझे नहीं पता। वर्तमान में सोशल मीडिया पर और अनेकों संगठनों के मार्फत मोस्ट वर्ग को दिशा देने वाले हजारों लाखों समाज सेवकों और लोगों की फ़ौज है। मेरी और से गढ़े गए मोस्ट और बकवास दो शब्द भी यदि कुछ मित्रों को समझ में आ गए हों तो मैं यह समझ लूंगा कि मैं कुछ पहचान छोड़ने में सफल रहा। लेकिन अब मुझे पूर्ववत जारी तरीके से मोस्ट वर्ग के लिए मेरी कोई उपयोगिता नजर नहीं आ रही।

~~~~~~ *हाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं फेसबुक या सामाजिक न्याय के लिये जारी संघर्ष को छोड़ या त्याग नहीं रहा। फिलहाल अभियान स्थगित। आगे से मैं उन सभी विषयों पर लिखूंगा, जो यथा समय मुझे उचित प्रतीत होंगे। मेरे से अधिक जानकार विद्वानों से सीखूंगा। शायद मेरे ज्ञान और अनुभव में कुछ कमी रह गयी। कोशिश करूंगा कि इसे कुछ कम कर सकूं।*
🙏
*डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'*
*9875066111/10.07.17*
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=450650441961392&id=100010493194295

Friday, July 7, 2017

बकवास वर्ग के अत्याचारों के विरुद्ध मोस्ट वंचित वर्ग की रणनीति?

बकवास वर्ग के अत्याचारों के विरुद्ध मोस्ट वंचित वर्ग की रणनीति?

हम वंचितों को सबसे पहले बिना किसी पूर्वाग्रह के कुछ महत्वपूर्ण बातें ठीक से समझनी होंगी। जैसे—
1. आजादी के बाद से पहली बार वर्चस्ववादी अगड़ी जातियों अर्थात बकवास वर्ग की तानाशाही और मनमानियां सारे देश में बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। जिसके कारण भारत के बहुसंख्यक पिछड़े और वंचित वर्गों (अर्थात MOST) की जातियों के मान-सम्मान और हकों को लगातार कुचला जा रहा है। इस प्रकार मोस्ट जातियों को भयभीत और आतंकित करके ऐसी स्थिति में पहुंचाया जा रहा है जिससे कि वे बकवास वर्ग के खिलाफ *सिर उठाने की हिम्मत ही तक नहीं कर सकें।*

2. मोस्ट वर्गों को आतंकित करने के साथ ही साथ बकवास वर्ग द्वारा मुस्लिमों को आतंकी, आदिवासियों को नक्सली, ईश्वर में आस्था रखने वाले भोले लोगों को हिंदुत्व रक्षक, दलितों को उद्दंड एवं असामाजिक और सुशिक्षित महिलाओं को चरित्रहीन घोषित करके आपस में एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने, भड़काने और लड़ाने की नीति को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। दूसरी ओर देश की व्यवस्था पर काबिज बकवास वर्ग के लोगों को राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, संस्कृति और भारतीय आदर्शों का सर्वश्रेठ संरक्षक घोषित करना भी इनके षड़यंत्र का मूल मकसद है।

3. साधू-सन्तों का चोला ओढ़कर बकवास वर्ग के लोग मंदिरों को छोड़कर संसद और विधानमण्डलों तथा उद्योग धंधों पर कब्जा जमा रहे हैं। जबकि मोस्ट वर्ग के लोग अपने पैतिृक कलात्मक व्यवसायों तक को छोड़कर नर्क के भय और वैकुण्ठ की आकांक्षा में मंदिर बनाने, मंदिर में प्रवेश पाने और बामणों द्वारा घोषित भगवानों की पूजा अर्चना करने में अपनी ऊर्जा, आर्थिक संसाधनों तथा अमूल्य जीवन का अपव्यय करके आने वाली पीढियों को भी अंधश्रृद्धा, अंधविश्वास तथा पाखण्ड के अंधकूप में धकेल रहे हैं।

4. जबकि समझने वाली मूल बात यह है कि अंततः बकवास वर्ग द्वारा राजनीतिक सत्ता हासिल करके परोक्ष रूप से न्यायिक व्याख्या और प्रशासनिक आदेशों के मार्फत संविधान तथा आरक्षण व्यवस्था को तहस-नहस किया जा रहा है। इस छद्म एजेंडा को समझना बेहत जरूरी है। सरकारी खजाने से विज्ञापन रूपी रिश्वत अदा करके मीडिया को अपने कब्जे में किया हुआ है और बिकाऊ-भांड मीडिया के मार्फत देश और दुनिया को लगातार गुमराह किया जा रहा है।

5. उपरोक्त हालातों के साथ-साथ सबसे दु:खद स्थिति तो यह है कि वंचित मोस्ट वर्ग के कुछ चतुर, चालाक, स्वार्थी, भ्रष्ट, धूर्त तथा वर्गद्रोही प्रकृति के समाज सेवकों, राजनेताओं एवं पूर्व नौकरशाहों को बकवासवर्गीय राजनीतिक दलों द्वारा अपने जाल में फंसाया हुआ है। जिन्हें अपनी पार्टी में दिखावटी हैसियत प्रदान करके और, या सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों या वंचित वर्ग बहुल जातियों के क्षेत्रों से सांसद-विधायक बना दिया जाता है।
पद और धन के लोभी इन लोगों के द्वारा मोस्ट मतदाताओं का ब्रेनवाश करके, बकवास वर्ग के पक्ष में आम लोगों को लगातार गुमराह किया जाता रहता है। वंचित मोस्ट वर्ग के आम और भोले-भाले लोग सत्ता और राजनीति की कूटनीतिक चालों तथा षड्यंत्रों के पीछे छिपे छद्म ऐजेंडे की हकीकत को जाने बिना इनके जाल में फंसते चले जाते हैं।

6. दूसरी दु:ख स्थिति यह है कि उपरोक्त सब बातों को जानते और समझते हुए भी वंचित मोस्ट वर्ग का मध्यम वर्ग चुपचाप तामाशा देखते रहने को विवश होता है। जिनमें अधिकत संख्या चतुर्थ, तृतीय एवं द्वितीय श्रेणी के लोक सेवकों तथा व्यवसाईयों और विकासमान परिवार के लोगों की होती है। इन्हीं लोगों की पदोन्नतियों, संवैधानिक हकों और सामाजिक न्याय में सहायक सुविधाओं को छीनकर, सीधे तौर पर इनको और इनके परिवारों के बच्चों को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मिल रहे आरक्षण से महरूम किया जा रहा है। जिसके लिये न्यायपालिका का सहयोग लिया जा रहा है। 1950 में दोराईराजन से लेकर नीट मामले तक न्यायपालिका ने आरक्षण की संकीण व्याख्या करके, आरक्षण को लगातार कमजोर किया है।

7. वर्तमान में जबकि हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिनिधि पूरी तरह से मौन साधे हुए हैं। प्रतिपक्ष की बोलती भी बंद है और बकवास वर्ग की मनमानी हर दिन बढती जा रही हैं। ऐसे में मोस्ट वर्ग को अपना अस्तित्व बचाना है कि खुद ही आगे आना होगा। जिसके लिये जनान्दोलन बहुत जरूरी है, लेकिन जनान्दोलन की दिशा में आगे बढाने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातों को समझना अत्यन्त जरूरी है। जैसे—

1)~~~~ यदि बहुसंख्यक मोस्ट वर्ग के लोक सेवक सीधे तौर पर सरकार की उत्पीड़क, विभेदक और मनमानी नीतियों का विरोध करते हैं तो उनकी नौकरी दाव पर लग सकती है।
2)~~~~ यदि बहुसंख्यक मोस्ट वर्ग के युवा सीधे तौर पर सरकार की उत्पीड़क, विभेदक और मनमानी नीतियों का विरोध करते हैं तो उनको सरकारी नौकरी मिलना तो दूर, उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करके उनके सम्पूर्ण कैरियर को ही दाव पर लगाये जाने की आशंका बनी रहेगी।
3)~~~~ उपरोक्त हालातों में वर्तमान लोक सेवक और लोक सेवक बनने की आकांक्षा रखने वाले हमारे महत्वपूर्ण लोगों को हम जनान्दोलन के लिये दाव पर लगाने की मूर्खता नहीं कर सकते हैं। लेकिन वर्तमान चिन्ताजनक हालातों में जनान्दोलन की जरूरत को नकारा भी नहीं जा सकता।
4)~~~~ इसलिये हमें वंचित मोस्ट वर्ग के आम परिपक्व लोगों और स्वस्थ सेवानिवृत लोगों को मोस्ट जनान्दोलन की नीति, नियम और रणनीति का मूल आधार बनाना होगा।
5)~~~~ प्रस्तावित जनान्दोलन का सम्पूर्ण आर्थिक भार लोक सेवकों, व्यापारियों, व्यवसाईयों और सम्पन्न लोगों को वहन करना होगा।
6)~~~~ यदि हम उपरोक्तानुसार जनान्दोलन को जरूरी समझते हैं तो हमें सबसे पहले शुरूआत जनजागरण से करनी होगी। जिसके लिये हमें वक्ताओं को तैयार करना होगा।
7)~~~~ योग्य और प्रशिक्षित वक्ताओं द्वारा लगातार गांव-गांव, शहर-शहर, हर माह 10-20 कार्यशाला और सभाओं के आयोजन करके आम लोगों को वर्तमान हालातों से अवगत करवाना होगा।

उपरोक्त सातों चरणों से गुजरने के बाद जनजागरण अभियान को जनान्दोलन में बदलना होगा। जिसकी रणनीति तत्कालीन हालातों के अनुसार बनायी जा सकेगी।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
9875066111/07.07.2017

Tuesday, July 4, 2017

HRD राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. निरंकुश का प्रधानमंत्री के नाम खत-प्रधानमंत्रीजी आरक्षण कानून बनाओ!

HRD राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. निरंकुश का प्रधानमंत्री के नाम खत-प्रधानमंत्रीजी आरक्षण कानून बनाओ!

प्रेषक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', राष्ट्रीय प्रमुख, हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, 7, तंवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर- 302006, राजस्थान। मोबाईल नम्बर : 9875066111
E-mail : baasoffice@gmail.com , दिनांक : 04.07.2017
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प्रेषिति :
श्री नरेंद्र मोदी जी, प्रधानमंत्री, भारत सरकार, नयी दिल्ली, भारत।

विषय: भारत के वंचित वर्गों के संरक्षणार्थ संविधान में उपबन्धित प्रतिनिधित्व (आरक्षण) के मूल अधिकार की सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1950 से नीट प्रकरण तक लगातार की जा रही संकीर्ण व्याख्याओं पर स्थायी प्रतिबन्ध लगाने हेतु संविधान में तुरन्त संशोधन बिल पेश किया जाकर, आरक्षण क़ानून बनाया जावे और उसे 9वीं अनुसूची में शामिल किया जाये।


माननीय आप जानते हैं कि भारत की बहुसंख्यक पिछड़ी तथा वंचित आबादी हजारों वर्षों से अपने मूलभूत हकों, मानवीय गरिमा और स्वाभिमान से महरूम रही। जिसके ​लिये वर्चस्ववादी अगड़ी जातियों की धर्म, वर्ण तथा जाति आधारित अमानवीय नीतियां जिम्मेदार थी। इसी कारण भारत की बहुसंख्यक मोस्ट (MOST = M4Minority + O4OBC + S4SC + T4Tribals) पिछड़ी तथा वंचित आबादी को सरकारी शिक्षण संस्थानों तथा सरकारी सेवाओं में समान प्रतिनिधित्व (आरक्षण) तथा सामाजिक न्याय तथा संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने के मकसद से संविधान सभा द्वारा संविधान में अनेक उपबन्ध किये गये।

माननीय आप जानते हैं कि जन्मजातीय श्रेृष्ठता और निकृष्टता को संचालित करने वाली वर्चस्ववादी अगड़ी जातियों को संविधान के उक्त प्रावधानों से अपना मनमाना और अपवित्र एकाधिकार टूटता नजर आया। इस कारण न्यायपालिका के मार्फत 1950 से वर्तमान में नीट प्रकरण तक शिक्षण संस्थानों और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व (आरक्षण) को चुनौती दी जाती रही हैं। दु:खद स्थिति यह रही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा हर बार आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने वाले तथा संविधान सभा, संविधान और लोकतंत्र की भावना के विपरीत आरक्षण की व्याख्या करने वाले निर्णय सुनाये गये। जिन्हें निरस्त करने के लिये संसद को बार-बार संविधान में संशोधन करने पड़े हैं। जिससे स्वत: सिद्ध होता है कि सुप्रीम कोर्ट का मत समान प्रतिनिधित्व (आरक्षण) तथा सामाजिक न्याय के पक्ष में नहीं है। यह कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिये कि सुप्रीम कोर्ट में भारत की 90 फीसदी पिछड़ी और वंचित आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं होने के कारण ही समान प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक न्याय स्थापित करने वाले उपबन्धों की सुप्रीम कोर्ट द्वारा संकीर्ण तथा 10 फीसदी वंचक, शोषक और जन्मजातीय व्यवस्था में विश्वास रखने वाली वर्चस्ववादी जातियों को लाभ पहुंचाने वाले निर्णय सुनाये जाते रहे हैं। यद्यपि आरक्षण के सम्बन्ध में भारत में तीन तथ्य सुस्थापित रहे हैं कि—


पहला: पिछड़े और वंचित वर्गों को निर्धारित अर्हताओं और मानदण्डों में छूट प्रदान करके ही समान प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक न्याय प्रदान किया जा सकता है।


दूसरा: आरक्षित वर्गों के लिये निर्धारित आरक्षण कोटा, इन वर्गों को आरक्षण के माध्यम से न्यूनतम प्रतिनिधित्व प्रदान करने की व्यवस्था है, न कि अधिकतम। अत: बौद्धिक कोटा अर्थात् मैरिट में स्थान पाने वाले आरक्षित वर्ग को अभ्यर्थियों को बौद्धिक कोटे में शामिल किया जाता रहा है।
तीसरा: उक्त दोनों सिद्धान्तों की न्यायसंगतता इस कारण सुसंगत रही है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समता तथा कानून का समान संरक्षण पाना प्रत्येक व्यक्ति का मूल अधिकार है।


माननीय आप जानते हैं कि वर्तमान नीट प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी आरक्षण व्यवस्था की संकीर्ण व्याख्या जहां एक ओर समान प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक न्याय की स्थापना करने वाले मूल सिद्धान्तों को तहस-नहस करने वाली है, वहीं दूसरी ओर संविधान सभा, संविधान और संसद की भावना के विपरीत भी है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि निर्धारित अर्हताओं और मानदण्डों में किसी भी प्रकार की छूट पाने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को बौद्धिक कोटे की मैरिट में शामिल नहीं किया जायेगा। जिसका सीधा और साफ अभिप्राय यही है कि देश की व्यवस्था पर हजारों सालों से काबिज रही वर्चस्ववादी जातियों की वर्तमान 10 फीसदी आबादी को सुप्रीम कोर्ट परोक्ष रूप से 50.50 फीसदी आरक्षण घोषित कर चुका है। यहां यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिये कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस प्रकार की संकीर्ण व्याख्या इस कारण की जा रही है, क्योंकि उच्च न्यायपालिका में भारत की 90 फीसदी वंचित आबादी का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य है।


अत: हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन के भारतवर्ष में सेवारत करोड़ों सदस्यों और समर्थकों की ओर से आप से आग्रह है कि—
1-भारत सरकार द्वारा अविलम्ब संसद के समक्ष संविधान संशोधन बिल पेश करके समान प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक न्याय की नकारात्मक व्याख्या करने वाले नागराजन और नीट प्रकरण सहित सभी निर्णयों को निरस्त किया जावे।


2-भारत की जातिगत जनगणना के आंकड़े अविलम्ब घोषित किये जावें।


3-आरक्षण की 50 फीसदी की अधिकतम सीमा के कारण ओबीसी सहित अजा एवं अजजा वर्गों को भी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। अत: इस सीमा को समाप्त किया जावे।


4-अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में देश की आधी से अधिक आबादी की पिछड़ी जातियां शामिल हैं। जिनको वर्तमान वर्गीकरण में इंसाफ नहीं मिल पा रहा है। अत: ओबीसी की जनसंख्या के अनुपात में एक समान पृष्ठभूमि की जातियों के एकाधिक न्यायसंगत वर्गीकरण करके ओबीसी जातियों को पदोन्नति और विधायिका में भी आरक्षण प्रदान किया जावे।
5-आरक्षण कानून बनाया जाकर, आरक्षण को संविधान की अनुसूची 9 में डाला जावे। आरक्षण कानून के तहत सभी पिछड़े तथा वंचित वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सरकारी और कार्पोरेट सेक्टर में समान रूप से आरक्षण प्रदान करना सुनिश्चित किये जाने का प्रावधान हो। जिसका उल्लंधन करना अजमानतीय तथा संज्ञेय अपराध हो।


अन्तिम बात: सुप्रीम कोर्ट सहित विभिन्न न्यायालयों के आरक्षण विरोधी निर्णयों को आपकी सरकार द्वारा निरस्त नहीं करके, उन्हें लागू करने में तत्परता दिखाने के कारण भारत की बहुसंख्यक मोस्ट (MOST = M4Minority + O4OBC + S4SC + T4Tribals) 90 फीसदी पिछड़ी और वंचित आबादी के लोग अत्यधिक व्यथित और परेशान होकर अपने हकों से महरूम हो रहे हैं। जिसके कारण उनमें आपकी सरकार तथा पार्टी के प्रति लगातार आक्रोश बढता जा रहा है, जो भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा आपकी सरकार एवं पार्टी के लिये सुखद संकेत नहीं हैं। अत: आशा की जाती है कि आप उपरोक्त न्यायसंगत कानूनी प्रावधानों के जरिये भारत की 90 फीसदी वंचित आबादी को न्याय प्रदान करके अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करेंगे। इसी आशा और विश्वास की उम्मीद में यह पत्र आपको प्रेषित है।


प्रतिलिपि: सभी वर्तमान और पूर्व/भूतपूर्व जन प्रतिनिधियों, सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों/पदाधिकारियों और सामाजिक न्याय, इंसाफ तथा संविधान में विश्वास रखने वाले सभी प्रकार के संगठनों और बुद्धिजीवियों को सोशल मीडिया के मार्फत प्रेषित कर अनुरोध है कि कृपया आप सभी उपरोक्त न्यायसंगत और संवैधानिक प्रावधानों को बनवाने और लागू करवाने में भारत सरकार को सहयोग करके बहुसंख्यक मोस्ट (MOST = M4Minority + O4OBC + S4SC + T4Tribals) वर्गों को संवैधानिक संरक्षण और इंसाफ दिलाने में अपना योगदान करके अपने—अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करें।
भवदीय

(डॉ. पुरुषोत्तम मीणा)


Tuesday, June 27, 2017

संविधान की व्याख्या के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश गुलामी की गाथा लिखने वाले श्लोक सिद्ध होंगे।


*संविधान की व्याख्या के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश गुलामी की गाथा लिखने वाले श्लोक सिद्ध होंगे।*

अजा और अजजा के सांसदों की चुप्पी तथा सांसदों की चुप्पी पर हम अजा एवं अजजा के आम लोगों की चुप्पी का दुष्परिणाम है, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि----

*"आरक्षित वर्ग के आवेदक द्वारा यदि आवेदन करते समय किसी भी प्रकार की छूट प्राप्त की गयी तो ऐसे आवेदक को अनारक्षित मैरिट में शामिल नहीं किया जाएगा।"*

इस फैसले का सीधा और साफ़ मतलब यही है कि *सुप्रीम कोर्ट ने संविधान को धता बतलाते हुए, संविधान की व्याख्या के नाम पर, भारत की व्यवस्था पर काबिज वर्चस्ववादी शोषक और संख्यात्मक दृष्टि से अल्पसंख्यक अगड़ी जातियों के अनारक्षित वर्ग के आवेदकों के लिए 50.5% आरक्षण घोषित कर दिया है। सबसे दु:खद यह कि यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों (जिनमें न्याय नहीं, अन्याय लक्षित है) की खिलाफत करो तो जस्टिस कर्णन की भांति न्यायिक अवमानना के अपराध में 6 माह के लिए जेल जाओ।*

अब ऐसे हालातों में विकल्प सीमित हैं- *वंचित वर्ग के लोगों के लिये, करो या मरो की स्थिति है*, लेकिन अजा तथा अजजा वर्ग का एलीट वर्ग जब तक साथ नहीं देगा, इस लड़ाई को जीतना आसान नहीं होगा। हो सकता है कि एलीट वर्ग भी सामने आ जाए, लेकिन बदले में उसे राजनीतिक सत्ता चाहिये होगी। *अनुभव यही सिद्ध करता है कि अजा एवं अजजा के एलीट वर्ग का राजनीतिक चरित्र भी वर्चस्ववादी अगड़ी जातियों की ही तरह असंवेदनशील, अनुत्तरदायी और अलोकतांत्रिक है।*

अतः अब हम को आम लोगों में से ही नेतृत्व उभारना होगा। इसके अलावा जो भी जरूरी हो करना होगा। अन्यथा *संविधान की व्याख्या के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश गुलामी की गाथा लिखने वाले श्लोक सिद्ध होंगे।* मुझे उम्मीद है, *हम में से कुछ लोगों की संवेदनाएं जागेंगी और हम अतिवाद, कट्टरता तथा अंधभक्ति से मुक्त होकर वंचित वर्ग की संयुक्त विचारधारा और संयुक्त नेतृत्व को जन्म देने की दिशा में कदम उठाएंगे।*

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111, 27.06.17

Friday, June 16, 2017

प्रतिज्ञाओं द्वारा धारित बुद्धत्व, बुद्ध का नहीं अम्बेड़कर का अन्धानुकरण

प्रतिज्ञाओं द्वारा धारित बुद्धत्व, बुद्ध का नहीं अम्बेड़कर का अन्धानुकरण
लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
किसी भी व्यक्ति या समाज को लगातार प्रताड़ित किये जाने या उसकी अनदेखी किये जाने पर, प्रतिक्रिया या भावावेश में दमित लोगों के मन से आक्रोश निकलना सार्वभौमिक और स्वाभाविक मानव स्वभाव है। मनोविज्ञान इसका समर्थन करता है। लेकिन मेरा सवाल सिर्फ इतना है कि 'बदले की भावना रखने वाले आक्रोशित मन का व्यक्ति गौतम बुद्ध का अनुयाई और बुद्धिष्ट कैसे हो सकता है?' लेकिन भारत में आक्रोश और बदले की भावना रखने वाला व्यक्ति डंके की चोट पर अपने आप को बुद्धिष्ट कहता, बोलता और मानता है। यही नहीं, दूसरों को भी खुद जैसा ही बुद्धिष्ट बनने को प्रेरित भी करता है।

वास्तव में 1956 में भारत में बुद्ध धर्म की पुनर्स्थापना नहीं की गयी थी, बल्कि अम्बेड़करी मत की स्थापना की गयी थी। इसी को अम्बेड़करी अनुयाई बुद्ध धर्म की पुनर्स्थापना कहते हैं। उस वक्त डॉ. अम्बेड़कर द्वारा जो 22 प्रतिज्ञाएं की गयी और, या अपने अनुयाईयों से उनके द्वारा करवायी गयी थी, जिनका अन्धानुकरण उनके अनुयाई आज तक करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं। उन प्रतिज्ञाओं में से अन्तिम प्रतिज्ञा (मैं यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से मैं बुद्ध धम्म के अनुसार आचरण करूँगा) ही अपने आप में सम्पूर्ण बुद्धत्व अंगीकरण है। शेष प्रतिज्ञाएं या तो अन्तिम प्रतिज्ञा में अन्तर्निहित हैं या उन प्रतिज्ञाओं का बुद्ध सन्देशों, बुद्ध धम्म/धर्म, बुद्ध की प्रज्ञा और बुद्ध धर्म के सिद्धान्तों से कोई तालमेल नहीं है। बल्कि अधिकतर प्रतिज्ञाओं को पढते ही एक सामान्य व्यक्ति के मन में हिन्दू धर्म के प्रति नफरत, आक्रोश और बदले की भावना का विचार उत्पन्न होता है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि डॉ. अम्बेड़कर का कथित बुद्ध धर्म अंगीकार आयोजन, वास्तव में सार्वजनिक रूप से हिन्दू धर्म के विरुद्ध नफरत, बदला, विद्रोह और आक्रोश का साहसिक आयोजन ही तो था। जिसको उनकी निम्न तीन नकारात्मक प्रतिज्ञाओं से आसानी से समझा जा सकता है:
  • 1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को कभी ईश्वर नहीं मानूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।
  • 2. मैं राम और कृष्णा को कभी ईश्वर नहीं मानूँगा, और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा।
  • 3. मैं गौरी, गणपति आदि हिंदू धर्म के किसी देवी देवता को नहीं मानूँगा और न ही उनकी पूजा करूंगा।
इन तीन प्रतिज्ञाओं के प्रकाश में मेरा सवाल-'इस प्रकार की नकारात्मकता, नफरत और बदले की भावना से भरा हुआ आक्रोशित और विद्रोही मन का व्यक्ति क्या कभी महामानव बुद्ध की प्रज्ञा को धारण कर सकता है? ऐसा व्यक्ति क्या कभी सच्चा बुद्धिष्ट हो सकता है?'

अम्बेड़करवादियों द्वारा वर्तमान में इन नकारात्मक, प्रतिशोधात्मक और नफरत पैदा करने वाली प्रतिज्ञाओं का तोतारटन्त अंधानुकरण जारी है। जबकि किसी भी विचार या घोषणा या प्रतिज्ञा या आह्वान का अन्धानुकरण बुद्ध की प्रज्ञा नहीं हो सकती! भारत के बाहर सम्पूर्ण संसार में बुद्ध होने या बुद्ध बनने के लिये ऐसी किन्हीं 22 प्रतिज्ञाओं की पालना की जरूरत नहीं होती है। मगर अम्बेड़करी भारत में इन 22 प्रतिज्ञाओं के बिना बुद्ध हुआ ही नहीं जा सकता। ऐसा बुद्ध धर्म धारण करना बुद्ध का नहीं डॉ. अम्बेड़करण का अन्धानुकरण है। यदि गहराई में जाकर समझें तो ऐसा अन्धानुकरण, अम्बेड़कर का अनुसरण भी नहीं हो सकता।

जहां 22 प्रतिज्ञाओं की बाध्यता के बारे में सवालों और सन्देहों पर पाबन्दी हो, ऐसी विचारधारा न तो बुद्ध और न ही अम्बेड़कर की प्रज्ञा हो सकती है। ऐसी रुग्ण, संकीर्ण और विकृत मनोस्थिति संघ से निकटता रखने वाले हिन्दू धर्म के कट्टरपंथियों में ही देखी जा सकती है। अत: जो अपने आप को अम्बेड़करवादी या अम्बेड़करी बुद्धिष्ट कहते हैं, उनमें से अधिकतम उक्त आर्यों की हिन्दू-मनोदशा में जीने वाले दिखावटी मुखौटे धारण किये हुए शराबी और मांसाहारी बुद्धिष्ट हैं।

बाईस प्रतिज्ञाओं के मार्फत डॉ. अम्बेड़कर का बुद्ध धर्म धारण करना बुद्ध धर्म का अनुकरण नहीं, बल्कि हिन्दु धर्म के तिरस्कार का एक सांकेतिक तरीकाभर है। जिसका मूल मकसद हिन्दू धर्म के विरुद्ध नफरत और आक्रोश पैदा करके, हिन्दुओं के विरुद्ध अपने अनुयाईयों को आक्रोशित और आकर्षित करना, बल्कि दिग्भ्रमित करना है। बुद्ध धर्म का ऐसा दुराग्रह कभी नहीं हो सकता। विशेषकर तब जबकि बौद्ध बनने या बुद्ध धर्म धारण या अंगीकार करके भी ऐसे बौद्ध लोग भारत में कानूनी तौर पर हिन्दू ही बने रहते हैं। सभी हिन्दू विधियों से शासित होते हैं। [देखें हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 की उप धारा 1]
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/16.06.2017

Thursday, June 15, 2017

प्रगति और अवनति का वास्तविक कारण बुद्ध नहीं, बुद्धि है।

*प्रगति और अवनति का वास्तविक कारण बुद्ध नहीं, बुद्धि है।*

अमेरिका ने जापान पर बमबारी करके मानवता की क्रूरता पूर्वक निर्मम हत्या की थी। जिसके साइड इफेक्ट जापान की वर्तमान पीढ़ी भी भुगत रहीं हैं। ऐसे में जापानियों के मनोमस्तिष्क में अमेरिकियों के प्रति नफरत, घृणा और बदले की भावना होनी चाहिये। लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं। जापानी कभी भी अमेरिका/अमेरिकी मुर्दाबाद के नारे नहीं लगाते। कारण जापानी अपनी ऊर्जा को इन फालतू नकारात्मक विचारों में नष्ट नहीं करते, बल्कि अपनी ऊर्जा को अपने देश और समाज की उन्नति तथा समृद्धि में लगा रहे हैं। परिणामतः आज अमेरिकी बाजार तथा अमेरिकियों के दिमांग पर जापानियों की उच्च गुणवत्ता वाली तकनीक का कब्जा हो चुका है। *इसमें जापान में बुद्ध धर्म के योगदान को ढूंढने से पहले भारत के बुद्धिष्टों के ब्राह्मण-हिन्दू धर्म के बारे में नकारात्मकता से भरे विचारों को जरूर पढ़ लेना चाहिए। क्योंकि यदि जापान की प्रगति में बुद्ध का असर होता तो बुद्ध के देश के बुद्धिष्ट, जापानी बुद्धिष्टों की तुलना में इतने अबौद्धिक और हिंदू धर्म के प्रति इतने नकारात्मक कैसे हो सकते हैं? प्रगति और अवनति का वास्तविक कारण बुद्ध नहीं, बुद्धि है।* -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 9875066111, 150617

Thursday, June 8, 2017

जिन्दा किसानों के लिये बजट नहीं, लेकिन मृत किसानों को करोड़ रुपये!

जिन्दा किसानों के लिये बजट नहीं, लेकिन मृत किसानों को करोड़ रुपये!
लेखक : डॉ. पुरुषोत्त्म मीणा 'निरंकुश'
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने 'जय जवान—जय किसान!' का ओजस्वी नारा दिया था और किसान तथा जवान एकजुट होकर शास्त्री जी के साथ खड़े हो गये थे। इसी नारे को अपना समर्थन देते हुए भाजपा के प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने इसके पीछे जय विज्ञान जोड़ दिया था। लेकिन उन्होंने, उनकी सरकार ने या उनकी पार्टी की किसी भी सरकार ने किसानों के लिये किया कुछ नहीं। हां उनकी भाजपा की केन्द्र और राज्य सरकार के शासन में मध्य प्रदेश में गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एक दर्जन किसानों की फौज के मार्फत हत्या अवश्य करवाई जा चुकी है। क्या यही जय जवान और जय किसान है। जिस भारत सरकार की फौज किसानों की हत्या कर रही है, उस सरकार को सरकार में बने रहने का कोई हक नहीं है।

फौज के हाथों मारे जा रहे किसान का अपराध क्या है?-किसान सिर्फ अपनी कृषि उपज का वाजिब मूल्य चाहते हैं। लेकिन सरकार उचित मूल्य किसी भी कीमत पर देना नहीं चाहती है। इसके विपरीत क्रूर पूंजीवाद की समर्थक भाजपा की भारत सरकार कृषि आय को भी आयकर के दायरे में लाने पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तनशील है।

कृषि और किसानों की हालत में सुधार के लिये सरकार के पास बजट नहीं है, जबकि सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों को हर दस साल बाद वेतन आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार वेतन में बढोतरी की जाती रहती है। उन्हें साल में दो बार महंगाई भत्ता दिया जाता है। सांसद और विधायक जब चाहें तब खुद के वेतन, भत्ते और सुख-सुविधाओं में बढोतरी कर लेते हैं। घाटे में चल रही निजी कम्पनियों, उद्योग घरानों और कॉर्पोरेट घरानों के कर्ज को माफ करने के लिये सरकार के पास पर्याप्त बजट है। सरकारी तंत्र को जरूरत के अनुसार हर प्रकार की सुख-सुविधा प्रदान करने में सरकारी बजट में कोई कमी नजर नहीं आती है। सरकार की साम्प्रदायिक नीति के प्रचारक बाबाओं की सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च करने के सरकार के पास धन है। सरकारी शोषक नीतियों का कुप्रचार करने के लिये और मीडिया को अपना पिठ्ठू बनाये रखने के लिये विज्ञान के नाम पर मीडिया को रिश्वत देने के लिये ​सरकार के पास हजारों करोड़ का बजट है। मगर दु:खद और शर्मनाक तथ्य कि कृषि संरक्षण और किसानों के आंसू पौंछने के लिये सरकार के पास धन नहीं है।

भारत के अन्नदाता किसान की बहुत छोटी सी और सौ फीसदी न्यायसंगत मांग है, (जिसे समस्या बताया जाता है) किसान को उसकी फसल का वाजिब मूल्य मिलना चाहिये। यह मांग मानना सरकार के लिये आसान नहीं है। या यह कहा जाये कि किसान को फसल का वाजिब मूल्य देना सरकार की चिन्ता ही नहीं है। इसका कारण बताया जाता है, बजट का अभाव और आम गरीब लोगों को सस्ता अनाज उपलब्ध करवाने की सरकारी नीति। जबकि गरीबों को सस्ती दर पर सरकार अनाज उपलब्ध करवा रही है।

इसके ठीक विपरीत किसान द्वारा उपयोग की जाने वाली कृषि तकनीक, बीज और कीटनाशकों की बेतहाशा तथा मनमानी मूल्य वृद्धि करने वाली कम्पनियों को बढावा देना और उनको अनियन्त्रित छोड़ना सरकार के लिये बहुत आसान काम है। साफ शब्दों में कहा जाये तो किसान का शोषण होते तथा करते रहना ही सरकार का अघोषित ऐजेंडा है। इस शोषण के खिलाफ उठने वाली असंगठित किसानों की आवाज को दबाने के लिये फौज के मार्फत किसानों की हत्या करवाई जा रही हैं और मृतकों को चुप कराने के लिये प्रति मृतक एक करोड़ मुआबजा घोषित किया जा रहा है। जिससे मृत परिवारों को चुप करवाया जा सके!

जिन्दा किसानों के लिये बजट नहीं, लेकिन मुआबजे के लिये बजट है! यह अपने आप में हास्यास्पद और शर्मनाक स्थिति है! इससे भी अधिक शर्मनाक उन ढोंगी तथा नकाबपोश राजनेताओं की चुप्पी है, जो अपनी काली ​कमाई के जरिये रैलियां और सभाओं का आयोजन करके किसान का बेटा मुख्यमंत्री बनाओं के नाम पर किसानों को गुमराह करने में तो सबसे आगे रहते हैं, लेकिन किसानों की सरकारी तंत्र द्वारा की जा रही निर्मम हत्याओं के समय किसी बिल में दुबके बैठे हुए हैं। सबसे पहले किसानों को ऐसे राजनेताओं को नंगा करना बहुत जरूरी है। बल्कि पहली जरूरत है। ऐसे राजनेता ही किसानों के असली दुश्मन हैं!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन (रजि.)
M & WA No. 9875066111/08.06.2017

Tuesday, June 6, 2017

W और उसके हत्यारों में फर्क क्यों? W के हत्यारों को हर हाल में फांसी की सजा मिलनी चाहिये।

W और उसके हत्यारों में फर्क क्यों? W के हत्यारों को हर हाल में फांसी की सजा मिलनी चाहिये।

सोशल मीडिया से मिली जानकारी के अनुसार राजस्थान के दौसा जिले की महवा तहसील के साँथा गाँव में घुसकर W (डब्ल्यू) नाम के एक मीणा आदिवासी युवक की पुलिस ने दिन दहाड़े बेरहमी से हत्या की है। जिसे मीडिया और अत्यारों द्वारा इनकाउंटर कहकर/बताकर पुलिस के क्रूर अपराध को छिपाया जा रहा है। बेशक मृत युवक डब्ल्यू का आपराधिक रिकार्ड/हिस्ट्री होना बताया जा रहा है। बताया तो यह भी जाता है कि युवकों को राजनीतिक लाभ के लिये बड़े-बड़े राजनेता संरक्षण देकर-अपराधी बनाते हैं। ऐसे में सवाल तो यह भी है कि चोर अधिक घातक या चोर का संरक्षक? अपराधियों को जन्म और संरक्षण देने वाले सफेदपोश इज्जत से साफे बंधवाते घूमते रहें और उनके पालतू, उनके द्वारा ब्रेन वाश्ड, गुमराह युवक सरेआम पुलिस की गोलियों के शिकार हो जाएं। यह किस तरीके की कानून और न्याय व्यवस्था है?

*दूसरा सवाल:* भारत के किसी भी क़ानून में अकारण किसी आरोपी या सिद्धदोष अपराधी (मुझे नहीं पता, डब्ल्यू सिद्ध दोष अपराधी था भी या नहीं) पर भी बल प्रयोग करने का किसी को कोई हक़ नहीं है।

अतः यदि पुलिस ने आदिवासी युवक डब्ल्यू पर गाँव में घुसकर गोलियां बरसाई हैं, तो यह उस युवक की निर्मम हत्या है। मृतक के परिजनों के साथ मेरी सहानुभूति है। मैं सोशल मीडिया के मार्फत सार्वजनिक रूप से स्थानीय पुलिस, राज्य प्रशासन, राज्य सरकार और समस्त जन प्रतिनिधियों से मांग करता हूँ कि मृतक डब्ल्यू की योजनाबद्ध, इरादतन और निर्मम हत्या के लिये जिम्मेदार, हत्यारों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 302 तथा अजा एवं अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के तहत मुकदमा दर्ज हो और हत्यारों को फांसी की सजा मिले।

मृतक के आपराधिक रिकॉर्ड/इतिहास के कारण जिन आम या डब्ल्यू के कारनामों से आहत लोगों को मृतक डब्ल्यू की हत्या का कोई दुःख नहीं है, बल्कि जिनको खुशी अनुभव हो रही है, उन्हें इस घटना को इतने हल्के से नहीं लेना चाहिये। क्योंकि पुलिस ने क़ानून हाथ में लिया है और डब्ल्यू पर भी क़ानून को हाथ में लेने का आरोप बताया जाता है। दोनों क़ानून तोड़ने के लिये जिम्मेदार है। बल्कि पुलिस जिसका दायित्व क़ानून का पालन करना और करवाना है, उसने क़ानून को तोड़ा है। ऐसे में एक कथित अपराधी की मौत पर खुशी और दूसरे घोषित अपराधियों के गिरोह (जसिट्स आनंद नारायण मुल्ला ने अपने फैंसले में लिखा था कि *पुलिस वर्दीधारी गुंडों का गिरोह है।*) की वाहवाही! आखिर क्यों? यह तो लोकतंत्र नहीं, पुरातन अधिनायकतंत्र का तांडव है। जिसमें राजशाही के क्रूर फेंसलों पर भी ताली बजाकर और राजा का गुणगान करते हुए, नाच-गा-कर समर्थन करना जनता की मजबूरी हुआ करती थी!

*यह शुरूआत है, सरकारी आतंक की! यह शुरूआत है, सरकारी सामन्तशाही की! यह शुरूआत है, नक्सलवाद जैसी स्थितियों को जन्म देने की! यह शुरूआत है, संविधान और क़ानून की सरेआम होली जलाने की! यह शुरूआत है, अमानवीयता की! यह शुरूआत है, सार्वभौमिक मानवाधिकारों का मजाक उड़ाने की!*

आज आपराधिक रिकार्डधारी डब्ल्यू की हत्या की गयी है, कल को सरकारी आतंक का विरोध करने वालों की राजकार्य में व्यवधान डालने के बहाने हत्या की जायेगी! सरकारी आतंक क्या होता है-छत्तीसगढ़ इसका ज्वलन्त उदाहरण है। औरतों का पुलिस और ताकतवर लोगों द्वारा जब चाहे तब , जी चाहे जहां बलात्कार किया जाता है! सोनी सोरी की भांति क्रूरतापूर्वक शारीरिक उत्पीड़न को अंजाम देना। रिपोर्ट दर्ज कराने जाने वालों पर फर्जी मुकदमें दर्ज करके थाने में बंद कर देना। यदि डब्ल्यू की दिन दहाड़े हत्या पर खुशियां मनानी हैं तो आने वाले सुखद और सुरक्षित कल की उम्मीद करना बेमानी होगा!
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/06.06.17

Monday, June 5, 2017

क्रीमी लेयर : पूंजीवादी-भ्रष्ट व्यवस्था के हाथों सामाजिक न्याय की हत्या!

क्रीमी लेयर : पूंजीवादी-भ्रष्ट व्यवस्था के हाथों सामाजिक न्याय की  हत्या!

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

सोशल मीडिया पर आरक्षित वर्ग के कुछ विद्वान संविधान के मार्फत अजा और अजजा वर्गों को मिले आरक्षण को अजा एवं अजजा के प्रत्येक व्यक्ति को नौकरी दिलाने की वकालत करके विचार विभ्रम और आत्मघाती क्रीमी लेयर को अपनाने की सोच को पुख्ता करने वाले विचारों को हवा दे रहे हैं। सबसे दुःखद पहलु तो यह है कि इन लेखकों की ओर से संविधान के प्रावधानों की व्याख्या किये बिना केवल युवा पीढ़ी की भावनाओं को उभारा और भड़काया जा रहा है। जिससे आरक्षित वर्ग की आर्थिक रूप से विपन्न युवा पीढ़ी में अपने ही वर्ग के उच्च पदस्थ सम्पन्न लोगों के प्रति नफरत और ईर्ष्या का भाव पैदा किया जा रहा है। इससे आरक्षित वर्गों में अंतर्कलह की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। जिससे आरक्षित वर्गों को कमजोर करने की शोषक-वंचक वर्गों की नीतियों को समर्थन मिल सकता है।

इस विषय में सबसे पहली और समझने वाली वाली मूल बात यह है कि जिसे आरक्षण लिखा, पढ़ा और समझा या समझाया जाता रहता है, उस आरक्षण का मूल मकसद आरक्षित वर्ग (विशेष रूप से अजा और अजजा वर्गों) के प्रत्येक व्यक्ति को लाभ पहुंचाना या प्रत्येक व्यक्ति की गरीबी दूर करना या प्रत्येक व्यक्ति को सरकारी नौकरी प्रदान करना कतई भी नहीं है। क्योंकि यदि सम्पूर्ण देश की समस्त 100 फीसदी सरकारी नौकरियां भी अजा और अजजा वर्गों के लिए पचास साल के लिये भी आरक्षित कर दी जाएं, तो भी अजा और अजजा वर्गों की सम्पूर्ण आबादी के प्रत्येक परिवार को सरकारी नौकरी देना/मिलना सम्भव नहीं होगा। इस विषय में पूर्व में मेरी ओर से 29.05.2015 को 'अजा एवं अजजा वर्गों में क्रीमी लेयर सम्भव नहीं!' (अन्यत्र भी प्रकाशित है- भड़ास4मीडिया तथा स्वर्गविभा ) शीर्षक से लिखा गया लेख पढा जा सकता है। इसमें निम्न पैरा पठनीय है-( लेकिन बिना पूरा लेख पढे केवल इसी पैराग्राफ के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।)
''यदि उच्च पदों पर आरक्षित वर्गों के चयनित लोगों को क्रीमीलेयर अर्थात् आर्थिक आधार पर आरक्षित वर्गों से बाहर करना शुरू कर दिया गया तो सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु प्रदान किये गये आरक्षण का मूल मकसद अर्थात् सभी राज्याधीन पदों पर अजा एवं अजजा वर्गों का उनकी जनसंख्या के अनुपात में शसक्त प्रतिनिधित्व स्थापित किया जाना, कभी पूर्ण ही नहीं हो सकेगा। क्योंकि यदि उच्च आय/क्रीमीलेयर लागू करके आरक्षित वर्ग के लोगों को आरक्षित सूची से बाहर कर दिया गया तो उच्च पदों पर पदस्थ होते हुए आरक्षित वर्ग में चयनित होकर भी अजा एवं अजजा वर्ग के उच्चाधिकारी, संवैधानिक मकसद के अनुसार अपने ही वर्ग के लोगों का ठीक से प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। क्योंकि यदि उन्हें क्रीमीलेयर के आधार पर उनके पैतिृक वर्गों से बाहर कर दिया गया तो उनसे, उनके पैतिृक वर्गों का र्इमानदारी से प्रतिनिधित्व करने की अपेक्षा करना अन्यायपूर्ण और संविधान के विपरीत होगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यही होगा कि अजा एवं अजजा वर्गों का प्रशासन में प्रतिनिधित्व कौन करेगा? केवल यही नहीं, क्रीमीलेयर के लागू होते ही पदोन्नति में आरक्षण का औचित्य ही समाप्त हो जायेगा। अत: क्रीमीलेयर एक धोखा है और अजा एवं अजजा वर्गों के प्रशासनिक प्रतिनिधियों की बेर्इमानी, असफलता या अपने वर्गों के प्रति निष्ठा नहीं होने का समाधान क्रीमीलेयर लागू करना नहीं है, बल्कि आरक्षित वर्ग के उच्च पदस्थ लोक सेवकों को प्रशासन और सरकार में अपने-अपने वर्गों का र्इमानदारी और निष्ठापूर्वक प्रतिनिधित्व करने के लिये, कड़े कानून बनाकर और संवैधानिक तरीके से पाबन्द किये जाने, अन्यथा दण्डित किये जाने की सख्त व्यवस्था की तुरन्त जरूरत है।''
इसलिए दूसरी समझने वाली बात यह है कि जिसे आरक्षण कहा जाता है, वह आरक्षण नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन में जिन वंचित अजा एवं अजजा वर्गों का सरकार की राय में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, उन वर्गों का उनकी जनसंख्या के निर्धारित अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक विधि-सम्मत संवैधानिक प्रयास है। जिसके लिए अमीरी-गरीबी की बात करना अप्रासंगिक और असंवैधानिक तथ्य है। क्योंकि अजा एवं अजजा वर्गों को प्रदान किया गये आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है।

तीसरी बात क्रीमी लेयर की अवधारणा को किसी भी रूप में समर्थन देना अजा और अजजा वर्गों को मिले संवैधानिक प्रतिनिधित्व को समाप्त करने की एक आत्मघाती प्रवृत्ति को समर्थन देने के समान है। क्रीमी लेयर को समर्थन देना पूंजीवादी-भ्रष्ट व्यवस्था के पोषकों के हाथों सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था की हत्या करवाने के समान है।

असल में समस्या उतनी आसान नहीं है, जैसी बतायी या समझायी/दिखायी जाती रही है, बल्कि आज एवं अजजा वर्गों के आरक्षित कोटे में चयनित होकर भी अपने वर्ग के संवैधानिक हकों और उनके उत्थान के लिये अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करने वाले प्रशासनिक और निर्वाचित जन प्रतिनिधियों को संविधान द्वारा खुला छोड़ देना सबसे बड़ी भूल और आरक्षित वर्गों की समस्याओं का मूल कारण है। आरक्षित वर्गों के जो लोक सेवक और निर्वाचित जन प्रतिनिधि अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रस्थिति या पदीय हैसियत (Status) के अनुसार वंचित वर्गों के उत्थान, विकास और संरक्षण के लिये पुख्ता योजना बनवाने और बनायी गयी योजनाओं को क्रियान्वित करवाने में असफल रहे हैं। यही ही मूल समस्या की मूल जड़ हैं। इसी पीड़ा को रेखांकित करते हुए 27 जनवरी, 2016 को मेरी ओर से 'आरक्षण व्यवस्था के साथ जारी बर्बरतापूर्ण बलात्कार कैसे रुके?(अन्यत्र भी प्रकाशित है-स्वर्गविभा शीर्षक से लिखा गया लेख पढा जा सकता है।  लेकिन बिना पूरा लेख पढे केवल इसी पैराग्राफ के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
"अब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं रह गया है कि आरक्षण का लाभ लेकर उच्च पदों पर पदस्थ अनेक अधिकारी ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जीते हैं और अवैध तरीकों से अकूत धन-सम्पदा अर्जित करते हैं। जिसे अपनी भावी पीढ़ियों के लिए अक्षुण्य बनाये रखने के लिए सरकारी सेवा में रहते हुए राजनैतिक दलों से नजदीकीयां बना लेते हैं और सेवानिवृति के बाद मनुवादी राजनैतिक दलों के टिकिट पर आरखित निर्वाचन क्षेत्रों से जीतकर MP या MLA बन जाते हैं। ऐसे लोगों का अपने वर्ग के आम लोगों के दुःख-दर्द या मुसीबतों या उनके हितों या अधिकारों के संरक्षण से दूर का भी वास्ता नहीं होता है। ऐसे लोग पहले प्रशासन में रहकर और बाद में विधायिका में पहुंचकर अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति करने के साथ—साथ अपने राजनैतिक दल के आकाओं के आदेशों की पालना करने के अलावा कुछ नहीं करते हैं। इसी कारण वंचित समाज के अन्दर गहरी खाई बन चुकी है और आरक्षित वर्ग के आम लोगों में गहरा असन्तोष और गुस्सा व्याप्त है। इन हालातों में और संविधान को लागू हुए सात दशक पूर्ण होने जा रहे हैं, तब भी क्या आरक्षित वर्ग के आम लोगों के लिये यह विशेष चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये कि सामाजिक न्याय की वास्तविक स्थापना कैसे हो? वंचितों के प्रेरणा स्रोत ज्योतिबा फूले, विश्वस्तरीय विधिवेत्ता और बहुमुखी प्रतिभा के धनि बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेड़कर, आदिवासी हितों के लिये समर्पित प्रतिनिधि जयपालसिंह मुण्डा और आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय के मसीहा कांशीराम की सामाजिक न्याय की लड़ाई का क्या यही लक्ष्य था? मुझे नहीं लगता कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था से इन महामानवों के सपने कभी पूर्ण हो सकेंगे। मुझे ज्ञात है कि काले धन की ताकत पर आरक्षित वर्गों के दिखावटी मसीहा बने हुए कुछ स्वार्थी पूर्व या वर्तमान प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से मेरा और मेरे विचारों का कड़ा विरोध हो सकता है, जो अनपेक्षित और अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन उनके स्वार्थपूर्ण विचारों की परवाह किये बिना समग्र वंचित समाज के संवैधानिक हित में हमें सत्य को स्वीकार कर के, इस समस्या का अविलम्ब स्थायी और संवैधानिक समाधान खोजना ही होगा।"
अतः वास्तव में देखा जाए तो आरक्षण के माध्यम से अवसर पाने के बाद भी अपने वर्ग के प्रति समर्पित और निष्ठावान नहीं रहने वाले, अपने वर्गों का सही से प्रतिनिधित्व नहीं करने वाले उच्च पदस्थ लोक सेवकों और जन प्रतिनिधियों के वर्गद्रोही होने को रोकने के लिये पुख्ता संवैधानिक व्यवस्था करने के बारे में चिंतन करने की जरूरत थी। जिसके बारे में संविधान सभा में कोई चिंतन नहीं हुआ। सम्भवतः संविधान सभा में वंचित वर्गों के लिये चिंता करने वाले प्रतिनिधियों को यह उम्मीद नहीं रही होगी कि आरक्षित वर्गों के प्रशासनिक और लोकतान्त्रिक जन प्रतिनिधि अपने ही वर्गों के प्रति वर्गद्रोही भी हो सकते हैं?
आजादी से वर्तमान तक की हकीकत यह है कि तीन-चार दश​क पूर्व प्रशासनिक सेवाओं में अवसर पाने वाले आरक्षित वर्गों के अधिकारियों की सन्तानें सर्व-सुविधायुक्त तथा उच्च गुणवत्ता वाले महंगे शिक्षण संस्थानों और कोचिंग इंस्टीट्यूट्स से उच्च कोटि की योग्यता अर्जित करके प्रशासनिक सेवाओं की प्रतियोगिताओं में (बल्कि सभी में) अपना वर्चस्व कायम करती जा रही हैं। साथ ही साथ उच्चतम पदों से सेवानिवृति के बाद धनाढ्य हो चुके आरक्षित वर्ग के अधिकारी राजनैतिक दलों से साठगांठ करके टिकिट पाने में सफल हो रहे हैं। जो अकूत धनबल, धनबल के जरिये जुटाए बाहुबल और धनबल तथा बाहुबल के जरिये हासिल जनबल अर्थात वोटर का मत हासिल करके आरक्षित वर्गों के लिये सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से चुनकर विधायिका तक पहुंच रहे हैं। किन्हीं अपवादों को छोड़कर इन सभी से आरक्षित वर्ग के निम्नतम वंचित तबके के उत्थान की उम्मीद पूरी नहीं हो रही है!
इस पृष्ठभूमि में आजादी के बाद से आज तक उक्त समस्या के समाधान के लिये किसी भी संवैधानिक संस्थान ने कभी कोई चिंतन या अध्ययन नहीं किया। अजा एवं अजजा वर्गों के हितों के लिये काम करने वाले किसी भी आयोग या किसी भी समिति ने इसके समाधान की कभी कोई सिफारिश नहीं की। किसी भी सामाजिक संगठन या सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाले किसी लेखक, विचारक या राजनेता ने सार्वजनिक रूप से इस बारे में कोई विचार व्यक्त नहीं किये। किसी न्यायविद या किसी कोर्ट ने इस बारे में कभी कोई टिप्पणी नहीं की।

इन हालातों में अजा और अजजा वर्गों के मध्य प्रतियोगिता में सबको पछाड़ कर आगे बढ़ने वाले अग्रणी और धनाढ्य वर्ग के प्रति ईर्ष्या या दुर्भाव या नफरत उत्पन्न करके क्रीमी लेयर जैसी आत्मघाती सोच को हवा दी गयी तो आरक्षित वर्गों और जातियों में कभी न ख़तम होने वाली अंतर्कलह का जन्म होगा। ऐसे में आरक्षण के मूल मकसद "सशक्त प्रतिनिधित्व के संवैधानिक दायित्व निर्वाह" के प्रति प्रशासनिक और जन प्रतिनिधियों के मन में बचीखुची निष्ठा भी समाप्त हो जायेगी। जो वंचित वर्गों के सर्वनाश की कांटोंभरी और दुर्गम राह ही है। इस पर चलने से कभी भी संवैधानिक मंजिल नहीं मिल सकती। इस समस्या को रेखांकित करते हुए, इसके संवैधानिक समाधान के बारे में मैंने 10 जून, 2010 में 'अजा-जजा के वर्गद्रोही अफसर बर्खास्त किये जायें!' एक टिप्पणी की थी। इसी टिप्पणी को संशोधित करके जनवरी, 2012 में 'आरक्षण समाप्त करना है तो आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसर तत्काल बर्खास्त किये जायें!' शीर्षक से एक लेख लिखा था। जिसे शीर्षक बदल कर अनेक पत्र-पत्रिकाओं और न्यूज पोर्टल्स ने प्रकाशित भी किया था। 

उक्त लेख का अन्तिम पैराग्राफ यहां प्रस्तुत है, लेकिन बिना पूरा लेख पढे केवल इसी पैराग्राफ के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

''संविधान और संविधान द्वारा प्रदत्त सामाजिक न्याय की अवधारणा में विश्‍वास रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि भारत सरकार को इस बात के लिये बाध्य किया जाये कि संविधान में इस बात का भी प्रावधान किया जावे कि आरक्षित वर्गों का सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से अनारक्षित वर्ग के लोगों की तुलना में कमतर होकर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी पाने वालों को पूर्ण समर्पण और संवेदनशीलता के साथ अपने वर्ग और अपने वर्ग के लोगों का सकारात्मक प्रतिनिधित्व करना चाहिये और ऐसा करने में असफल रहने वाले आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसरों या कर्मचारियों को सरकारी सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश करने के लिये अजा और अजजा आयोगों का संवैधानिक रूप से सशक्त किया जाना चाहिये। अन्यथा न तो कभी आरक्षण समाप्त होगा और न हीं आरक्षित वर्गों का सरकारी सेवाओं में संवैधानिक भावना के अनुसार सच्चा प्रतिनिधित्व ही स्थापित हो सकेगा।''
मुझे लगता है कि जब तक इस दिशा में संवैधानिक तरीके से नहीं सोचा जायेगा, समाधान के बजाय विवादों का ही जन्म होगा। क्रीमी लेयर की किसी भी रूप में चर्चा या मांग करना तो अजा एवं अजजा वर्गों के लिए आत्मघाती अवधारणा है!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/05.06.2017